रविवार, 15 नवंबर 2009

इस ब्लाग का मकसद......

इस ब्लोग का मक़्सद
इस ब्लोग का मक़्सद उर्दू को हिन्दी में सीखने/सीखाने का या हिन्दी को उर्दू में सीखने/सीखाने का कत्तइ नहीं है और ना ही अभी उर्दू अदब को हिन्दी में तर्जुमा(अनुवाद) करने का .इस साइट का मक्सद फ़कत इतना है कि उर्दू अदब में आजकल जो लिखा/पढ़ा जा रहा है और जो सरगर्मियाँ उधर हैं उन्हे अपने हिन्दीदाँ दोस्तों को ज्यादा से ज्यादा वाक़िफ़ कराना है जो हिन्दी में लिखते-पढ़ते हैं मगर उर्दू से मोहब्बत है उर्दू से अदब आश्ना हैं.
इन्टरनेट पर बहुत सी मयारी(स्तरीय) उर्दू महफ़िलें/बज़्म/अन्जुमन/मज़लिस वगै़रह चलती है जिसमें शे’र-ओ-शायरी,बेत बाज़ी ,सौती मुशायरा ,तेहरीर.तब्सरा,मज़ामीन,नग्में ,तन्ज़-ओ-मज़ाह,अफ़्साने ,किस्से वगै़रह आते-रहते है मगर हम हिन्दी वालों की दुश्वारी यह कि इसके बेशीतर काम या तो फ़ारसी स्क्रिप्ट में होते हैं या रोमन उर्दू में, जिससे हमारे हिन्दीदाँ दोस्त उर्दू की खूबियों से वाकिफ़ और लुत्फ़-अन्दोज़ नहीं हो पाते हैं.इस साइट का मक़्सद ऐसे ही कामों को हिन्दी (देवनागरी) स्क्रिप्ट में तहरीर-ए-नक़्ल (ट्रान्सलिटरेशन) करने का है और ऐसे ही दिलचस्प काम हिन्दी दुनिया के मंजरे-आम में लाना है
ऐसी ही उर्दू की एक अहम साइट है "उर्दू अन्जुमन.काम" जिसके मुन्तज़िम आला है जनाब मोहतरम सरवर आलम रा्ज़ "सरवर’.सरवर साहिब खुद ही उर्दू के एक नामचीन लेखक ,जानकार,शायर है जो अपनी सारी ज़िन्दगी उर्दू के फ़रोगी में (प्रचार-प्रसार) लगा दी है और उम्र के इस मंज़िल में अभी भी इस काम में दिलो-ओ-जाँ से मशरूफ़ हैं
फ़िलहाल इस ब्लोग पर जनाब सरवर साहेब के कुछ अहम इल्मी काम का तहरीर-ए-नक़्ल (ट्रान्सलिटरेशन) पेश किया जाएगा जिसके लिए उन की मंजूरी/आशीर्वाद ले लिया गया है
एक बात और ......
किसी जबान का हू-ब-हू "ट्रान्सलिटरेशन" करना नामुमकीन तो नहीं पर मुश्किल ज़रूर होता है क्योकि हर जुबान की अपनी फ़ित् रत होती है .क्योंकि कुछ आवाजे अगर उनकी जुबान में है तो हमारे (हिन्दी) जुबान में नहीं है. मसलन उर्दू की कुछ आवाजों को हिन्दी में ’क’ ’ख’ ग फ ज पे नुक्ता लगा कर क़ ख़ ग़ फ़ ज़ काम चलाते है फ़िर भी ’ज’ का काम नहीं चलता .उर्दू में ’ज’ के लिए ५ आवाजें हैं जैसे जीम (jim)....जाल (zal)...जे (z) ...ज़े .. zh...जुवाद (zuad) . जीम के लिए "ज" से काम चल जाता है मगर ’ज़े..ज़ाल.. ज़ुवाद के लिए हिन्दी में अभी एक ही हर्फ़ ’ज़’ से काम चलाते है.
रोमन उर्दू में कुछ हद तक इस मामले में बेहतर है क्योकि इंग्लिश में "स्माल" और "कैपिटल" लेटर है जिस पर कुछ (इम्तियाज़)निशान लगा कर इन आवाजों के करीब हो पाते है.हम हिन्दी वालों को इस जानिब कुछ सोचना चाहिए..इस बात पर तफ़्सील से फ़िर कभी ज़िक्र करेंगे.......यहाँ पर जो हर्फ़ "जीम" से शुरू होते है उनके लिए "ज" और जो हर्फ़ "जाल" "जे" "जुवाद" से शुरू .होते है उनके लिए "ज़" का इस्तेमाल किया गया है.
और
ख़े =Khe = ’ख़’ से
गै़न=Ghain = ’ग़’ से
क़ाफ़=kaf = ’क़’ से
और यहाँ "खड़ी पाई (।) की जगह (डाट) "." का इस्तेमाल किया गया है.
और आखिर में........
मेरी जानिब ,यह शौकिया कोशिश है.मेरी ज़मीन कभी उर्दू की नही रही.उर्दू के साथ बदकिस्मती यह कि लोग "उर्दू को भी मुसलमान समझ लेते हैं". मेरी बुनियादी तालीम हिन्दी,अंग्रेजी,संस्कृत से हुई है और उर्दू की कोई खास तमीज़-ओ-तहजीब नहीं.बस एक मुहब्बत है उर्दू से ..उर्दू का अदब आशना हूँ ।.हो सकता है मेरी इस कोशिश में तलफ़्फ़ुज़ मुत्तलिक़ ग़लतियाँ नज़र आये,अहले कारीं (पाठक गण) से गुज़ारिश है कि उसे नज़र अन्दाज़ कर मुझे आगाह कर दें तो मै मम्नून-ओ-तश्क्कुर (आभारी और शुक्रगुज़ार) रहूँगा ताकि खुद को दुरुस्त कर सकूँ....आखिर उर्दू ज़बान है...."आती है उर्दू ज़बाँ आते-आते"
आप सभी अहबाब का
तालिब-ए-दुआ

आनन्द.पाठक
जयपुर