शनिवार, 15 सितंबर 2018

चन्द माहिया: क़िस्त 54

चन्द माहिया  :क़िस्त 54

:1:
ये कैसी माया है
तन तो है जग में
मन तुझ में समाया है

:2:
जब  तेरे दर आया
हर चेहरा मुझ को
मासूम नज़र आया

:3:
ये कैसा रिश्ता है
देखा कब उसको
दिल रमता रहता है

:4:
बेचैन बहुत है दिल
कब तक मैं तड़पूं
बस अब तो आकर मिल

:5:
यादें कुछ सावन की
तुम न आए जो
बस एक व्यथा मन की

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

एक ग़ज़ल : झूठ का जब धुआँ---

एक ग़ज़ल :

झूठ का जब धुआँ ये घना हो गया
सच  यहाँ बोलना अब मना हो गया

आईना को ही फ़र्ज़ी बताने लगे
आइना से कभी सामना हो गया

रहबरी भी तिजारत हुई आजकल
जिसका मक़सद ही बस लूटना हो गया

जिसको देखा नहीं जिसको जाना नहीं
क्या कहें ,दिल उसी पे फ़ना हो गया

रफ़्ता रफ़्ता वो जब याद आने लगे
बेख़ुदी में ख़ुदी  भूलना हो गया

रंग चेहरे का ’आनन’ उड़ा किसलिए ?
ख़ुद का ख़ुद से कहीं सामना हो गया ?

-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 3 सितंबर 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 53

चन्द माहिया  :क़िस्त 53

:1:
सब क़िस्मत की बातें
कुछ को ग़म ही ग़म
कुछ को बस सौग़ातें

:2:
कब किसने है माना
आज नहीं तो कल
सब छोड़ के है जाना

:3:
कब तक भागूँ मन से
देख रहा कोई
छुप छुप के चिलमन से

:4:
कब दुख ही दुख रहता
वक़्त किसी का भी
यकसा तो नहीं रखता

:5:
जब जाना है ,बन्दे !
काट ज़रा अब तो
सब माया के फन्दे


-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

एक गजल

गजल

आँख मेरी भले अश्क से नम नहीं
दर्द मेरा मगर आप से  कम नहीं

ये चिराग--मुहब्बत बुझा दे मेरा
आँधियों मे अभी तक है वो दम नहीं

इन्कलाबी हवा हो अगर पुर असर
कौन कहता है बदलेगा मौसम नहीं

पेश वो भी खिराज़--अक़ीदत किए
जिनकी आँखों मे पसरा था मातम नहीं

एक तनहा सफर में रहा उम्र  भर
हम ज़ुबाँ भी नही कोई हमदम नहीं

तन इसी ठौर है मन कहीं और है
क्या करूँ मन ही काबू में,जानम नहीं

ये तमाशा अब 'आनन' बहुत हो चुका
सच बता, सर गुनाहों से क्या ख़म नहीं?


-आनन्द पाठक-

शनिवार, 11 अगस्त 2018

चन्द माहिया {सावन पे] : क़िस्त 52

चन्द माहिया  [सावन पे ] : क़िस्त 52


[नोट : मित्रो ! विगत सप्ताह सावन पे चन्द माहिए [क़िस्त 51] प्रस्तुत किया था
उसी क्रम में -दूसरी और आखिरी कड़ी प्रस्तुत कर रहा हूँ--]

:1:
जब प्यार भरे बादल
सावन में बरसे
भींगे तन-मन आँचल

:2:
प्यासी आँखें तरसी
उमड़ी तो बदली
जाने न कहाँ बरसी

:3:
उन पर न गिरे ,बिजली
डरता रहता मन
जब जब चमकी पगली

:4:
इक बूँद की आस रही
बुझ न सकी अबतक
चातक की प्यास वही

:5:
कितने बदलाव जिए
सोच रहा हूँ मैं
कागज की नाव लिए


-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 8 अगस्त 2018

चन्द माहिया सावन पे : क़िस्त 51

चन्द माहिया  [सावन पे ] : क़िस्त 51

:1:
सावन की घटा काली
याद दिलाती है
वो शाम जो मतवाली

:2:
सावन के वो झूले
झूले थे हम तुम
कैसे कोई भूले

:3:
सावन की फुहारों से
जलता है तन-मन
जैसे अंगारों से

;4:
आएगी कब गोरी ?
पूछ रही मुझ से
मन्दिर की बँधी डोरी

:5:
क्या जानू किस कारन ?
सावन भी बीता
आए न अभी साजन

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 4 अगस्त 2018

एक ग़ज़ल : ये आँधी ,ये तूफ़ां---

एक ग़ज़ल : ये आँधी ,ये तूफ़ाँ--

ये आँधी ,ये तूफ़ाँ ,मुख़ालिफ़ हवाएँ
भरोसा रखें, ख़ुद में हिम्मत जगायें

कहाँ तक चलेंगे लकीरों पे कब तक
अलग राह ख़ुद की चलो हम बनाएँ

बहुत दूर तक आ गए साथ चल कर
ये मुमकिन नहीं अब कि हम लौट जाएँ

अँधेरों को हम चीर कर आ रहे हैं
अँधेरों से ,साहब ! न हम को डराएँ

अगर आप को शौक़ है रहबरी का
ज़रा आईना भी कहीं देख आएँ

अभी  कारवाँ मीर ले कर है निकला
अभी से तो उस पर न उँगली उठाएँ

यहाँ आदमी की कमी तो नहीं है
चलो ’आदमीयत’ ज़रा ढूँढ  लाएँ

न मन्दिर, न मस्जिद, कलीसा न ’आनन’
नया पुल मुहब्बत का फिर से बनाएँ

-आनन्द.पाठक-