सोमवार, 6 मार्च 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 26 [बह्र-ए-मुतदारिक-1]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 26 [बह्र-ए-मुतदारिक-1]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 


बह्र-ए-मुतदारिक का बुनियादी रुक्न है -’फ़ा इलुन’ [ 2 12 ] =सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [2 ]+वतद-ए-मज़्मुआ [1 2]

बहर-ए-मुतदारिक की सालिम बह्रें

1-बह्र-ए-मुतदारिक मुरब्ब: सालिम  [212 -212] 
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन   [मिसरा में दो बार यानी  शे’र  में चार बार ]
बहुत छोटी बहर होने के कारण इस बहर में बहुत कम अश’आर कहे गये हैं , छोटे बहर में  मयार के ग़ज़ल/शे’र कहना बहुत मुश्किल काम होता है । फिर समझाने के लिए एक उदाहरण लेता हूँ

 ऎ   मेरे   हम नशीं 
चल कहीं और चल

इसकी तक़्तीअ कर के देखते है
 2 1 2       /   2  1 2    =212---212
ऎ मिरे       / हम नशीं
2    1   2  /  2 1  2    =212---212
चल कहीं / औ र चल

 दो मिसरा और सुने
 ढूँढते ढूँढते मैं
कहाँ आ गया
अब इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं

212 /212 =212---212
ढूँढते   ढूँढते
2 1 2   /  212 = 212-212
मैं कहां /आ गया

शे’र  मे अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ’ फ़ाइलान ’ यानी  2121 भी लाया जा सकता है
इस बात की चर्चा आगे करेंगे जब मुतदारिक बह्र पर ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

2- बह्र-ए-मुतदारिक मुसद्दस सालिम  [212-212--212] 
  फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन  [मिसरा में 3-बार और शे/र में 6-बार ]

उदाहरण -कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से

जब नज़र से नज़र मिल गई 
 दिल की गोया कली खिल गई

इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं
2    1  2   / 2  1  2   / 2  1  2 =212---212---212
जब नज़र / से नज़र  /मिल गई
2       1    2  / 2 1  2   /2   1  2 =212---212---212
 दिल कि गो / या कली / खिल गई

इस हक़ीर फ़क़ीर का भी इसी बहर में एक -दो ग़ैर मयारी शे’र बर्दाश्त कर लें ,गर नागवार न गुज़रे तो

मुठ्ठियां इन्क़लाबी रही
पाँव लेकिन फ़िसलता गया

जिससे ’आनन’ को उम्मीद थी
वो भरोसे  को छलता  गया

 बात स्पष्ट करने के लिए -एक शे’र की तक़्तीअ कर रहा हूँ
2    1   2   / 2  1    2/  2  1 2   =  212---212---212
मुठ् ठि या / इन क ला /बी रही
2  1  2 / 2     1    2     / 2 1 2  =   212---212--212
पाँ व ले/ किन फ़ि सल  /ता गया

एक शे’र और मुलाहिज़ा फ़र्माएं

अब तो उठिए  बहुत सो लिए
खिड़कियाँ तो ज़रा खोलिए

 जो मिला प्यार से हम मिले
बाद उस के ही हम हो लिए 

एक शे’र की तक़्तीअ कर रहा हूं~
 2     1    2 / 2 1   2   /  2 1 2 =212---212---212
अब त उठि/ ए  ब हुत / सो लिए
2      1   2  / 2   1 2  /  2 1 2 =212---212---212
खिड़ कि याँ /तो ज़रा   /खोलिए

शे’र  मे अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ’ फ़ाइलान ’ यानी  2121 भी लाया जा सकता है
इस बात की चर्चा आगे करेंगे जब मुतदारिक बह्र पर ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

दूसरे शे’र की तक़्तीअ आप खुद कर  मुतमुईन [निश्चिन्त] हो जाये
ख्याल रहे बहर की माँग के मुताबिक --के--से--है--तो--को---पर मात्रा गिराई जा सकती है

इस बहर की मुज़ाइफ़ शकल  भी हो सकती है यानी  बह्र-ए-मुतदारिक मुसद्दस सालिम मुज़ाइफ़  [ 212--212---212--212---212----212-] यानी एक मिसरा मे 6-रुक्न और शे’र मे 12 रुक्न]

3- बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम [ 212--212--212---212 ]
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन 

हम पहले भी कह चुके हैं कि ये दोनो बह्र .मुतक़ारिब और मुतदारिक जिन्हे 5-हर्फ़ी [ख़म्मासी ] रुक्न कहते है उर्दू शायरी में हिन्दी से बाद में आई [यानी रमल,रज़ज,हजज़,कामिल वाफ़िर-7-रुक्नी वज़न जिसे सुबाई रुक्न भी कहते है के बाद]
और इन दोनो में  भी मुतदारिक पहले आया  जब कि मुतक़ारिब वज़न बाद में आया । शायद इसका कारण ये हो कि हिन्दी गीतों में यह छन्द  संस्कॄत में [फिर बाद में हिन्दी में] उर्दू रुक्न से बहुत पहले से प्रचलन  में था। याद करे
हिन्दी छन्द शास्त्र में दशाक्षरी सूत्र -यमाताराजभानसलगा -[यगण--मगण--तगण--रगण---] पहले से था

यगण= यमाता = 1 2 2 = फ़ऊलुन
यमाता--यमाता--यमाता--यमाता
122--122----122----122
यगण----यगण---यगण----यगण

फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन = बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन का वज़न है

और यही बात
रगण  = राजभा = 212 = फ़ाइलुन
राजभा--राजभा---राजभा---राजभा
रगण---रगण---रगण--रगण
212---212---212---212--
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन = बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम है

इसी तरह इसी दशाक्षरी सूत्र से हम बहर-ए-मुतदारिक मुसद्दस सालिम या मुरब्ब: सालिम भी परिभाषित कर सकते है जैसे

रगण---रगण--रगण
राजभा----राजभा---राजभा
212-------212------212-
इन दोनो में फ़र्क़ यही है कि एक ’मात्रिक छन्द’ पर आधारित है जब कि दूसरा ’वार्णिक छन्द’ पर आधारित है
उर्दू शायरी में तक़्तीअ ’तलफ़्फ़ुज़’ [उच्चारण] के आधार पर चलती है  यानी " मल्फ़ूज़ी ग़ैर मक़्तूबी ’[यानी उच्चारण में तो आये पर लिखने में न आये ] पर आधारित है ,न कि मक़्तूबी ग़ैर मल्फ़ूज़ी’ [यानी लिखने में लिखा तो जाये पर उच्चारण मे न आए ]
इन दोनो पर चर्चा कभी बाद में करेंगे

आ0 कवि कुँवर जी ’बेचैन’ जी ने अपनी किताब -ग़ज़ल का व्याकरण ’-में और हमारे कुछ  फ़ेसबुक के मित्र  इस दिशा में कार्य कर रहे हैं  और ग़ज़ल को गीतिका का नाम भी दिया है कि उर्दू की बहर और हिन्दी के छन्द को एक प्लेट फ़ार्म पर लाया जा सके
खैर हम यहाँ  अपनी बातचीत उर्दू के रुक्न तक ही महदूद [सीमित] रखेंगे

हम पहले भी कह चुके हैं कि यह दोनो बहूर [ मुतक़ारिब और मुतदारिक] बड़ी ही मानूस /लोकप्रिय बह्र है और उसमें भी ’मुसम्मन’ और मुसम्मन मुज़ाइफ़’ का तो जवाब ही नहीं \दौर-ए-क़दीम [पुराने समय ]का तो नहीं मालूम ,मगर दौर-ए-हाज़िर [वर्तमान काल ]
के अमूमन सभी शो;अरा  ने इस बहर में शायरी की है
बह्र-ए मुतदारिक मुसम्मन के चन्द उदाहरण पेश करते है

आज फिर से मुहब्बत की बातें करो
दिल है तनहा  रफ़ाकत की बाते करो

बाद मुद्दत के आए हो ’आनन’ के घर
पास बैठो न रुख़सत  की बाते करो

एक शे’र की तक़्तीअ कर के दिखा रहा हूँ
 2  1    2    /  2  1  2  / 2   1  2   / 2 1 2  = 212---212---212----212
आज फिर / से  मु ह्ब /बत क बा /तें क रो
2     1    2  /  2  1 2 / 2  1     2  / 2 1 2   =2 12---212---212---212
दिल है तन/ हा  र फ़ा/कत क बा /ते क रो

एक दूसरा उदाहरण लेते है -फ़ना कानपुरी साहब  का एक शे’र है

इन बुतों की मुहब्बत भी क्या चीज़ है
दिल्लगी दिल्लगी  में ख़ुदा  मिल गया

इसकी तक़्तीअ पेश करते है
2   1    2  /   2  1  2  / 2   1  2    /  2 1 2  =  212---212---212---212
इन बु तों /  की मु ह्ब /बत भी क्या /ची ज़ है
 2    1   2  /  2   1   2   / 2  1 2  / 2   1  2 =   212---212---212---212
दिल ल गी / दिल ल गी  /में ख़ु दा / मिल ग या

एक बात और
शे’र  मे अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ’ फ़ाइलान ’ यानी  2121 भी लाया जा सकता है
इस बात की चर्चा आगे करेंगे जब मुतदारिक बह्र पर ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

  212--212--2121
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलान

 जाँ निसार अख्तर साहब का एक शे’र मुलाहिज़ा फ़र्माएं

और क्या है सियासत के बाज़ार में
कुछ खिलौने सजे हैं दुकानों के बीच

अब इस की तक़्तीअ देखते है
   2 1  2   / 2 1  2  / 2   1   2  / 2 1 2     = 212---212---212---212
औ र क्या /है सि या/ सत क बा /ज़ा र में
  2    1   2   / 2 1 2  / 2 1  2 / 2 1  2 1  = 212---212---212---2121
कुछ खि लौ/ने स जे /हैं दु का /नों के बीच

मुसम्मन सालिम  का मुज़ाइफ़ वज़न भी होता है

4- बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम मुज़ाइफ़ [ 212--212--212--212---212---212--212--212 ] इसे 16-रुक्नी बहर भी कहते है
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन----फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन----फ़ाइलुन---फ़ाइलुन
[यानी एक मिसरा में 8-रुक्न और पूरे शे’र मे 16-रुक्न ]

सरवर आलम राज़ ’सरवर’ के हवाले से राज़ इलाहाबादी का एक शे’र पेश करता हूँ

आशियाँ जल गया गुलिस्ताँ लुट गया ,हम क़फ़स से निकल कर किधर जायेंगे
इतने मानूस सैय्याद से हो गए  , अब रिहाई मिली भी तो  मर जायेंगे

[मानूस = परिचित]
अब इसकी तक्तीअ कर के देख लेते है कि यह शे’र कहाँ तक वज़न में या बह्र में है
 2 1    2   / 2   1   2 / 2    1   2  ’  2   1  2 / 2   1   2     / 2  1  2    / 2   1    2   / 2  1 2      =  212---212---212---212---212---212--212---212
आ शि याँ /जल ग या /गुल सि ताँ  /लुट ग या /,हम क़ फ़स /से नि कल /कर कि धर /जा ये गे
2     1  2  / 2 1 2/ 2 1 2 /  2  1 2 /   2  1    2  / 2 1 2/   2  1   2   /  2 1 2    =    212---212--212----212---212---212--212--212
इत ने मा/नू स सै/या  द से / हो ग ए  /, अब रि हा/ई मि ली /भी तो  मर/ जायेंगे

16-रुक्नी बहर के बारे में एक बात ध्यान देने की है कि मिसरा में हर चार रुक्न के बाद एक ’ठहराव’ होना ज़रूरी है जिसे अरूज़ की भाषा में ’अरूज़ी वक़्फ़ा’ कहते हैं हिन्दी में इसे आप ’मध्यान्तर ’ कह सकते हैं।कारण कि उर्दू शायरी का मिजाज़ ही ऐसा है इसका मतलब यह हुआ कि आप को जो बात कहनी है वह वक़्फ़ा के पहले हिस्से में [पूर्वार्ध मे] कह लीजिये और दूसरी बात वक़्फ़ा के दूसरे हिस्से [यानी उत्तरार्ध में] कहिए। यानी ये नही होगा कि आप की बात ”चौथे और पाँचवे’ रुक्न मिलाकर पूरी हो या
spill over हो जाये ।यदि ऐसा है तो बहर  ’शिकस्ता’ कहलायेगी और अगर ऐसा नहीं है तो बहर ’शिकस्ता ना-रवा’ कहलायेगी

इस क़िस्त मे हमने बहर-ए-मुतदारिक की सालिम वज़न और उनकी मुरब्ब: ,मुसद्दस मुसम्मन और मुज़ाइफ़ शकल पर चर्चा की है । आप को अगर मुरब्ब: की और मिसाल कहीं से दस्तयाब [प्राप्य] हो तो इस राक़िम उल हरूफ़ [लेखक] को ज़रूर बताइएगा कि मेरी डायरी में ऐसे अश’आर का इज़ाफ़ा हो सके
अब आप को कम अज कम मुतक़ारिब और  मुतदारिक बहर की पहचान करने में आसानी हो जायेगी
अगली किस्त में हम बहर--मुतदारिक की मुज़ाहिफ़ बहर यानी इस पर लगने वाले ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

मुझे उमीद है कि मुतदारिक के सालिम बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 25 [मुतक़ारिब की मुज़ाहिफ़ बह्र-3]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 25 [ मुतक़ारिब की मुज़ाहिफ़ बह्र -3]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है ]

पिछली क़िस्त में हम मुतक़ारिब की इन बहूर पर चर्चा कर चुके हैं

1- बहर-ए-मुतक़ारिब मुरब्ब: सालिम    [122---122] 
2- बहर-ए-मुतक़ारिब मुसद्दस सालिम  [122---122---122]
3-बहर-ए-मुतक़ारिब  मुसम्मन  सालिम [122---122---122---122]
और इन की मुज़ाइफ़ शकलें भी
 साथ ही
4- बहर-ए-मुतक़ारिब मुसद्दस महज़ूफ़    122 --122--12.
5-  बहर-ए-मुतक़ारिब  मुसम्मन महज़ूफ़ 122--122--122--12
6-  बहर-ए-मुतक़ारिब  मुसद्दस मक़्सूर      122--122--121
7-  बहर--ए-मुतक़ारिब मुसम्मन मक़सूर  122--122--122--121
8-  बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन असलम मक़्बूज़ मुख़्नीक़ सालिम अल आख़िर   22-122--22-122

और साथ ही बहर मुतक़ारिब में असलम और असरम और मक़बूज़ की भी चर्चा कर चुके हैं
आप को जान कर आश्चर्य होगा कि ज़िहाफ़ सलम और सरम के अमल से बरामद मुज़ाहिफ़ बहर पर ’तख़नीक़’ के अमल से 1,2 नहीं बल्कि 250 से भी ज़्यादा  विभिन्न रंगा-रंगी वज़न बरामद हो सकती है । यहां पर उन तमाम सूरतों पर बहस करना न ज़रूरी है न मुनासिब है। वरना मौज़ू से हम भटक जायेंगे। डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब ने अपनी किताब ’ मेराज-उल-अरूज़’ में बाक़ायदे इन तमाम मुतख़्नीक़ बहर की बरामदगी दिखाई भी है। सभी का यहाँ लिखना मुमकिन भी नहीं है।
आगे बढ़ने से एक दो बात पर चर्चा करना ज़रूरी समझता हूं।
’फ़ऊलुन [122] का  असरम है ------फ़अ लु   [ 2 1 ]
फ़ऊलुन [122 ] का असलम  है------फ़अ लुन  [ 2 2 ]
फ़ऊलुन [122]  का मक़्बूज़ है   -----फ़ ऊ लु    [1 2 1 ]
फ़ऊलुन [122]  का मुसबीग़ है ------फ़ऊला न   [ 1221 ]
किसी क़िस्त में मैने एक बात कही थी -आप को याद हो कि न याद हो । मुझे याद है कुछ ज़रा ज़रा-----
वो बात थी कि 1 1 2 2 1 1 2 ---का जो गिर्दान या रुक्न समझने के लिए जो  अलामत हमने आप ने बना रखी है  वो शुरुआती दौर में   बहर सीखने/समझने के लिए   कुछ मदद तो करती है मगर गहराईयों में उतरने पर यह निज़ाम भी कारगर साबित नहीं होता कारण की उर्दू शायरी मे अर्कान का सारा खेल ;हरकत , साकिन , सबब ,वतद का है ।  हरकत और साकिन हर्फ़ को 1... 2 की अलामत से कभी कभी दिखाना मुश्किल होता है । उर्दू वाले तो फ़े’ल में ब सकून-ए-लाम ,ब सकून-ए-ऐन या लाम मय हरकत लिख कर काम चला लेते है मगर यह बात 1...  2.... 1 ....2  से नही दिखाई जा सकती कि फ़े’ल मे- लाम ब सकून हो या मय हरकत हो- दिखाते मगर हम -1- से ही है या रुक्न मे -ऐन - ब सकून हो या मय हरकत हो इसे भी दिखाते -1- से ही है
कहीं कहीं लाम अल आखिर को  -लु- [जैसे मफ़ऊलातु  मे  फ़ अलु में ] से दिखाना/लिखना पड़ता है कि लाम पर मैने ’पेश’ की हरकत लगा दी है महज इस लिए कि आप इस लाम को मय हरकत समझे। तो 1...2  मे क्या अलामत लगाए? उर्दू वाले तो रुक्न देख कर समझ जाते है कि रुक्न का आखिरी हर्फ़ मय हरकत है या ब सकून है? इस विषय में हमें सोचना चाहिए। कभी मौक़ा मिला तो इस पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे।

1- मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ सालिम अल आखिर 
 [ फ़अ लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु---फ़ऊलुन
   21------ 121 ------121 ----122
इन पर ’तख़नीक़ ’ की अमल से 7 और अलग अलग रंगा-रंगी बहर बरामद हो सकती  है। अर्थात कुल मिला कर 8-बहर । और ख़ूबी यह कि तमाम आठों वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।आप चाहे तो ख़ुद एक कोशिश कर सकते है
[ एक सुराग दे रहा हूं --- यहाँ -फ़-  ,-लु- और ऊ का अ’[ऐन] [दो रुक्न मिला कर एक साथ]  तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गए तो इन पर  तख़नीक़ का अमल लग सकता है....]
 इन तमाम मुतख़्नीक़ बहर में एक बड़ी ही मक़्बूल और मानूस बहर  शामिल है जिसका मीर तक़ी ’मीर’ ने काफी प्रयोग किया है अपने अश’आर में । और वो वज़न है
22-22-22-22
2- मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ मुस्बीग़
 [ फ़अ लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु--- फ़ऊलान ]
   21------ 121 ------121 ----1221  
वैसे ही इन पर ’तख़नीक़ ’ की अमल से 7 और अलग अलग रंगा-रंगी बहर बरामद हो सकती  है ।अर्थात कुल मिला कर 8-बहर और ख़ूबी यह कि तमाम आठों वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।
इस वज़न में भी एक बड़ी ही दिलकश वज़न बरामद होती है और वो वज़न है
22-22-22-221

3- मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ 
     फ़अ लु......फ़ऊलु.....फ़ऊलु.... फ़ अल
      21-----121------121----12
  इस बहर से भी तख़नीक़ की अमल से  7-और अलग अलग मुतख़्नीक़ बहर बरामद हो सकती है\अर्थात कुल मिला कर 8-बहर और ख़ूबी यह कि तमाम आठों वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।
4-- मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ मक़्सूर
     फ़अ लु......फ़ऊलु.....फ़ऊलु.... फ़ऊ लु
      21-----121------121----121
   इस बहर से भी तख़नीक़ के अमल से 7 और अलग अलग मुतख़्नीक़ बहर बरामद हो सकती है अर्थात कुल मिला कर 8-बहर और ख़ूबी यह कि तमाम आठों वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।
अब हम 16- रुक्नी बहर [मुसम्मन मुज़ाइफ़] बहर पर कुछ चर्चा कर लेते हैं
5-  मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ मुज़ाइफ़ [16-रुक्नी ] इसका बुनियादी रुक्न है [यानी एक मिसरा मे 8-रुक्न]
फ़अ लु.....फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु -----फ़ऊ लु -----फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु ----फ़ अल
21-------121------121----------121--------121------121--------121-----12
और इस वज़न पर तख़्नीक़ के अमल से एक नही ,दो नही कुल 127 और वज़न [यानी कुल मिला कर 128 वज़न] बरामद हो सकती है ।और ख़ूबी यह कि तमाम वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता । डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब ने अपनी किताब -’मेराज-उल-अरूज़’ में अलग अलग कर के दिखाया भी है और आप भी दिखा सकते है
इसी 16-रुक्नी बहर से एक मुत्ख़्नीक़ बहर यह भी बरमद होते है  22-22-22--22-- 22-22-22-2  और यह बह्र मीर तक़ी मीर को इतनी प्रिय थी कि उन्होने इसका काफी प्रयोग किया है । शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ने इस को मीर का बह्र ही क़रार दे दिया ।बहरहाल मीर का आप ने वो मशहूर ग़ज़ल तो ज़रूर सुनी होगी

पत्ता पता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने वो ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

-यह ग़ज़ल इसी मानूस बहर में है

मीरे का ही एक दूसरा शेर इसी बहर में सुनाते है

उल्टी हो गईं सब तदबीरं कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

6-    मुतक़ारिब मुसम्मन  असरम मक़्बूज़ मक़्सूर मुज़ाइफ़ [16-रुक्नी] इसका बुनियादी रुक्न है [ यानी एक मिसरा मे 8-रुक्न]
फ़अ लु.....फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु -----फ़ऊ लु -----फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु ----फ़ऊ लु
21-------121------121----------121--------121------121--------121-----121

और इस वज़न पर तख़्नीक़ के अमल से एक नही ,दो नही कुल 127 और वज़न जैसा ऊपर देख चुके हैं [यानी कुल मिला कर 128 वज़न] बरामद हो सकती है । डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब ने अपनी किताब -’मेराज-उल-अरूज़’ में अलग अलग  कर के दिखाया भी है और आप भी दिखा सकते है
और चलते चलते
दो रुक्न 121-22 [यानी फ़ऊलु-फ़अ लुन] के मेल से  एक बड़ी ही दिलचस्प बहर भी बनती है

121-22 /121-22/121-22/121-22

देखने में तो एक मिसरा मे चार रुक्न दिखाई दे रहे है मगर दर हक़ीक़त यह 8-रुक्न है [यानी मुसम्मन मुज़ाइफ़] है  और इसका नाम  मुतक़ारिब मक़्बूज़ असलम मुसम्मन मुजाइफ़ है
इस बहर में शकील बदायूनी की एक ग़ज़ल का मतला और मक़ता पेश कर रहा हूँ  मुलाहिज़ा फ़र्माए

लतीफ़ पर्दो से थे नुमायां मकीं के जल्वे मकां से पहले
मुहब्बत आईना हो चुकी थी बुजूदे-बज़्म-ए-जहाँ से पहले

अज़ल से शायद लिखे हुए थे ’शकील’ क़िस्मत में जौर-ए-पैहम
खुली तो आंखे इस अन्जुमन में,नज़र मिली आस्मां से पहले

चलिए मतला की तक़्तीअ कर देता हूँ जिससे बात स्पष्ट हो जाये
  121-22      / 121 -22     / 12  1 - 2 2      / 1 2  1 -22       =121-22 /121-22//121-22/121-22
लतीफ़- पर्दो /से थे नु -मायां /मकीं के -जल् वे / मकां से -पहले
1  2   1-  2  2/1 2 1 -2  2   / 1 2 1-2   2/ 12  1-22 =121-22 /121-22//121-22/121-22
मु हब ब- ताई /ना हो चु-की थी/ बुजूद-बज़् मे/जहाँ से-पहले

एक बात ध्यान देने की है - उर्दू शायरी का मिजाज़ ऐसा है कि 16-रुक्नी बहर के mid मे यानी // एक ठहराव है और यह लाजिम भी है जिसे अरूज़ की भाषा में -’अरूज़ी वक़्फ़ा’ -कहते हैं
[ यहाँ  -से- ,-के-,-ना-  गो देखने में तो 2 का वज़न लग रहा है पर हम बहर की माँग पर इन सबकी मात्रा गिरा कर -1- की वज़न पर लेंगे और वैसे ही शे’र पढ़ेगे भी जो शायरी में जाइज़ है
’मुहब्बत आइना ’ में  अलिफ़ मद -यानी -आ- अपने सामने के लफ़्ज़ मुहब्बत के साथ मिल कर कर -’मुहब्बताइना’ की आवाज़ दे रही है जिसकी तक़्तीअ मु हब  ब ताई / ना [121-22] की वज़न पर ले लिया जिसको अरूज़ की भाषा में -अलिफ़ का वस्ल -कह्ते हैं यानी यहाँ अलिफ़ अपने सामने वाले हर्फ़ से वस्ल हो गया है [मिलन हो गया है] यही बात हिन्दी में भी है जिसे हम ’सन्धि’ कहते हैं।

मैं चाहूँगा कि मक़ता की तक़्तीअ आप खुद करें और मेरे कथनकी तस्दीक करें और गवाही दें
जब आप ने इतना कुछ बर्दास्त किया तो इस हक़ीर फ़क़ीर का भी  एक शे’र  बर्दास्त कर लें

बदल गई जो तेरी निगाहे    ,ग़ज़ल का उन्वा बदल गया है
जहाँ पे हर्फ़-ए-करम लिखा था ,वहीं पे हर्फ़-ए-सितम लिखा है

यहाँ पे एक बात ध्यान देने की है --जहाँ पे हर्फ़े-करम लिखा है - को अगर -जहाँ पर हर्फ़-ए-करम लिखा है - लिख दूँ तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा ? यक़ीनन भाव और अर्थ में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा और बहुत से लोगो को पता भी नहीं चलेगा इस में कमी क्या है
लेकिन अरूज़ दाँ तुरन्त पकड़ लेंगे । अब तो आप ने भी पकड़ लिया होगा अगर आप ने इतना कुछ पढ़ लिया है तो
पे-और-पर- में वज़न का फ़र्क आ जायेगा और मिसरा बे-बह्र हो जायेगा। क्यो?
तक़्तीअ में जहाँ -पे-आ रहा है वहाँ -1- वज़न की माँग है -पे की मात्रा तो गिरा सकते है पर -’पर’-[2] का वज़्न रखता है और इस में -र- गिराने की सुविधा नहीं है

नौ-मश्क़ शायर को इन बारीकियों पर ध्यान देना चाहिए वरना तो ’फ़ेस-बुक’ पर कुछ भी चस्पा कर दीजिये क्या फ़र्क़ पड़ता है 100-50 तो ’लाइक’ और वाह वाह करने वाले तो हमेशा तैयार रहते हैं

चलते चले हिन्दी फ़िल्म-" दो बदन’ का एक गाना सुनाते है आप ने भी सुना होगा जिसमे मनोज कुमार जीऔर आशा पारीख जी थी । लिन्क नीचे दे दिया हूँ ।यू ट्यूब पर उपलब्ध है सुनिए और लुत्फ़ अन्दोज़ होइए [आनन्द उठाइए] बहुत ही मार्मिक और दिलकश गाना है- और बताइएगा कि यह गाना किस ’बहर’ में है ।अगर आप को पसन्द आए तो इसी बहर में कोई अपना एक मिसरा भी गुनगुना सकते है

नसीब में जिसको जो लिखा था , वो तेरी महफ़िल में काम आया
किसी के हिस्से में प्यास आई ,किसी के हिस्से में जाम आया

मैं इक फ़साना हूँ बेकसी का ,ये हाल है मेरी ज़िन्दगी का
न हुस्न ही मुझको रास आया ,न इश्क़ ही मेरे काम आया
https://www.youtube.com/watch?v=mXQqmU4ds54

ख़ुदा ख़ुदा कर के बहर-ए-मुतक़ारिब की मानूस और राइज़ बहूर का बयान खत्म हुआ

मुझे उमीद है कि मुतक़ारिब बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
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सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 24 [मुतक़ारिब की मुज़ाहिफ़ बहर-2]

उर्दू बह्र पर एक  बातचीत :क़िस्त 24 [ मुतक़ारिब की मुज़ाहिफ़ बह्र-2 ] 

पिछली क़िस्त में हम बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन और मुसद्दस सालिम और उसकी मुज़ाइफ़ रुक्न पर चर्चा कर चुके हैं ।अब इस बहर की मुज़ाहिफ़ शकल की चर्चा करेंगे।

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है ]

आप ने हिन्दी फ़िल्म ’आरज़ू” का यह गाना ज़रूर सुना होगा >

ऎ फूलों की रानी बहारो की मलिका
तेरा मुस्कराना गज़ब  हो गया

न  दिल होश में है न हम होश में हैं 
नज़र का मिलाना गज़ब हो गया

 मगर आप ने कभी इस गाने के बह्र पर ध्यान न दिया होगा ज़रूरत भी नही थी । मगर हाँ ,जिन्हे शे’र-ओ-शायरी का ज़ौक़-ओ-शौक़ है उनके लिए --इस गाने का बह्र है     फ़ेऊलुन....फ़ेऊलुन....फ़ेऊलुन....फ़ेऊलुन   [122    --122---122---122-] बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम। तक़्तीअ कर के देख सकते हैं  मैने शुरु में ही कहा था कि बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम  बहुत ही सादा साधारण मगर दिलकश  बहर है और पुरानी हिन्दी फ़िल्मों के बहुत से दिलकश गाने इस  बह्र में लिखे गये हैं गाये गये हैं और पिक्चराइज़ किए गये है
आप ने हिन्दी फ़िल्म ’दो कलियाँ- का यह गाना भी ज़रूर सुना होगा

तुम्हारी नज़र क्यूं खफ़ा हो गई
ख़ता बख्श दो गर ख़ता हो गई

हमारा इरादा तो कुछ भी न था
तुम्हारी ख़ता खुद सज़ा हो गई

---तो यह किस बहर में है?
अगर आप तक़्तीअ करेंगे तो इस का वज़न उतरेगा    122---122---122---12
जी बिल्कुल सही यह भी बहर मुतक़ारिब ही है मगर अरूज़ और जर्ब के मुकाम पर [12] ज़िहाफ़ लग गया अत: बज़ाहिर यह बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन की कोई मुज़ाहिफ़ बहर ही  होगी ।देखते हैं क्या है?

यह तो आप जानते ही हैं कि बहर-ए-मुतक़ारिब की बुनियादी सालिम रुक्न है --फ़ऊ लुन  [1 2 2 ] = जो वतद-ए-मज्मुआ+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़  से बना है तो लाजिमन इस सालिम रुक्न पर वही ज़िहाफ़ लगेंगे जो वतद-ए-मज्मुआ और सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के लिए मुकर्रर है और शर्त यह भी जो 5-हर्फ़ी रुक्न पर लग सके ,कारण कि ’फ़ऊलुन [122] एक 5-हर्फ़ी रुक्न है
वतद-ए-मज्मुआ पर लगने वाले वो ज़िहाफ़ जो ’ फ़ऊलुन’ पर लग सकते हैं ----सलम----....बतर....
हम पहले भी लिख चिके है कि अगर ’फ़ऊलुन’ पर सलम या बतर का ज़िहाफ़ लगेगा तो क्या होगा } चलिए एक बार फिर देख लेते है
फ़ऊलुन [ 1 2 2 ]+ सलम  = फ़अ लुन् [2 2] [ऐन यहां बसकून है ]  और यह ’असलम कहलाता  है जो इब्तिदा और सदर से मख़्सूस है
फ़ऊलुन [1 2 2 ] +बतर    = फ़ अ [2]       [यहाँ भी ऐन बसकून है] और यह अबतर कहलाता है जो अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस है
सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले वो ज़िहाफ़ जो ’ फ़ऊलुन’ पर लग सकते हैं ----क़ब्ज़....क़स्र.....हज़्फ़-----तस्बीग़
ऊपर वाले जो मुफ़र्द जिहाफ़ में से कुछ आम ज़िहाफ़ हैं जो शे’र के किसी मुकाम पर लग सकते है ----
और कुछ ख़ास ज़िहाफ़ हैं जो शे’र के खास मुक़ाम सदर/अरूज़...इब्तिदा...जर्ब] पर ही लग सकते हैं जैसे ज़िहाफ़ सलम- इब्तिदा और सदर  मुक़ाम  के लिए ख़ास होते हैं [
अच्छा ,जब हम पिछले अक़सात [क़िस्तों ] में  ज़िहाफ़ात की चर्चा कर रहे थे  तो एक ज़िहाफ़ ’सरम; की भी चर्चा किए थे । सरम एक मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है जो दो ज़िहाफ़ से मिल कर बना है और वो दो ज़िहाफ़ हैं-ख़रम[सलम]+ क़ब्ज़ ।

अब आप कहेंगे  कि  ख़रम के साथ सलम क्यों लिख दिया । बात ये है कि वतद-ए-मज़्मुआ [3-हर्फ़ी लफ़ज़] के सर-ए-मज़्मुआ [यानी पहला हर्फ़-ए-हरकत] का सर काटना तो ख़रम कहलाता है और जब यही अमल जब ’फ़ऊलुन’ पे किया जाता है तो इस क्रिया का नाम ’सलम’ हो जाता है । काम एक ही है ,नाम अलग ।[अरूज़्दानों की मरज़ी-हा हा हा] ख़ैर
जब ’फ़ऊलुन’ पर सरम का अमल होगा तो क्या होगा ???

फ़ऊलुन [1 2 2] +सरम [यानी सलम+क़ब्ज़] = यानी दोनो ज़िहाफ़ का अमल एक साथ होगा तो हासिल होगा ’ फ़अ लु ’[ 21] -यानी अ-एन ब सकून है और लाम मय हरकत है और इसे ’असरम’ कहते हैं
आप अभी दो मुज़ाहिफ़ शकल याद रखे
फ़ऊलुन [122]  का असलम =  फ़अ लुन [2 2]
फ़ऊलुन [122]  का  असरम  = फ़अ लु   [2 1]
अब आप पूछेंगे कि इसकी क्या ज़रूरत है?
इन मुज़ाहिफ़ शकल पर जब तख़नीक़ का अमल   करेंगे तो इसी मुतक़ारिब बहर से 250 से ज़्यादा बहर और बरामद हो सकती है जो आपस में अदल-बदल [ बाहम मुतबादिल] की जा सकती है और बहर-ए-मुतक़ारिब के कलाम में  और रंगा रंगी पैदा की जा सकती है । हम यहाँ उन 250 बहूर की चर्चा नहीं करेंगे -कारण एक तो इसकी यहाँ ज़रूरत नहीं है और दूसरा किसी नए सीखनेवाले किसी दोस्त को इस stage पर confusion पैदा कर सकता है और मूल विषय out of Focus भी हो सकता है
अगर कभी मौक़ा मिला तो इस पर अलग से बातचीत करेंगे
हां , तख़नीक़ के बारे में पहले भी चर्चा कर चुका हूँ .एक बार फिर दुहरा दूँ कि ज़ेहन नशीन हो जाए
अगर किसी दो consecutive  ’मुज़ाहिफ़’ रुक्न में ’तीन मुतहर्रिक ’ एक साथ आ जाए तो -बीच वाला मुतहर्रिक ’हर्फ़’ -साकिन हो जाता है । इसे तख़्नीक़ का अमल कहते है और बरामद मुज़ाहिफ़ को ’मुख़्नीक़’ कहते हैं।

बात चली तो बात निकल आई

....पिछली क़िस्तों में बह्र-ए-मुतक़ारिब की सालिम बह्र [ मुरब्ब: मुसद्दस,मुसम्मन और इनकी  मुज़ाइफ़ शकल  ] पर बातचीत  की थी और जहाँ तक सम्भव हुआ कुछ मिसालें भी दी थी। वैसे तो हर बहर पर तात्कालिक [तुरन्त] मिसाल मिलना तो मुश्किल है कारण कि शायरों ने ऐसे बहूर में कम ही शायरी की है जैसे मुतक़ारिब  मुरब्ब: सालिम बह्र या मुसद्दस मुज़ाइफ़ या मुसम्मन मुज़ाइफ़ में । इस बह्र मे सबसे ज़्यादा मक़्बूल [लोकप्रिय] शकल मुतक़ारिब मुसम्मन [8-रुक्नी बहर] ही  है जिस की सबसे ज़्यादा मिसाल मिलती हैं । उसी प्रकार इसी सालिम बह्र की मुज़ाहिफ़ की सभी शकल में मिसाले प्रचुर मात्रा में नहीं मिलती ।इक्का-दुक्का मिल जाए तो अलग बात है । अमूमन मुरब्ब: में कोई ख़ास शे’र कहता  नहीं } बहर-ए-मुतक़ारिब पर कौन कौन से ज़िहाफ़ लगते हैं या लग सकते है ,ऊपर लिख चुका हूँ और साथ ही उन ज़िहाफ़ात का अमल कैसे होता है उस पर भी चर्चा कर चुका हूँ अत: आप चाहे तो ख़ुद साख़्ता शे"र उन तमाम मुमकिनात [संभावित] ज़िहाफ़ लगा कर कह सकते है या अभ्यास कर सकते है ।यहाँ सिर्फ़ उन्ही  मुतक़ारिब के मुज़ाहिफ़ शकल की चर्चा करेंगे जो आजकल काफी प्रचलित है मानूस है  राइज़ है और अमूमन आम शायर जिसमे कसरत से [अधिकांश] शे’र या ग़ज़ल कहता है।। बेहतर होगा कि हम अपनी चर्चा मुतक़ारिब के मुसद्दस और मुसम्मन मुज़ाहिफ़  तक ही महदूद [सीमित] रखें
आलिम जनाब कमाल अहमद सिद्दीकी साहब के हवाले से एक शे’र बतौर मिसाल लिख रहा हूँ

ग़मज़े समझ लो .समझो अदाएं
उसकी वफ़ाएं ,उसकी ज़फ़ाएं

अब इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं
22       / 122       /  2  2    / 1 2 2   = 22-122 /   22-122
ग़म ज़े /स मझ लो /.सम झो /अ दाएं
2     2   / 1  2  2 / 2   2    /1  2 2   =   22-122 /  22-122
उस की /व फ़ाएं /,उस की /ज़ फ़ाएं
और इस बहर का नाम है-- बहर-ए-मुत्क़ारिब असलम सालिम मुरब्ब: मुज़ाइफ़-- यानी बहर तो छोटी सी नाम बड़ा सा --हा हा हा हा
ये नाम इस लिए कि इस बहर में ’फ़ऊलुन[1 2 2] प्रयोग हुआ है अत: बहर-ए-मुत्क़ारिब हुआ
22- जो फ़ऊलुन का  ’असलम’ है [उपर देखें ] अत: असलम लिखा और उसके बाद सालिम [122] आया तो असलम सालिम लिख दिया
22-122 यानी मिसरा में दो रुक्न आया है [शे;र मेम चार बार ] तो मुरब्ब: लिख दिया
मगर ये निज़ाम दुहराया गया है मिसरा में यानी [22-122/22-122] तो मुज़ाइफ़ [दो गुना] लिख दिया
अब पूरा नाम हो गया --- बहर-ए-मुत्क़ारिब असलम सालिम मुरब्ब: मुज़ाइफ़

1- बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन  महज़ूफ़ [122 --122---122---12] फ़ऊलुन---फ़ऊलुन---फ़ऊलुन--फ़अल्
फ़ऊलुन् [122] + हज़्फ़् = फ़अल् [12] -आप् याद् करे जब ज़िहाफ़ हज़्फ़ की चर्चा कर रहा था तो लिखा था सबब-ए-ख़फ़ीफ़ जिस पर रुक्न ख़त्म होता है को साक़ित करना [यानी उड़ा देना शान्त कर देना] ’हज़्फ़’ कहलाता है यानी ’लुन’ को उड़ा दिया तो बचा फ़ ऊ [12] जिसे ’फ़ अल् [12] से बदल लिया तो बहर को मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम महज़ूफ़ कहते हैं
अब ऊपर जो गाना लिखा है

तुम्हारी नज़र क्यूं खफ़ा हो गई
ख़ता बख्श दो गर ख़ता हो गई

हमारा इरादा तो कुछ भी न था
तुम्हारी ख़ता खुद सज़ा हो गई
 -अब बताइए कि यह किस बहर में है
तक़्तीअ कर के देखते हैं
1 2  2   / 1 2  2  /  1 2   2  /12
तुम्हारी / नज़र क्यूं /खफ़ा हो/ गई
1  2   2   /  1  2   2  /1 2  2/1 2
ख़ता बख़/ श दो गर /ख़ता हो /गई
1 2  2 / 1 2 2/ 1 2   2   / 1 2
हमारा /इरादा /त कुछ भी/ न था
1 2  2 /  1  2  2   / 1 2   2 / 12
तुम्हारी /ख़ता खुद/ सज़ा हो/ गई

[नोट आप ज़रा लफ़ज़ ’बख़्श’ पर ध्यान दें । अगर हम बोल चाल मे ’बख़्श’ बोलेंगे तो यह [हरकत+ साकिन+साकिन] के वज़न पर होगा मगर तक़्तीअ में ’श’ [ फ़े-की जगह पर है जो बहर में हरकत की वज़न मांग कर रहा है] जो शायरी में जाइज़ है ।अत: गाने के समय ’श’ पर हल्का सा ज़बर आयेगा ] क्योंकि बहर की  माँग है और यह हल्का वज़न गाने में आप को सुनने में महसूस भी न होगा
इसी बहर में 1-2 मिसाल और देखते  हैं
मीर तक़ी मीर का एक शे’र है

फ़क़ीराना आए सदा कर चले
मियां ख़ुश रहो हम दुआ कर चले

कहें क्या जो पूछे कोई हम से ’मीर’
जहाँ में तुम आए थे क्या कर चले 

यह अश’आर भी बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ में है।तक़्तीअ कर के आप खुद इस की गवाही दे सकते हैं

अल्लामा इक़बाल साहब की एक लम्बी नज़्म है साक़ीनामा
चन्द अश’आर पेश है
हक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गई
यह उम्मत रवायात में  खो गई

गया दौर-ए-सरमायादारी गया
तमाशा दिखा कर  मदारी  गया  

यह अश’आर भी बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ में है।तक़्तीअ कर के आप खुद इस की गवाही दे सकते हैं

2-बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन  मक़सूर [122---122---122--121 ]  फ़ऊलुन----फ़ऊलुन---फ़ऊलुन---फ़ऊल् [ ल् -यानी लाम साकिन है यहाँ ]
 फ़ऊलुन [122] +क़स्र ज़िहाफ़ = फ़ऊल् [121]

अगर् आप को याद होगा जब कस्र ज़िहाफ़ का ज़िक्र कर रहा था तो लिखा था
अगर किसी रुक्न के आखिर में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो तो इसके आखिरी  साकिन [लुन का नून]को गिराना और उसके पहले वाले हर्फ़ [लाम को ] को साकिन कर देना  ज़िहाफ़ क़स्र का काम है और जो रुक्न बचता है -फ़ऊ ल् -उसे मक़्सूर कहते है<
अत्: पूरे बहर का नाम होगा - बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर
उदाहरण
इक़बाल साहब का एक शे’र उसी नज़्म [साक़ीनाम] से ही

फ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूर
ठहरते नहीं आशियां  में  तयूर

तयूर = पक्षी ,इसी से ताइर या ताइराना लफ़्ज़ बना है [ताइराना का मतलब होता है विहंगम दृष्टि से या a bird's eye view]
इसकी तक़्तीअ करते हैं
1  2   2  / 1   2  2 / 1 2  2/ 1 2 1
फ़ज़ा नी /लि नी ली / ह वा में /सुरू र
1  2   2 / 1 2  2   /1 2   2  /1 2 1
ठ हर ते /नहीं आ /शियां  में  /तयूर

यहां पहला ’नीली’ को ’नीलि [21] के वज़न पर लिया गया है ।क्या करें ? बह्र की माँग ही है उस मुक़ाम पर जो उर्दू शायरी में जाइज़ भी है इसे Poetic Liscence कहते हैं। जहाँ तक सम्भव हो यह ’पोयेटिक लाईसेन्स] -कम से कम ही प्रयोग करना पड़े तो अच्छा ।
एक दिलचस्प बात और ....

इस बहर में  अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ही ज़िहाफ़ लग रहा है तो बज़ाहिर यह ख़ास ज़िहाफ़ ही होगा और यह दोनो ज़िहाफ़ -महज़ूफ़-और मक़्सूर आपस में बाहम तबादिल भी है यानी आपस में अदला-बदली भी किए जा सकते हैं  किसी शे’र में अगर मिसरा ऊला में में महज़ूफ़ लगा है और मिसरा सानी में मक़्सूर है तो आपस मे बदले भी जा सकते है यानी मिसरा उला में मक़्सूर और मिसरा सानी में महज़ूफ़ लाया जा सकता है। ये तो ठीक है । तो फिर बहर का नाम क्या होगा ? उसे मक़्सूर कहेंगे कि महज़ूफ़ कहेंगे?
जी बहर का नाम -मिसरा सानी -में आप ने जो ज़िहाफ़ प्रयोग किया है उसी से निर्धारित होगा ।यानी मिसरा सानी में आप ने मक़्सूर ज़िहाफ़ लगाया है तो बहर का नाम होगा -बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन मक़्सूर [ अल आखिर] । अल आखिर इस लिए जोड़ देते हैं कि पता रहे कि ज़िहाफ़ किस मुकाम पर लगा है । क्लासिकल अरूज़ की किताब में ’अल आखिर’ का ज़िक्र नही है पर आधुनिक बहर की नामकरण की पद्धति में -इसका प्रयोग करते है ।इस पर चर्चा कभी बाद में करेंगे।

इसी प्रकार हम बहर-ए-मुतक़ारिब मुसद्दस महज़ूफ़ और बहर-ए-मुतक़ारिब मुसद्दस मक़्सूर भी समझ सकते हैं या इसकी मुज़ाइफ़ शकल भी समझ सकते हैं

अगली किस्त में  हम मुतक़ारिब के ऐसे मुज़ाहिफ़ शकल [असलम और असरम ] की बात करेंगे जिस से  ग़ज़ल में ज़्यादा  रंगा रंगी आती है जिस से बहर और दिलकश हो जाती है।


--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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सोमवार, 30 जनवरी 2017

एक क़ता

                     एक क़ता

खुशियाँ चली गई हैं  मुझे कब की छोड़ कर 
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ,ख़ैर !

दो चार गाम चल के , गए  रास्ता बदल 
जीने को लोग जीते हैं  अपनों के भी बग़ैर 

रखना दुआ में याद कभी इस हक़ीर को 
जो आशना तुम्हारा जिसे कह रही हो ग़ैर

जिस मोड़ पर मिली थी ,वहीं मुन्तज़िर हूँ मै
काबा यहीं है मेरा यहीं आस्तान-ए-दैर 


-आनन्द पाठक-
08800927181
शब्दार्थ 
दो-चार गाम = दो चार  क़दम 
हक़ीर          = तुच्छ [कभी कभी लोग स्वयं को अति विनम्रता से भी कहते हैं]
आशना        = चाहने वाला 
मुन्तज़िर       =प्रतीक्षारत
आस्तान-ए-दैर = तुम्हारे दहलीज का पत्थर

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 23 [बह्र-ए-मुतक़ारिब-1]

उर्दू बह्र पर  बातचीत : क़िस्त 23 [ बह्र-ए-मुतकारिब -1]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है ]

नोट : चूँकि किसी बह्र पर पूरी  चर्चा , किसी एक क़िस्त में समेटना संभव नहीं है अत: पाठकों की सुविधा के लिए हर बह्र के आगे 1---2---3---4 लिखते चलेंगे ।  क़िस्त अपनी रौ में राह-ए-रवा रहेगी ]

.......---पिछली क़िस्त में हम उर्दू शायरी में प्रचलित 19-बह्र के नाम लिख चुके हैं  जिसमें पहला नाम बह्र-ए-मुतक़ारिब था।सच तो यह है कि क्लासिकी अरूज़ में यह बह्र पहले नं0 पर नहीं आती  बल्कि इस बहर का सबसे बाद में इज़ाद हुआ और वो भी हिन्दी के गीतो से वज़ूद में आया ।परन्तु हिन्दी पाठकों की सुविधा के लिए मैने इसे पहले लेना  मुनासिब इस लिए समझा कि यह बहर बड़ी ही आसान ,सरल,सहज,दिलकश लोक प्रिय , गेय , संगीतमय मारूफ़ और मानूस बह्र है । यही कारण है कि हिन्दी फ़िल्मों में बहुत से गाने इसी बह्र में लिखे गये जो आज भी उतने ही लोकप्रिय कर्णप्रिय  है जितने कल थे। लगभग सभी प्रसिद्ध शायरों ने इस बह्र में शायरी की है और हमारे नौ-मश्क़ [ उभरते हुए ]शायर अमूमन इसी  बह्र् से शायरी की शुरुआत करते है ।
हिन्दी में  हिन्दी कवियों ने भी इसी बहर  में [छन्द ] कहें  और बहुत ही  ही लोकप्रिय  मधुर  गीत दिए हैं ।

इस बहर का बुनियादी रुक्न है      फ़ऊलुन..........फ़ऊलुन ------फ़ऊलुन-----फ़ऊलुन
  1 2  2  -------1 2 2 -------1 2 2............  1  2  2 .
इस बह्र के मुरब्ब: सालिम या मुसद्द्स सालिम में बहुत कम अश’आर कहें गए है ।ज़्यादा तर अश’आर या ग़ज़ल मुसम्मन सालिम और उसकी मानूस मुज़ाहिफ़ शकल में  ही कहीं गईं हैं ।इसी लिए मुरब्ब: सालिम  और मुसद्दस सालिम की मिसाल ज़्यादा नहीं मिलती ।हमारे नौ जवान शायर आगे आने वाले दिनों में इस बहर में ग़ज़ल कहना पसन्द करें ।
सालिम रुक्न फ़े’अलुन कैसे बनता है -पहले बता चुके है ।एक  वतद-ए-मज्मुआ+ एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से बनते हैं
इस क़िस्त में चर्चा बहर-ए-मुतक़ारिब-सालिम की हे करेंगे   ।बह्र-ए-मुतक़ारिब मुज़ाहिफ़ की चर्चा अगली क़िस्त में करेंगे
1-बह्र-ए-मुतकारिब मुरब्ब: सालिम :- एक शे’र  देखें -
122---122      यानी    फ़ऊलुन----फ़ऊलुन
122---122  यानी    फ़ऊलुन-----फ़ऊलुन

मुतकारिब इस लिए कि शे’र में रुक्न [फ़ऊलुन 122] का प्रयोग किया गया है ,मुरब्ब: इस लिए कि शे"र में 4-बार [यानी मिसरा में 2बार प्रयोग किया गया है ।इसकी मिसाल तो कम है और बहुत कम शायरों ने ,लगभग  न के बराबर या कहें कि आँटा मे नमक के बराबर ही प्रयोग किया है ।चन्द अरूज़ी असातिज़ा [ उर्दू छन्द शास्त्र के गुरुजन ] ने खुद-साख़्ता [यानी ख़ुद की बनाई शे’र [उदाहरण/मिसाल  देने के लिए] गढ़े  हैं ..शे’र में शे’रीअत  या मयार की बात नहीं बल्कि बात समझाने के लिए गढ़ा गया है ।  समझाने के लिए इस हक़ीर फ़क़ीर ने ऐसा ही एक ख़ुद  साख़्ता [स्वयं की बनाई हुई] शे’र गढ़ा है [ यहाँ मयार और शे’रिअत का पास [ख़्याल ]न रखियेगा
  इशारों की बातें 
न आई जुबाँ पर
कहानी मगर लिख
दिया आसमाँ पर
किसी शे’र या मिसरा के सही वज़न की जाँच -बह्र में है या बहर से ख़ारिज़ है -का सबसे मुस्तफ़ीद और मुस्तनद [ सही और प्रामाणिक ] विधि त्तो ’तक़्तीअ- करना ही होता है। तक़्तीअ करने के कुछ अपने उसूल होते हैं और खुद में  यह एक अलग से विषय है जिस पर हम  कभी आगे  चर्चा करेंगे। फिर भी हम यहाँ रुक्न के वक़्फ़ा  को /......./........./......./  से दिखायेंगे कि मिसरा या शे’र वज़न में है या नहीं?

अब इसकी तक़्ती’अ कर के देख लेते है
1 2  2  / 1  2  2
इ शा रों / की बा तें  [ यहाँ -की- को बहर के वज़न की माँग पर 2- के बजाय -1- पर लिया जायेगा ]
1   2  2 / 1 2 2
न आ ई / जु बाँ पर
1  2    2  / 1 2  2
क हा नी /म गर लिख
1   2   2   / 1 2  2
दि या आ /स माँ पर
यानी मिसरा में 2-और शे;र में  4- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है
इस बह्र में एक बात ध्यान देने की है -चूँकि  मिसरा उला  में 2-ही रुक्न होते है और वो मुक़ाम है सदर--अरूज़ का ]यानी इस बहर के शे’र में ’हस्व’ का मुकाम  नही होता
यही बात मिसरा सानी में भी है } इस में भी दो रुक्न का मुक़ाम   इब्तिदा---जर्ब  का है और इस में भी हस्व का मुकाम नहीं होता । अर्थात  बह्र-ए--मुतक़ारिब मुरब्ब: सालिम में ’हस्व’ का मुकाम नहीं होता

2- बह्र-ए-मुतकारिब मुसद्दस सालिम :  इसका बुनियादी शकल है

फ़ऊलुन---- --फ़ऊलुन--------फ़ऊलुन  [यानी   122------122------122
फ़ऊलुन-------फ़ऊलुन--------फ़ऊलुन  [यानी  122-------122------122

मुतकारिब इस लिए कि शे’र में रुक्न [फ़ऊलुन 122] का प्रयोग किया गया है ,मुसद्दस इस लिए कि शे"र में 6-बार [यानी मिसरा में 3 बार प्रयोग किया गया हैऔर सालिम इस लिए कि यह रुक्न [फ़ऊलुन 122] अपनी सालिम शकल में ही प्रयोग हुआ है बिना किसी काट-छाँट के कतर-व्योंत के या बिना किसी ज़िहाफ़ के। इनकी मिसाल भी कम ही दस्तयाब [प्राप्त]  है ।फिर भी पर आलिम उस्ताद  डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से एक शे’र पेश करता हूँ
बहाती रहीं   अश्क आंखे
गुज़रती रही शाम-ए-फ़ुरक़त
इसकी तक़्ती’अ कर के देखते हैं
1 2 2   / 1 2  2/   1  2 2
ब हा ती / र हीं अश्/ क आं खे
1   2   2  / 1 2  2/  1  2    2
गु ज़र ती / रही शा /म-ए-फ़ुर क़त
यानी मिसरा में 3-और शे;र में 6- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है

-ए- यहाँ इज़ाफ़त है --इसके बारे में इसी किस्त में नीचे   चर्चा की है
एक शे’र और देखें [आलिम जनाब कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब के हवाले से]

पहुँचती है कू-ए-मलामत
हमारी ख़बर हम से पहले
अब इस की तक़्तीअ भी देख लेते हैं
1  2     1 / 1  2  2  / 1 2  2
प हुँच ती / है कू-ए-/म ला मत
1  2   2/ 1 2  2     / 1  2  2
ह मारी /ख़ बर हम /से पह ले
यानी मिसरा में 3-और शे;र में 6- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है
3- बह्र-ए-मुतकारिब मुसम्मन सालिम :  यह बहुत ही मक़्बूल बहर है और अमूमन सभी शायरों ने इस बहर में या इसकी मुज़ाहिफ़ बहर में कुछ न कुछ ग़ज़ल ज़रूर कहे है }और इसके मिसाल एक नहीं दो नहीं सैकड़ों मिल जायेंगी । हर नौ-मश्क़ शायर अपनी शायरी की शुरुआत अमूमन इसी बहर से करता है ---
इस की बुनियादी शकल यूँ है
फ़ऊलुन-------फ़ऊलुन------फ़ऊलुन-----फ़ऊलुन   [यानी  122----122-----122-----122
फ़ऊलुन--------फ़ऊलुन-------फ़ऊलुन----फ़ऊलुन [यानी   122----122------122----122
 अल्लामा इक़बाल साहब का एक  शे’र देखें -बहुत मशहूर शे’र है

सितारों से आगे जहाँ और भी है
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ  और भी हैं
मुतकारिब इस लिए कि शे’र में रुक्न [फ़ऊलुन 122] का प्रयोग किया गया है ,मुसम्मन इस लिए कि शे"र में 8-बार [यानी मिसरा में 4-बार और सालिम इस लिए कि यह रुक्न [फ़ऊलुन 122] अपनी सालिम शकल में ही प्रयोग हुआ है बिना किसी काट-छाँट के कतर-व्योंत के या बिना किसी ज़िहाफ़ के।इस की तक़्तीअ कर के देखते हैं
1 2  2  /  1  2  2 / 1 2  2 / 1 2 2
सि ता रों / से आ गे /ज हाँ औ/ र भी है
1 2  2  /  1  2  2 / 1 2  2 / 1 2 2
अ भी इश्/ क़ के इम्/ति हाँ औ/ र भी हैं
यानी मिसरा में 4-और शे;र में 8- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है
उमीदन ,बात साफ़ हो गई होगी
चलिए  हिन्दी फ़िल्म का एक गाना सुनाते हैं आप ने भी सुना होगा -कश्मीर की कली का है -बहुत ही मधुर गीत है

इशारों इशारों में दिल लेने वाले 
बता ये हुनर तूने  सीखा कहाँ से
निगाहों निगाहों से जादू चलाना
मेरी जान सीखा है तूने  जहाँ से 

ये गीत भी इसी बहर में है -मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम ।मुतकारिब इस लिए कि शे’र में रुक्न [फ़ऊलुन 122] का प्रयोग किया गया है ,मुसम्मन इस लिए कि शे"र में 8-बार [यानी मिसरा में 4-बार और सालिम इस लिए कि यह रुक्न [फ़ऊलुन 122] अपनी सालिम शकल में ही प्रयोग हुआ है बिना किसी काट-छाँट के कतर-व्योंत के या बिना किसी ज़िहाफ़ के।इस की तक़्तीअ कर के देखते हैं
  1 2  2    / 1 2 2   /  1 2   2/ 1 2 2
इ शा रों /इ शा रों /में दिल ले/ने वा ले
1  2 2  / 1 2  2 / 1  2  2  / 1 2 2
ब ता ये / हु नर तू/ ने  सी खा /क हाँ से
1 2   2/  1 2  2 / 1 2  2/  1 2 2
नि गा हों / नि गा हों /से जा दू /च ला ना
1  2  2  / 1 2  2 / 1 2  2/ 1 2 2
मे री जा/ न सी खा /है तू ने  / ज हाँ से
यानी मिसरा में 4-और शे;र में 8- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है
इसी बह्र में हिन्दी फ़िल्म अप्रिल फ़ूल -के गाने का मुखड़ा सुनाते हैं -बड़ा ही दिलकश गाना है -आप ने भी सुना होगा

तुम्हें प्यार करते है करते रहेंगे
कि दिल बन के दिल में धड़कते रहेंगे
अब इस की तक़्तीअ कर के देखते है
1  2  2  /1  2  2  / 1  2  2  / 1 2 2
तु म्हें प्या/ र करते /है करते /  रहेंगे     [यहाँ तुम्हें के =म्हें- को वज़न की माँग  पर -मे- का वज़न 2 लेंगे
1  2  2 / 1 2 2 /   1 2  2/  1 2 2
कि दिल बन/ के दिल में /धड़कते /रहेंगे
यानी मिसरा में 4-और शे;र में 8- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है

अगर आप ध्यान से ऊपर देखे तो मैने -में....ने....से....है....के--[ऐसे ही और बहुत से ] को मैने 1[ हरकत]  की वज़न पर लिया है जब कि दर हक़ीक़त इसे -2- [सबब] की वज़न पर लेना चाहिए था । एक कारण तो यही है कि उस मुक़ाम पर बहर की माँग थी  -जहाँ पर फ़’ऊलुन का ’फ़े’ [हरकत] आता है अत: हमें इन लफ़्ज़ को गिरा कर शे;र पढ़ना था तभी बहर क़ायम रह सकती थी --लय क़ायम रह सकता है और गाते वक़्त या तलफ़्फ़ुज़ [शे’र की अदायगी वक्त] इसे हल्का सा दबा कर पढ़ना है  । इस गिराने या दबाने से शे’र के मानी में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है और तरन्नुम  भी क़ायम रहता है । यह अमल उर्दू शायरी में जायज है । हिन्दी छन्द में शब्द के गिराने या दबाने की सुविधा नही है -बल्कि वहाँ दो लघु को [1 1] को एक गुरु [2] या vice versa समझने की सुविधा है } क्यों कि हिन्दी के छन्द ’मात्रिक वर्ण’ पर आधारित होते हैं

अगर इस गाने को  -कि दिल बन कर  दिल में धड़कते रहेंगे - गायें तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा ? अर्थ और भाव में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा मगर....
अरूज़ के लिहाज से फ़र्क़ पड़ेगा -मिसरा बहर से ’खारिज़’ हो जायेगा । बे-वज़न हो जायेगा } गायक को गाने में दिक़्क़त पेश आयेगी । देखिए कैसे ?
सवाल यह कि मिसरा -कि दिल बन कर दिल में धड़कते रहेंगे-भाव और अर्थ से तो ख़ारिज़ नहीं हो रहा है तो बह्र से क्यूँ ख़ारिज़ हो जायेगी?आप आँख बन्द कर शे’र पढ़े आप को खुद महसूस होगा कि शे’र के ’प्रवाह’[ Flow] में कुछ बाधा पड़ रही है -smooth ’ प्रवाह नही है कहीं न कहीं कुछ खटक रहा है -खटक इस लिए रहा है ये मिसरा बहर से खारिज़ जो है ।

कि दिल बन कर दिल में धड़कते रहेंगे-की तक़्ती’अ करते है
1   2      2   / 2   2      2   /1  2  2/ 1  2 2
कि दिल बन/ कर दिल में /ध ड़क ते /र हें गे
आप -कर- और -के- पर ध्यान दें। पहले गाने [मूल गीत] में -के- है जिसका वज़न -1-पर है  लेकिन तबादिल शे’र में  वहाँ ’कर’ है जिसका वज़न -2- है [ कर को दबा कर-क- तो नहीं पढ़ सकते है न]। अब यह तबादिल [बदला हुआ ] मिसरा सालिम के वज़न में नहीं रह पायेगा   [2 2 2 ] हो जायेगा जो  फ़ऊलुन का वज़न भी नहीं है
इसी लिये कहते हैं कि  शे’र [गज़ल] इतनी नाज़ुक होती है बिला ज़रूरत यह एक भी मज़ीद [अतिरिक्त] हर्फ़ तक -न ज़्यादे न कम - बर्दास्त नहीं  कर सकती ---लफ़्ज़ की तो बात ही छोड़ दीजिये
जो आलू-प्याज की तरह अश’आर कहे और लिखे जाते हैं उनमें 100-50 ग्राम वज़न में इधर उधर हो जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है मगर सो शे’र  सोने सा ख़रा मयारी और सच्चा शे’र होता है 1-2 मिली ग्राम का भी-वज़न  इधर उधर का बर्दास्त नहीं कर सकता।
अगर आप अरूज़ जानते हैं , समझते हैं तो ये फ़र्क़ भी आप आसानी से समझ जायेंगे वरना तो फ़ेसबुक पर तो हर तीसरा आदमी ग़ज़ल और शे’र कह रहा है ..और ग़लतियों की निशान्दीही कीजिये तो बुरा मान जाते हैं लोग
लेकिन एक सच  यह भी है  शे’र  कहना और लिखना जितना आसान समझते हैं लोग उतना ही मुश्किल है ----ये तो  बाज़ार है --जो चलता है वही बिकता है....अब तो  बे-वज़न और बे बह्र -बेमज़ा-रुखे -ग़ैर मयारी शे’र पर भी 100-200  वाह वाह करने वाले मिल जाते हैं ..उन्हें अरूज़  से  क्या लेना-देना है?

पर हाँ ,यह भी सच है कि social media पर अभी भी कुछ लोग हैं जो बह्र-वज़न-तफ़ाईल का पास [ख़याल] रखते हैं  पर ऐसे लोग बहुत कम हैं
 खैर इल्म तो इल्म है-सीखने में क्या हरज है --जानेंगे तभी तो सही या ग़लत का फ़र्क कर सकेंगे।
अब बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम के दो चार अश’आर लिख रहे हैं । तक़्ती’अ कर के आप ख़ुद जाँच लीजियेगा

(1)   जहाँ तेरा नक़्श-ए-क़दम देखते हैं 
ख़ियाबां ख़ियाबां इरम  देखते है

बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ’ग़ालिब’
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं -ग़ालिब

(2) जो इस शोर से ’मीर’ रोता रहेगा
तो हमसाया काहे को सोता रहेगा 

मुझे काम रोने से अकसर है ,नासेह !
तू कब तक मेरे मुँह को धोता रहेगा -मीर-

(3)  तू तायर है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमां और भी हैं

गए दिन कि तनहा था मैं अन्जुमन में
यहाँ अब मेरे राजदां  और भी हैं  -इक़बाल-

(4) जुनूं से गुजरने का जी चाहता है
हँसी जब्त करने का जी चाहता 

वो हमसे ख़फ़ा हैं ,हम उन से ख़फ़ा हैं
मगर बात करने का जी चाहता  है  -शकील बदायूनी-

[ नोट  हम उनसे खफ़ा हैं --की तक्ती’अ करेंगे तो बह्र की माँग पर इस की तक़्ती’अ होगी
1   2  2  / 1 2 2
ह मुन से / ख़फ़ा है --कारण कि हम का ’म’ सामने के -उ- से वस्ल [मिल कर] हो कर  -मु- की आवाज़ सुनाई देगी और यही तलफ़्फ़ुज़ तक्तीअ मे भी लिया जायेगा। अत: शकील बदायूनी का यह शे’र पूरे वज़न में है ]

और अन्त में
अब राक़िम -उल-हरूफ़ यानी इस हक़ीर का भी एक शे’र बर्दास्त कर लें जो हर मज़्मून  के आखिर में लिखता रहा हूँ

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

फ़ैसला आप कीजिये कि यह शे’र किस बहर में है और इसका पूरा नाम क्या होगा ? अच्छा पकड़ लिया ? मुबारक आप को कि अब आप ने समझ लिया कि बहर-ए-मुताक़ारिब मुसम्मन सालिम क्या होता है ।शुक्रिया।
 ऐसे और भी बहुत से अश’आर आप को मिल जायेंगे सब का सब यहां लिखना मुमकिन भी नहीं है । मुझे लगता है कि अब आप कम अज कम [कम से कम] -मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम - में कहे गए अश’आर या ग़ज़ल तो आप पहचान ही सकते है ।अगर आप गुनगुना कर इसे कई बार दुहराए तो आप को पता चल जायेगा कि वज़न कहाँ से ख़ारिज़ हो रही है या बह्र कितनी मक़्बूल है
एक बात और  
यहां लिखने के लिए भले हम ----तेरा---मेरा--तू---तो---जो--- लिख दिए हों पर बह्र की माँग पर इसे
तिरा ---मिरा....तु----तो [को हल्का सा दबा कर] ---जो-- [को हल्का सा दबा कर] ही पढ़ेंगे  और उर्दू शायरी में यह जाइज है कारण कि उर्दू शायरी तलफ़्फ़ुज़ से चलती है  और तक़्तीअ में भी इसे वक़्त ज़रूरत -1- के वज़न पर ही लेंगे।
एक बात और
आप जो ऊपर तमाशा-ए-अहल-ए-करम या ऐसे ही और भी लफ़्ज़ जैसे दिल-ए-नादां... जाने-मन .. बाज़ीचा-ए-एतफ़ाल...जिसे इज़ाफ़त-ए-कसरा या सिर्फ़ इज़ाफ़त  भी कहते है और  जो -ए- आप देख रहे हैं , तक़्ती’अ में ,बहर की माँग पर आप चाहे तो पहले वाले हर्फ़ से जोड़ कर [यानी वस्ल कर] -2- की वज़न पर ले सकते है और न चाहें तो -1- की वज़न पर ही रहने दे  सकते हैं । शायर की मर्जी । इसे शायरी में poetic liscence कहते हैं । मगर नस्र में यह छूट हासिल नही है । नस्र में ऐसे लफ़्ज़ को ’खीच कर’ नहीं पढ़ेंगे यानी नस्र में दिल-ए-नादां को दिले नादां नहीं पढ़ेंगे बल्कि दिल के -ल-पर पर एक हल्का सा दबाव [हल्का सा जबर की हरकत देकर] पढ़ेगे । याद कीजिये जब हम सबब और वतद की परिभाषा लिख रहे थे तो कहा था इज़ाफ़त की तर्क़ीब  =दिल् [सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् ] को दिल [ सबब्-ए-सक़ील् ] कर् सकते  है वरना तो उर्दू में -सबब-ए-सक़ील का कोई लफ़्ज़ ही नही मिलेगा और न ही  वतद-ए-मफ़रुक़ का ही [यानी जिस लफ़्ज़ के अन्त में ’मुतहर्रिक ’आता हो।
ठीक यही बात शब-ओ-रोज़ -----रंजो-ग़म.........गुलो-बुलबुल......जिसे हम इत्फ़ या अत्फ़ कहते है  पे भी लागू होती है ।इस case में भी वही poetic Liscence हासिल है ।
जब तक़्तीअ कैसे करते हैं और इसके क्या क्या उसूल है -की चर्चा करेंगे तो यह चर्चा तफ़्सील से वहां भी करेंगे।
अब कुछ चर्चा ’मुज़ाइफ़’ की भी कर लेते है
मुज़ाइफ़ का उर्दू  लग़वी [शब्द कोशीय ] माने होता है -किसी चीज़ को दो गुना -करना यानी मुसद्दस मुज़ाइफ़ का माने हुआ 6x2 =12 यानी वो शे’र जिसमें 12 सालिम  रुक्न का इस्तेमाल हुआ हो [यानी एक मिसरा मे 6 रुक्न] । कभी कभी इसे 12-रुक्नी बहर भी कहते है
उसी प्रकार ’मुसम्मन मुज़ाइफ़; का माने हुआ 8x2=16 यानी वो शे’र जिसमें 16-सालिम रुक्न का इस्तेमाल हुआ हो [यानी एक मिसरा में 8-रुक्न ] कभी कभी ऐसे शे’र को 16-रुक्नी बहर भी कहते है
मुसम्मन मुज़ाहिफ़ का एक  मिसाल  मुस्तनद अरूज़ी कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब के हवाले से पेश करता हूँ

 किया हमने मौक़ूफ़ आहों का भरना, तो क्यों कर ये पहुँचेगी बाब-ए-असर तक
ये वादे की शब है तुम आओ न आओ ,हमें जागना है तुलू-ए-सहर तक

अब इसकी तक़्तीअ भी देख लेते है

  1  2   2      /1 2   2 / 1  2   2  /  1  2   2  /  1   2   2   / 1    2 2  / 1  2  2    / 1  2  2
  कि या हम /ने मौ क़ू /फ़ आ हों /का भर ना, /तो क्यों कर/ ये पहुँ चे /गी बा ब-ए-/अ सर तक
 1  2  2  / 1   2   2 / 1   2     2   / 1  2  2  / 1  2  2 / 1  2 2/ 1  2  2/ 1  2  2
ये वा  दे /की शब है /तु (मआ)ओ /न आओ /,ह में जा /गना है /तु लू-ए-/ स हर तक
यानी हर मिसरा में 8 रुक्न और शे’र मे 16-रुक्न
[नोट  बह्र की माँग पर तुम आओ को  - तु माओ  की वज़न पर पढ़ा जायेगा -  यानी  तुम के म का वस्ल सामने वाले -आ- से होकर -मा- की आवाज़ सुनाई दे रही है और यही तलफ़्फ़ुज़ तक़्तीअ में भी लिया जायेगा

इसी प्रकार बहर-ए-मुतक़ारिब मुसद्दस मुज़ाइफ़ सालिम की मिसाल आप को अगर कहीं दस्तयाब [प्राप्त] हो तो मुझे ज़रूर लिखियेगा-शुक्र गुज़ार रहूँगा

अच्छा पिछले क़िस्त में -आप से एक सवाल किया था ---[........तुम्हें याद हो न कि याद हो]

सवाल यह था कि शे’र देख कर - मुरब्ब: सालिम मुज़ाइफ़[ 8 रुक्न ]  और मुसम्मन सालिम [8 रुक्न] में फ़र्क़ कैसे करेंगे? अगली क़िस्त में हम मिल कर इसका समाधान ढूँढने की कोशिश करेंगे

अगली क़िस्त में बहर-ए-मुतक़ारिब पर चर्चा जारी रखते हुए इसकी मुज़ाहिफ़ [ज़िहाफ़ लगी हुई ] बह्र पर चर्चा करेंगे

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , बड़े भाई अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर कि बिसात कहाँ  औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

सोमवार, 23 जनवरी 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 22 [बह्र]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 22 [ बह्र]

[[Disclaimer Clause  : वही जो क़िस्त 1 में है]

आप जानते हैं कि उर्दू शायरी में 19-बहूर [ बह्र की जमा] प्रचलित हैं जो निम्न है
सालिम बहर
1 बह्र-ए-मुतक़ारिब
2 बह्र-ए-मुतदारिक
3 बह्र-ए-हज़ज
4 बह्र-ए-रमल
5 बह्र-ए-रजज़
6 बह्र-ए-वाफ़िर
7 बह्र-ए-कामिल
मुरक़्क़ब बहर 
8 बह्र-ए-तवील
9 बह्र-ए-मदीद
10 बह्र-ए-वसीत
11 बह्र-ए-मुन्सरिह
12 बह्र-ए-मुक्तज़िब
13 बह्र-ए-मुज़ारि’अ
14 बह्र-ए-ख़फ़ीफ़
15 बह्र-ए-मुतजस
16 बह्र-ए-सरी’अ
17 बह्र--ए-जदीद
18 बह्र-ए-क़रीब
19 बह्र-ए-मुशाकिल
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उर्दू में बह्रें ,फ़ारसी और अरबी जुबान से होते हुए आई है जैसे बहर-ए-कामिल और बहर-ए-वाफ़िर अरबी की बह्रें है
 बहूर के बारे में चन्द बुनियादी बातों पर बातें करना ग़ैर मुनासिब न होगा।
 बह्र 1 से लेकर 7 तक  सालिम बह्र कहलाती है
बह्र  8 से लेकर 19 तक मुरक़्क़ब बह्र कहलाती है
ये मुरक़्क़ब बहर दो या दो से अधिक [कभी कभी 3 ] रुक्न से मिल कर बनती है । इनमें से कुछ बह्रें तो अपने मुसद्दस शक्ल में ही प्रयोग मे लाई जाती हैं और कुछ मुज़ाहिफ़ शकल में ।इन सबका विवेचन अलग से individually अलहदा अल्हदा आगे करेंगे कि ये मुरक़्क़ब बहर   बनती  कैसे हैं
सालिम बहर =ऐसी बहर जिसमें सिर्फ़ सालिम रुक्न का ही  इस्तेमाल होता है।यानी सालिम रुक्न [ बिना कोई काँट-छाँट या कतर-ब्योंत किए  या बिना किसी  ज़िहाफ़ के ] मुसल्लम प्रयोग करते है ।आप जानते हैं कि सालिम रुक्न की तादाद 8-है  और हर रुक्न किसी न किसी बहर की बुनियादी रुक्न है जैसे

बहर-ए-मुतक़ारिब का बुनियादी रुक्न है -- फ़ऊलुन [12 2]--- वतद1+सबब1
बहर-ए-मुतदारिक का बुनियादी रुक्न है---फ़ाइलुन   [2 12] --------सबब1+ वतद1
बहर-ए-हज़ज       का बुनियादी रुक्न है----मफ़ाईलुन    [12 2 2]--------वतद1+सबब1+सबब1
बहर-ए-रमल       का बुनियादी रुक्न है.........फ़ा इला तुन [ 2 12 2]--------सबब1+वतद1+सबब1
बहर-ए-रजज़       का बुनियादी रुक्न है ---मुस तफ़् इलुन्[ 2 2 1 2]------सबब1+सबब1+वतद1
बहर-ए-वाफ़िर     का बुनियादी रुक्न है---मफ़ा इ ल तुन्  [ 1 2 1 1 2]----वतद1+सबब2+सबब1
बहर-ए-कामिल    का बुनियादी रुक्न है----मु त फ़ा इ लुन् [1 1 2 12 ]-----सबब2+सबब1+वतद1

[हमने यहाँ  हम वतद और सबब से कुछ दिलचस्प बातें देखेंगे]
आप जानते हैं कि सालिम रुक्न की तादाद तो 8 है मगर सालिम बहर 7-ही क्यों बनी ? 8-क्यों नही बनी ?
जवाब सीधा है। वो 8-वाँ रुक्न है ’मफ़ ऊ लातु [2 2 2 1] बह्र-ए-मुक्तज़िब का ।-ये सालिम रुक्न तो है मगर इस से सालिम बह्र नहीं बन सकती कारण कि इस रुक्न के अन्त में -तु- है जो मुतहर्रिक है [यानी हरकत लगा हुआ है]  और उर्दू ज़बान में कोई भी आख़िरी लफ़्ज़ मुतहर्रिक नहीं होता [साकिन होता है] ख़ासतौर से कोई भी शे’र या मिसरा का [आख़िरी हर्फ़ मय हरकत नहीं होता । अगर इस से सालिम रुक्न बनाया भी जाए तो बज़ाहिर आखिर में =मफ़ऊलातु -आयेगा यानी आखिरी हर्फ़ मय हरकत -तु-होगा जो शे’र में जाइज़ नहीं है। तो फिर? कुछ नहीं इस पर कुछ ज़िहाफ़ का अमल कर के -तु- को साकिन कर के प्रयोग करेंगे ।तब उस स्थिति में फिर यह सालिम नहीं कहलायेगा बल्कि मुज़ाहिफ़ कहलायेगा
अब हम वतद और सबब से कुछ बातें देखते हैं-

वतद1 --को आप वतद-ए-मज्मुआ समझें ,[लिखने की तवालत से बचने के लिए  संक्षेप में लिख दिया]
सबब1---को सबब-ए-ख़फ़ीफ़ समझें        [-तदैव-]
सबब2 ---को सबब-ए-सक़ील  समझे        [-तदैव-]
इससे pictorially समझने में आसानी होगी

अच्छा ,वतद और सबब से एक बात याद आ गई ।कहीं पढ़ा था कि -सबब- का एक लुग़वी माने[शब्द कोशीय अर्थ]  ’रस्सी’ और ’वतद’ माने ’खूँटा’ भी होता है
इल्मे-ए-अरूज़ में इस रस्सी -खूँटा का क्या मानी ? हम नहीं समझे ? शायद आप भी नहीं समझें होंगे ।चलिए समझने की एक कोशिश करते हैं
वतद माने खूँटा ... आप ऊपर के अर्कान देखे सबमें एक वतद आ रहा है-किसी खूँटे की तरह और सबब  दो  रस्सी जो  वतद [खूंटा] से  बँधा हुआ लग रहा है -कभी बायें ,कभी दायें कभी ,कभी आगे कभी पीछे आ रहा है और बहर बनती जा रही है ।हाँला कि क्लासिकी अरूज़ में ये बहर तो दायरे [वृत] से निकलती है ।यहाँ भी किसी वृत के परिधि पर 1 ....2......2......2...लिख लें  और  एक एक स्पेस छोड़ कर गिर्दान करते चलें तो आप क ये  सुबाई [7-हर्फ़ी] बह्रें मिलती चलेंगी } इसे अरूज़ की भाषा में ;दायरा’ कहते हैं । यहाँ पर विस्तार में जाने की ज़रूरत नहीं है ।
कहते हैं -जो दो  5-हर्फ़ी बह्रें [ मुतक़ारिब और मुतदारिक ]हैं उनका इज़ाद बाद में हुआ और वो भी हिन्दी के गीत /छन्द शास्त्र से हुआ है । हमारे यहाँ  हिन्दी के छन्द में दशाक्षरी सूत्र -यमाताराजभानसलगा  [यानी यगण,,,मगण,,,,..तगण....] का प्रयोग किया जाता है और इनका भी एक निश्चित वजन होता है जैसे
यगण  =यमाता = 1 2 2  ये तो उर्दू में फ़ऊलुन [1 2 2] है जो बहर-ए-मुतकारिब का बुनियादी रुक्न है
रगण  =राजभा = 2 1 2  ये तो उर्दू  में फ़ाइलुन [2 1 2] है जो बहर-ए-मुतदारिक का बुनियादी रुक्न है
एक दिलचस्प बात और..... इन दोनों रुक्न में इत्तिफ़ाक़न  मुतदारिक का इज़ाद पहले हुआ और मुतक़ारिब का बाद में ।
ख़ैर...हमारे कुछ ब्लागर साथी  इस दशाक्षरी सूत्र से उर्दू अर्कान के समन्वय पर -एक मंच पर लाने का काम कर रहे हैं।
बहर-ए-कामिल और बहर-ए-वाफ़िर क्या एक दूसरे के बर अक्स नहीं लगते  हैं
एक दिलचस्प बात और ....ये अर्कान ऐसे Design किए गए है कि .हर एक रुक्न cyclically एक दूसरे से बरामद की जा सकती है जैसे
122 ----122...122....122..... ये बहर-ए-मुतक़ारिब का वज़न है
अब बस  दो  space आगे खिसका दीजिये फिर देखिए क्या होता है
212---212---212----212    ये बहर-मुतदारिक का वज़न आ गया
इसी तरह आप और भी अर्कान पर अमल कर के देख सकते हैं

मुरब्ब: = अगर किसी शे’र [ दोनो मिसरो को मिला कर ]में 4-रुक्न [यानी एक मिसरा में 2-रुक्न] आते हैं तो उसे ’ मुरब्ब:’ कहते हैं
मुसद्दस =अगर किसी शे’र [ दोनो मिसरो को मिला कर ]में 6-रुक्न[यानी एक मिसरा में  3-रुक्न ] आते हैं तो उसे ’ मुसद्दस’ कहते हैं
मुसम्मन =अगर किसी शे’र [ दोनो मिसरो को मिला कर ]में 8 -रुक्न [यानी एक मिसरा मे 4-रुक्न ]आते हैं तो उसे ’ मुसम्मन ’कहते हैं

अगर किसी शे’र मे 5-रुक्न/7-रुक्न/9-रुक्न आए तो उसका क्या नाम होगा ??
आ ही नहीं सकता  कारण कि शे’र में रुक्न जब भी आयेगा तो ’सम’ संख्या में ही आयेगा 4-6-8- के शकल में  । किसी शे’र में  ’मिसरा’ भी तो 2-ही [सम] होते हैं ।हा हा हा हा ।
हाँ एक स्थिति ज़रूर आ सकती है कि किसी शे’र में 8-12-16 रुक्न ज़रूर आ सकता  है [यानी मिसरा में 4-6-8 रुक्न हों] तो इसे भी क्रमश: मुरब्ब: ...मुसद्दस....मुसम्मन ही कहेंगे बस आगे .मुजाइफ़’ लफ़्ज़ बढ़ा देंगे [ मुजाअफ़ माने ही ’दो गुना करना] होता है और नाम होगा ’मुसद्दस’मुज़ाअफ़..........मुसम्मन’मुज़ाअफ़.....। कभी कभी इसे 12-रुक्नी या 16-रुक्नी शे’र भी कहते है
एक सवाल
8-रुक्नी] शे’र को क्या कहेंगे ? मुसम्मन  या ’  मुरब्ब:मुज़ाअफ़ ???
 । ज़रा सोचियेगा इस पर ।
एक बात और
ये सभी 19-बहूर एक समान न तो मक़्बूल है और न ही लय पूर्ण  है  ,और न ही सभी संगीतमय ही है।न ही  कोई शायर इन सभी बहूर में शायरी ही करता है } वो तो बस चन्द मक़्बूल बह्र में ही शायरी करता है
अच्छी शायरी के लिए सिर्फ़ वज़न ,,बहर...ज़िहाफ़,, रुक्न ,,,..ही काफ़ी नहीं है । अरूज़ की जानकारी  तो बस आधी  बात है ।बाक़ी आधी बात तो शे’रिअत ग़ज़लियत तग़ज़्ज़ुल भाव अर्थ कथन में   है जो शायरी को बुलन्दी देता है

अब अगली क़िस्त में इन तमाम बहूर पर One by One एक एक कर के चर्चा करते चलेंगे

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं और बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई भी फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....


[नोट् :- पिछले अक़सात के आलेख आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

रविवार, 22 जनवरी 2017

एक ग़ज़ल : यकीं होगा नहीं तुम को...

एक ग़ज़ल : यकीं होगा नहीं तुम को....

यकीं होगा नहीं तुमको  मिरे तर्ज़-ए-बयाँ  से
जबीं का एक ही रिश्ता तुम्हारे आस्ताँ  से

फ़ना हो जाऊँगा जब राह-ए-उल्फ़त में तुम्हारी
ज़माना तुम को पहचानेगा  मेरी दास्ताँ  से

मिली मंज़िल नहीं मुझको भटकता रह गया हूं
बिछुड़ कर रह गया  हूँ  ज़िन्दगी के कारवाँ से

यूँ उम्र-ए-जाविदाँ  लेकर यहाँ पर कौन आया 
सभी को जाना होगा एक दिन तो इस जहाँ  से

चमन को है कहाँ फ़ुरसत कि होता ग़म में शामिल
बिना खिल कर ही रुख़सत हो रहा हूँ मैं यहाँ से

बनाया खाक से मुझको तो फिर क्यूँ बेनियाज़ी !
कभी देखा तो होता हाल-ए-’आनन’ आस्माँ  से

-आनन्द पाठक-
08800927181

 शब्दार्थ
तर्ज़-ए-बयाँ से = कहने के तर्रीक़े  से
जबीं = माथा/ सर/पेशानी
आस्तां = दहलीज /चौखट
उम्र-ए-ज़ाविदां = अमर /अनश्वर
बेनियाज़ी =उपेक्षा
हाल-ए-आनन = आप द्वारा सॄजित ये बन्दा [आनन] किस हाल में है । सवाल परवरदिगार से है