सोमवार, 25 मार्च 2019

उर्दू बह्र पर एक बातचीत " क़िस्त 62 [ छोटी बह्र--मझो्ली बह्र--बड़ी बह्र]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत " क़िस्त 62 [ छोटी बह्र--मझो्ली बह्र--बड़ी बह्र]

फ़ेसबुक के किसी मंच पर एक सवाल किया गया कि छोटी बह्र--मझो्ली बह्र--बड़ी बह्र में कितनी मात्राएं हो सकती है ।यह आलेख उसी सन्दर्भ में लिखा गया है

प्रश्न : छोटी बह्र--मझो्ली बह्र--बड़ी बह्र

चूँकि ’बह्र’ अरूज़ का विषय है और अरूज़ की किताबों में -"छोटी बह्र--मझो्ली बह्र--बड़ी बह्र ’ जैसी बात का कोई ज़िक़्र नहीं मिलता ,न ही ऐसी कोई परिभाषा ही मिलती है। वह तो कुछ लोगों ने छोटी बह्र -बड़ी बह्र की बात चला रखी है-जिसका कोई मतलब नही है। वैसे व्यक्तिगत रूप से मैं ऐसी बातों से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखता।फिर भी  इस प्रश्न पर विचार तो किया ही जा सकता है।
तवील बह्र के नाम से अरूज़ में एक ही बह्र का नाम आता है --बह्र -ए-तवील -- जिसका "बड़ी बह्र" से दूर दूर तक कोई संबन्ध नहीं है
[क] सबसे छोटी बह्र---
[1] उर्दू शायरी किसी शे’र का सबसे छोटी शक्ल ’मुरब्ब:’ [ यानी किसी मिसरा में 2-रुक्न ] हो सकती है
[2] और सबसे  छोटी रुक्न 5-हर्फ़ी [ मुतदारिक फ़ाइलुन’ या मुतक़ारिब  ’फ़ऊलुन’ -5-हर्फ़ ] हो सकता है
[3] अगर ’फ़ाइलुन]-212 पर ख़ब्न का ज़िहाफ़ लगाएँ तो मख़्बून -फ़अ’लुन [ 112] यानी 4- हर्फ़ बरामद हो सकता है [ तस्कीन-ए-औसत की अमल से भी 4-हर्फ़ी वज़न ही बरामद होगा।
[4]   अगर फ़ाइलुन  212 पर ’हज़ज़’ का ज़िहाफ़ लगाए तो ’अहज़ज़ या महज़ूज़ ] फ़े [2] बरामद होगा
अत: मेरे ख़याल से  बह्र-ए-मुतदारिक मुरब्ब : मख़्बून महज़ूज़ [फ़अ’लुन-फ़े] यानी 112-2 का वज़न [कुल मात्रा 6 ] हासिल होगी या ऐसी ही मुतक़ारिब में भी कोई और बह्र बरामद हो सकती है

शायद यही 6- मात्रा भार वाली सबसे "छॊटी’ बहर हो ।
[ख]  सबसे लम्बी बह्र
[ 1] उर्दू शायरी में सबसे लम्बा वज़न ’मुसम्मन मुज़ाअ’फ़ [ 16-रुक्नी ] का होता है
[2] और सबसे बड़ा वज़न - 7-हर्फ़ी रुक्न [ जैसे फ़ाइलातुन----मफ़ाईलुन---मुस तफ़ इलुन --वग़ैरह वग़ैरह] होता है
अत: बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन मुज़ाअ’फ़  जिसमे एक मिसरे में 8-रुक्न [ मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन // मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन\
यानी 1222---1222----1222----1222--// 1222---1222--1222--1222- = कुल 56 मात्रा
यही बात अन्य 7-हर्फ़ी रुक्न के साथ भी लागू होगा
अत: मेरे ख़याल से "बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन मुज़ाअ’फ़" [ 56 मात्रा] सबसे लम्बी बह्र हो सकती है
 जो बह्र इन दोनों सीमाओं में न आती हो उसे ’मझोली बह्र ’ कह सकते है

[नोट -इस मंच पर कई ’आलिम उस्ताद’ और अरूज़ के जानकार मौजूद है अत: उन से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि इस विषय पर वो लोग भी अपने विचार रखें जिससे अन्य लोग भी लाभान्वित हो सके ]
सादर

-आनन्द पाठक-

शनिवार, 26 जनवरी 2019

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 61 [बह्र-ए-माहिया]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 61 [बह्र-ए-माहिया]   

  
उर्दू शायरी में माहिया के औज़ान ...

उर्दू शायरी में यूँ तो कई विधायें प्रचलित हैं जिसमें ग़ज़ल ,रुबाई, नज़्म क़सीदा आदि काफ़ी मशहूर है ,इस हिसाब से ’माहिया लेखन’  बिलकुल नई विधा है  जो ’पंजाबी से  उर्दू में आई है लेकिन उर्दू  शे’र-ओ-सुख़न में  अभी उतनी मक़्बूलियत हासिल नहीं हुई है

माहिया वस्तुत: पंजाबी लोकगीत की एक विधा है ,वैसे ही जैसे हमारे पूर्वांचल  में कजरी ,चैता,फ़ाग,सोहर आदि । माहिया का शाब्दिक अर्थ होता है  प्रेमिका से बातचीत करना ,अपनी बात कहना बिलकुल वैसे ही जैसी ग़ज़ल या शे’र में कहते हैं ।दोनो की रवायती ज़मीन मानवीय भावनाएँ और विषय एक जैसे ही  है -विरह ,मिलन ,जुदाई,वस्ल-ए-यार ,शिकवा,गिला,शिकायत,रूठना,मनाना आदि। परन्तु समय के साथ साथ माहिया जीवन के और विषय पर राजनीति ,जीवन दर्शन ,सामाजिक विषय पर भी कहे जाने लगे।

माहिया पर जनाब हैदर क़ुरेशी साहब ने काफी शोध और अध्ययन किया है और काफी माहिया कहे हैं । उर्दू में माहिया के सन्दर्भ में उनका काफी योगदान है ।आप ने  माहिया के ख़ुद  के अपने संग्रह भी निकाले है आप पाकिस्तान के शायर हैं जो बाद में जर्मनी के प्रवासी हो गए।आप ने "उर्दू में माहिया निगारी" नामक किताब में माहिया के बारे में काफी विस्तार से लिखा है ।

हिन्दी फ़िल्म में सबसे पहले माहिया क़मर जलालाबादी ने लिखा [हिन्दी फ़िल्म फ़ागुन [1958]  [भारत भूषण और मधुबाला] संगीत ओ पी नैय्यर का वो गीत ज़रूर सुना होगा जिसे मुहम्मद रफ़ी और आशा भोंसले जी ने गाया है]

" तुम रूठ के मत जाना    
मुझ से क्या शिकवा
दीवाना है दीवाना


यूँ हो गया बेगाना 
तेरा मेरा क्या रिश्ता
ये तू ने नहीं जाना

यह माहिया है ।
बाद में हिन्दी फ़िल्म ’नया-दौर’ [ दिलीप कुमार ,वैजयन्ती माला अभिनीत] में साहिर लुध्यानवी ने कुछ माहिया लिखे थे

दिल ले के  दगा देंगे     
यार है मतलब के 
 देंगे तो ये क्या देंगे 

दुनिया को दिखा देंगे         
यारो के पसीने पर  
हम खून बहा देंगे

यह माहिया है

--------
माहिया 3-लाइन की [जैसे ;जापानी विधा ’हाइकू’ या हिन्दी का त्रि-पटिक’ छन्द। ] एक शे’री विधा है  जो बह्र-ए-मुतदारिक [212- फ़ाइलुन] से पैदा हुआ है  जिसमे पहला और तीसरा मिसरा  आपस में  ’हमक़ाफ़िया ’ होती है दूसरा मिसरा   ;हमक़ाफ़िया’ हो ज़रूरी नहीं ।अगर है तो मनाही भी नही
पहली और तीसरी पंक्ति का एक ’ख़ास’ वज़न होता है और दूसरी पंक्ति में [ पहले और तीसरे मिसरा से ] एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़ कम होता है । पुराने वक़्त में तीनो मिसरा एक ही वज़न का लिखा जाता रहा । मगर अब यह तय किया गया कि दूसरे मिसरा में -पहले और तीसरे मिसरे कि बनिस्बत एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [2] कम होगा।
माहिया के औज़ान विस्तार से अब देखते है । यदि आप ’तस्कीन-ए-औसत’ का अमल समझ लिया है तो माहिया के औज़ान समझने में कोई परेशानी नहीं ।आप जानते हैं कि ’फ़ाइलुन[212] का मख़्बून मुज़ाहिफ़ ’फ़इ’लुन [ 112] होता है जिसमे [ फ़े--ऐन--लाम   3- मुतहर्रिक एक साथ आ गए] ख़ब्न एक ज़िहाफ़ होता है } अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है [जैसे फ़ाइलुन में ’फ़ा--इलुन]  तो सबब--ए-ख़फ़ीफ़ का साकिन [जैसी फ़ा का-अलिफ़-] को गिराने के अमल को ’ख़ब्न ’ कहते है और मुज़ाहिफ़ को मख़्बून कहते ।अगर ’फ़ाइलुन 212] में पहला अलिफ़ गिरा दें तो बचेगा फ़ इलुन [112] -यही मख़्बून है फ़ाइलुन का।
[1] पहले और तीसरे मिसरे की मूल बह्र [मुतक़ारिब म्ख़्बून]
       --a---------b----------c-------/ c'
 फ़ इलुन-        -फ़ इलुन-    -फ़ इलुन  /फ़ इलान
 1 1  2--------1  1   2-----1 1 2    / 1 1 2 1 
अब इस वज़न पर  तस्कीन-ए-औसत का अमल हो सकता है  और इस से 16-औज़ान बरामद हो सकते है । देखिए कैसे । आप की सुविधा और clarity के लिए यहाँ 112--22--जैसे अलामत से दिखा रहा हूँ बाद में आप चाहें तो उस रुक्न का नाम भी उसके ऊपर लिख सकते हैं

   फ़ इलुन-        -फ़ इलुन-    -फ़ इलुन
    --a----------b------------c
[ A ] 1 1  2---1  1   2--  ---1 1 2         मूल बह्र   -no operation

[ B ]  22-------112--------112 operarion on  -a- only

[C ]    112----  -22------   --112 operation  on -b- only

[D  ]   112----112-------22 operation on -c- only

[E ]     22-------22----------112 operation on -a & -b-

[F  ]     112---    22-------22 operation on -b-&-c-

[G ]    22--     -112--------22       operation on  -c-& -a-

[H ]   22--- ---22----------22 operation on -a-&-b-&-c

इस प्रकार माहिया के पहले मिसरे और तीसरे मिसरे के लिए 8-औज़ान बरामद हो गए।यहाँ पर कुछ ध्यान देने की बातें--
[1] यह सभी आठो वज़न आपस में बदले जा सकते है [बाहमी मुतबादिल हैं] कारण कि सभी वज़न का  मात्रा योग -12- ही है
[2] मूल बह्र का हर रुक्न ’फ़ अ’लुन [112 ] है जिसमें 3- मुतहर्रिक हर्फ़ [-फ़े-ऐन-लाम-] एक साथ आ गए हैं अत: हर Individual रुक्न [ या  एक साथ दो या दो से अधिक रुक्न पर भी एक साथ ]पर ’तस्कीन-ए-औसत ’ का अमल हो सकता है और एक नई रुक्न [ फ़ेलुन =22 ] बरामद हो सकती है  जिसे हम यहाँ ’मख़्बून मुसक्किन" कहेंगे  क्योंकि यह  ’तस्कीन’ के अमल से बरामद हुआ है
[3] अब आप चाहें तो ऊपर की अलामत 22 की जगह ’मख़्बून मुसक्किन और 112 की जगह "फ़अ’लुन" लिख सकते है

एक बात और
आप जानते हों कि अगर किसी मिसरा के आखिर में -1- साकिन बढ़ा दिया जाए तो मिसरे के आहंग में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है । अत: ऊपर के औज़ान में मिसरा के आख़िर में -1- साकिन बढ़ा दे तो 8-औज़ान और बरामद हो सकते हैं
जिसे हम 1121 को ’मख़्बून मज़ाल ’ कहेंगे
और           221 को ;मख़्बून मुसक्किन मज़ाल ’ कहेंगे
आप चाहें तो अलग से विस्तार से लिख कर देख सकते है
अत: पहले और तीसरे मिसरे के कुल मिला कर [8+8 ]=16  औज़ान बरामद हो सकते है
-------
दूसरे मिसरे की मूल  बह्र [यह वज़न बह्र-ए-मुतक़ारिब से निकली हुई है 
--a----------b--------c-----/ c'
फ़अ’ लु---फ़ऊलु---फ़ अ’ल /फ़ऊलु  =21--------121-----1 2      / 121 [ इसका नाम मुतक़ारिब असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ /मक़सूर है] कुछ आप को ध्यान आ रहा है ? जी हाँ . बहर-ए-मीर की चर्चा करते समय इस प्रकार के वज़न का प्रयोग किया था।
ख़ैर
ध्यान से देखे --a--& --b  और    --b--& ---c  यानी दो-दो रुक्न मिला कर 3- मुतहर्रिक [-लाम--फ़े---ऐन] एक साथ आ रहे हैं अत: इन पर ’तख़्नीक़’ का अमल हो सकता है और इस से 8-मुतबादिल औज़ान बरामद हो सकते हैं । देखिए कैसे?
--a----------b--------c-----
फ़अ’ लु---फ़ऊलु---फ़ अ’ल----मूल बह्र
21--------121-------12--
वही बात -आप की सुविधा और clarity के लिए यहाँ 112--22--जैसे अलामत से दिखा रहा हूँ बाद में आप चाहें तो उस रुक्न का नाम भी उसके ऊपर लिख सकते हैं

[I ]  21-----121-----12   मूल बह्र  -no operation

[J ]  22-----21----12        operation on  -a & b-

[K ] 21----122----2           operation on    -b & c-

[L ] 22-----22----2           operation  on  a--b---c

इस प्रकार दूसरे मिसरे के 4-वज़न बरामद हुए
जैसा कि आप जानते हैं अगर किसी मिसरा के आखिर में -1- साकिन बढ़ा दिया जाए तो मिसरे के आहंग में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है । अत: ऊपर के औज़ान में मिसरा के आख़िर में -1- साकिन बढ़ा दे तो 4-औज़ान और बरामद हो सकते हैं।
आप उसे  i'--j'---k'--l' लिख सकते है -जिससे रुक्न पहचानने में सुविधा होगी
इस प्रकार दूसरे मिसरे के भी 4+4=8 औज़ान बरामद हो गए

जिसमे  हम 121  को फ़ऊल [[मक़्सूर] कहेंगे
और           21 को ;फ़ाअ’[-ऐन साकिन] को " मक्सूर मुख़्न्निक़" ’ कहेंगे
आप चाहें तो अलग से विस्तार से लिख कर देख सकते है। मेरी व्यक्तिगत राय यही है कि 22 या 122 के बजाय रुक्न का नाम ही लिखना ही श्रेयस्कर होगा कारण कि आप को यह पता चलता रहे कि मिसरा के किस मुक़ाम पर साकिन होना चाहिए और किस मुक़ाम मुतहर्रिक ।

आप घबराइए नहीं --ये 24-औज़ान आप को रटने की ज़रूरत नहीं -बस समझने के ज़रूरत है --जो बहुत आसान है
[1] ज़्यादातर माहिया निगार पहले और तीसरे मिसरे के लिए  G & H का ही प्रयोग करते है , और मिसरा के अन्त में Additional  साकिन वाला केस तो बहुत जी कम देखने को मिलता है । बाक़ी औज़ान का प्रयोग कभी कभी ही करते है --जब कोई मिसरा ऐसा फ़ँस जाये तब
[2]  दूसरे मिसरे के लिए K & L का ही प्रयोग करते हैं
[3]  प्राय: हर मिसरा के आख़िर मे -एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़- [2]  या  इलुन [12]  आता है यानी मिसरा दीर्घ [2] पर ही गिरता है

माहिया के औज़ान के बारे में कुछ दिलचस्प बातें

[1] अमूमन उर्दू शायरी में --कोई शे’र या ग़ज़ल एक ही बहर या वज़न में कहे जाते है ,मगर यह स्निफ़ [विधा] दो बह्र इस्तेमाल करती है --यानी पहली पंक्ति में --मुतदारिक मख़्बून की ,और दूसरी पंक्ति -मुतक़ारिब की मुज़ाहिफ़
[2]  यह स्निफ़ ’सालिम’ रुक्न इस्तेमाल नहीं करती --बस सालिम रुक्न की मुज़ाहिफ़ शकल ही इस्तेमाल करती है
[3]  चूँकि यह स्निफ़[विधा] मुज़ाहिफ़ शजक ही इस्तेमाल करती है अत: 3-मुतहर्रिक एक साथ आने के मुमकिनात है--चाहे एकल रुक्न में या दो पास पास वाले मुज़ाहिफ़ रुक्न मिला कर }फिर तस्कीन या तख़्नीक़ का अमल हो सकता है इन रुक्न पर।
[4] हालाँ कि दूसरी लाइन में एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़ कम होता है बनिस्बत पहली या तीसरी लाइन से ---शायद यह कमी ऎब न हो कर -यही माहिया को  आहंग ख़ेज़ बनाती है--जैसे गाल में पड़े गढ्ढे नायिका के सौन्दर्य श्री में वॄद्धि देते है।

अब कुछ माहिया और उसकी तक़्तीअ देख लेते है
[1] "  तुम रूठ के मत जाना    
मुझ से क्या शिकवा
दीवाना है दीवाना
--क़मर जलालाबादी 
तक़्तीअ देखते हैं -
2    2   /  1 1 2     / 2 2
तुम रू/ ठ के मत / जाना      फ़े’लुन---फ़अ’लुन---फ़े’लुन  =  G
2       2 / 2   2     / 2
मुझ से /क्या शिक/वा            फ़े’लुन----फ़े’लुन   ---फ़े =L
2    2 /  1 1 2  / 2 2
दीवा/ ना है  दी /वाना फ़े’लुन---फ़अ’लुन---फ़े’लुन =G

[2]    दिल ले के  दगा देंगे     
यार है मतलब के 
 देंगे तो ये क्या देंगे 
                --साहिर लुध्यानवी

तक़्तीअ’ भी देख लेते हैं
   2   2  / 1   1 2   /  2 2   22---112---22 = G
 दिल ले /के  द गा  /दें गे     
2  1   / 1 2   2   / 2 21---122---2 =K
यार  /है मत लब /के 
2  2  / 1 1 2      / 2 2 22---112---22 = G
 देंगे/   तो ये क्या /देंगे 

[3]   अब इस हक़ीर का भी एक माहिया बर्दास्त कर लें

जब छोड़ के जाना था
क्यों आए थे तुम?
क्या दिल बहलाना था?

अब इसकी तक़्तीअ’ भी देख लें
2   2      / 1 1  2  / 2 2  =22---112---22 = G
जब छो /ड़ के जा /ना था
2     2    / 2  2 /2 = 22---22---2 =L
क्यों आ /ए थे/ तुम?
2     2     /  2  2   / 2 2 = 22---22---22 =H
क्या दिल/ बह ला /ना था?

एक बात चलते चलते

चूँकि उर्दू में माहिया निगारी एक नई विधा है --इस पर शायरों ने बहुत कम ही कहा है--लगभग ना के बराबर। कभी कहीं कोई शायर तबअ’ आज़माई के लिहाज़ से छिट्पुट तरीक़े से यदा-कदा लिख देते हैं
उर्दू रिसालों में भी इसकी कोई ख़ास तवज़्ज़ो न मिली ---मज़्मुआ --ए-माहिया तो बहुत कम ही मिलते है। डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब ने माहिया पर एक मज़्मुआ " ख़्वाबों की किरचें "-मंज़र-ए-आम पे आया है।
उमीद करते है कि हमारे नौजवान शायर इस जानिब माइल होंगे और मुस्तक़बिल में माहिया पर काम करेंगे और कहेंगे । इन्ही उम्मीद के साथ---

अस्तु
-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 19 जनवरी 2019

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 60 [ रुबाई की बह्रें]

क़िस्त 60 : रुबाई की बह्रें


[नोट : कुछ  मित्रों का आग्रह था कि कभी ’रुबाई की बह्रों पर भी बातचीत की जाए। यह आलेख उसी सन्दर्भ में ]

रुबाई उर्दू शायरी की एक विधा है। यह विधा अरबी शायरी में नहीं पाई जाती है । इस का इज़ाद अहल-ए-इरान ने किया और फिर वहाँ से उर्दू शायरी में आई
आप जानते होंगे ,फ़ारसी के  शायर उमर ख़य्याम की रुबाईयात काफी मशहूर है और उनके  विश्व के कई भाषाओं में अनुवाद भी हो चुके हैं जिसमे अग्रेजी के कवि ’फिटजेराल्ड ’ का इंग्लिस  अनुवाद बहुत अच्छा माना जाता है
।उन रुबाईयात के हिन्दी में भी  कई अनुवाद हो चुके है  जिसमें  श्री हरिवंश राय ’बच्चन’ जी का हिन्दी अनुवाद बहुत अच्छा माना जाता है । बच्चन जी अनुवाद करते करते ख़य्याम की रुबाइयात से इतना प्रभावित हुए कि वो खुद ही बाद में मधुशाला मधुबाला मधु कलश आदि की रचना की ।
रुबाई की बह्रें [औज़ान] की चर्चा करने से पूर्व ,रुबाई के बारे में कुछ बात कर लेते हैं
अरबी में 4-की संख्या को ’अर्बा:’ कहते हैं इसी से ’मुरब्ब: [ 4-अर्कान वाले शे’र] और 4-लाइन वाली रचना को ’रुबाई’ बना है।
रुबाई चार लाइन की एक रचना होती है जिसमें पहली--दूसरी--और चौथी पंक्ति तुकान्त [हम क़ाफ़िया] होती है ।तीसरी पंक्ति हम क़ाफ़िया या तुकान्त होना  ज़रूरी नहीं । और हो तो मनाही भी नहीं । न होना ही बेहतर माना जाता है ।रुबाई की पहली दो पंक्ति को ’मतला’ नहीं कहते बल्कि ’मुस्सरा’ कहते है । रुबाई का सारा सार ’चौथी पंक्ति" में होता है या आप यूँ कह लें चौथी पंक्ति में जो जान डाली गई है -पहले की तीन लाइनें उसमें मदद करती हैं। क्लासिकल उर्दू शायरी में यह विधा काफ़ी लोक प्रिय रही मगर ग़ज़ल जैसी मक़्बूलियत नहीं पा सकी। अमूमन हर पुराने हर शायर ने यथा ग़ालिब,मीर, ज़ौक़-दाग़-फ़िराक़ आदि कई शायरों ने कुछ न कुछ रुबाइयाँ कहीं है । परन्तु आजकल फ़ेसबुक व्हाट्स अप पर या यहाँ तक कि मुशायरों में भी रुबाइयाँ न के बराबर ही लिखी पढ़ी जाती हैं।  उसकी जगह ’चार लाइन’ के मुक्तक पढ़े जाते है ,जो रुबाई नहीं होते। ’मुक्तक’ नाम आदरणीय गोपाल दास’नीरज’ जी का दिया हुआ है ।

एक मुक्तक देख लें

[1]  बात को मन के मन से तोलूँगा
इस से पहले ज़ुबाँ न खोलूँगा
चाहे दुनिया सुने सुने न सुने
मैं जहाँ हूँ वहीं  से बोलूँगा
बलवीर सिंह ’रंग’

एक रुबाई लिख रहा हूँ

[2] दुनिया के अलम  ’ज़ौक़’  उठा जाएँगे
हम क्या कहें  क्या आए थे क्या जाएँगे
जब आए थे रोते हुए आप  आए थे
जब जाएँगे औरों  को रुला  जाएँगे
-ज़ौक-
अब एक मतला और एक शे’र देख लें

[3] आज इतनी मिली है  ख़ुशी आप से
दिल मिला तो मिली ज़िन्दगी आप से
तीरगी राह-ए-उल्फ़त पे तारी न हो
छन के आती रहे रोशनी  आप से
-आनन-
आप ध्यान से देखें -सभी कलाम में चार पंक्तियाँ है ,सभी में पहली--दूसरी--और चौथी पंक्ति तुकान्त [हम काफ़िया है] और अमूमन सभी की ’चौथी’ पंक्ति में जान है मगर सभी ’रुबाई’ नहीं है --सिवा [2] के ज़ौक़ की रुबाई
इसी लिए कहते है हर चार लाईन की रचना ’रुबाई’ नहीं होती।मगर हर रुबाई ’चार लाईन’ की ही होती है । इसी रुबाई शब्द से ’मुरब्ब: ’ --[चार अर्कान वाले शेर]  बना है ।
कारण कि रुबाई की अपनी ख़ास बह्र होती है अपने ख़ास औज़ान होते हैं
यूँ तो ’रुबाई’ उत्पति के बारे में कुछ किंवदन्तियाँ  भी  है। यहाँ उल्लेख करने की कोई ज़रूरत नहीं । बस आप यहीं समझ लें कि रुबाई के बह्र की उत्पति ’बह्र-ए-हज़ज’ से हुआ है
बह्र-ए-हज़ज का बुनियादी रुक ’मुफ़ाईलुन ’[1222] होता है और यूँ तो इस पर कई ज़िहाफ़ लग सकते हैं मगर ’रुबाई’ के सन्दर्भ में  कुछ ख़ास ज़िहाफ़ ही लगते हैं ।जो नीचे लिख रहा हूं

मुफ़ाईलुन [1222} + ख़र्ब  =अख़रब ’मफ़ऊलु- [221]  यानी लाम पर हरकत है[ ख़र्ब एक मुरक्कब ज़िहाफ़ है =[ख़रम +कफ़]=दोनो ज़िहाफ़ का अमल एक साथ होगा
** मुफ़ाईलुन [1222] +ख़रम  =अख़रम ’मफ़ऊलुन’-[222]**
मुफ़ाईलुन [1222] +कफ़ =मक्फ़ूफ़ ’ ’मफ़ाईलु- [1221] यानी लाम पर हरकत है
मुफ़ाईलुन [1222]  +हतम =अहतम  ’फ़ऊलु ’[121] यानी लाम पर हरकत है [ हतम एक मुरक्कब ज़िहाफ़ है = बतर+क़ब्ज़+तसबीग़= तीनो ज़िहाफ़ का अमल एक साथ होगा
[** अख़रम के बारे में आगे चर्चा करेंगे]
 रुबाई की बह्र समझना बहुत आसान है-अगर आप ’तख़्नीक़’ का अमल समझ लिए हों तो
 उम्मीद है कि आप लोग "तस्कीन-ए-औसत" और तख़नीक़ का अमल जानते होंगे। जो पाठक प्रथम बार इस पॄष्ठ पर आए है उनके लिए एक बार दुहरा देता हूँ
तख़नीक़ का अमल = अगर किसी बह्र के दो adjacent & consecutive [समीपवर्ती रुक्न] में ’" तीन मुतहर्रिक हर्फ़ [हर्फ़ मय हरकत] एक साथ आ गए हो तो उस पर तख़्नीक का अमल हो सकता है और बीच वाला हर्फ़ ’साकिन’ माना जायेगा। इससे एक नया वज़न बरामद होता है

वैसे तो रुबाई की मूल बह्र तो 2- ही होती है मगर इसी ’तख़्नीक’ के अमल से 24 -औज़ान [ वज़्न का ब0व0] बरामद होते है।और वो दो मूल बह्र यूँ हैं

[A]  मफ़ऊलु---मफ़ाईलु---मफ़ाईलु----फ़ अ’ल/ फ़ऊल
221---------1221----1221--------12  / 121
[B]  मफ़ऊलु----मफ़ाइलुन---मफ़ाईलु-----फ़ अ’ल/फ़ऊलु
221----------1212-----1221-------12  / 121
ख़याल रहे -लु- मतलब -लाम मुतहर्रिक [यानी -लाम- मय हरकत]
-------------------     -----------------------------------     --------------------
अब मूल बह्र [A]  पर ’तख़्नीक़’ का अमल करते हैं फिर देखते हैं कि कितने ’मुतबादिल’ औज़ान बरामद होते हैं

  -a-----------b--      -- -c-        ---- d-
[A]  मफ़ऊलु---मफ़ाईलु----मफ़ाईलु----फ़ अ’ल
221---------1221----1221--------12


[1]  मफ़ऊलु---मफ़ाईलु----मफ़ाईलु----फ़ अ’ल
221---1221----1221---12   -no  operation-

[2]  221----1221---1222-----2 operation on c & d

[3] 221----1222----221----12 operation on b &  C

[4] 222---221---1221----12 operation  on a & b

[5]  221---1222---222---2 operation on  b --c---d

[6] 222---221---1222---2 operation on  [a--b]-[-c--d]

[7] 222---222---221---12 operation on  a-b--c

[8] 222---222---222---2 operation  a--b---c---d

यह तो 8-वज़न  सिर्फ़ अरूज़ और ज़र्ब में ’फ़ अ’ल [12] से ही बरामद हुए
ऐसे ही 8- वज़न अरूज़ और ज़र्ब में में जब ’फ़ऊल [121] लिखेंगे तो बरामद  होंगे
और यूँ भी अरूज़ /ज़र्ब के मुक़ाम पर ’फ़ अ’ल [12] की जगह ’फ़ऊल [121] लाया जा सकता है
और वैसे भी अगर किसी शे’र के आख़िर में एक साकिन [1] बढ़ा भी देते हैं तो शे’र के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। आहंग मज़रूह नहीं होता।
और वो मज़ीद 8-वज़न आप लिख सकते हैं । चलिए आप के लिए मैं लिख देता हूँ same-to-same बस आख़िए में [1] साकिन जोड़ दूँगा ’फ़ऊल [121] दर्शाने के लिए

[1]  मफ़ऊलु---मफ़ाईलु----मफ़ाईलु----फ़ऊल
221---1221----1221--           -121   -no  operation-

[2]  221----1221---1222-----21 [फ़ा अ’] operation on c & d

[3] 221----1222----221----121 operation on b &  C

[4] 222---221---1221----121 operation  on a & b

[5]  221---1222---222---21 operation on  b --c---d

[6] 222---221---1222---21 operation on  [a--b]-[-c--d]

[7] 222---222---221---121 operation on  a-b--c

[8] 222---222---222---21 operation  a--b---c---d

इस प्रकार
 रुबाई की पहले बुनियादी वज़न से --16- औज़ान बरामद हुए [ नोट करें]
--------------    -----------------------    --------------------
अब मूल बह्र [B]  पर ’तख़्नीक़’ का अमल करते हैं फिर देखते हैं कि कितने ’मुतबादिल’ औज़ान बरामद होते हैं
   a------------b-----------c------------d---
[B]  मफ़ऊलु----मफ़ाइलुन---मफ़ाईलु-----फ़ अ’ल
221---------1212----1221--------12

[1] 221----1212   -----1221----12        -no operation-

[2] 222-----212-------1221---12 operation on -a- &-b-

[3] 221-----1212 ----1222----2 operation on  c & d

[4] 222------212-----1222-----2 operation  on [a & b]- [c &d]

जैसा कि ऊपर कह चुके हैं कि अगर शे;र के आख़िर में एक साकिन [1] और बढ़ा भी दें तो शे’र के वज़न में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा ।आहंग मज़रूह नहीं होता । और वैसे भी अरूज़ /ज़र्ब के मुक़ाम पर ’फ़ अ’ल [12] की जगह ’फ़ऊल [121] लाया जा सकता है
इस प्रकार 4 -वज़न  और बरामद होते हैं जो यूँ होंगे
[B]  मफ़ऊलु----मफ़ाइलुन---मफ़ाईलु-----फ़ऊल
221---------1212----1221--------121


[1] 221----1212   -----1221----121        -no operation-

[2] 222-----212-------1221---121 operation on -a- &-b-

[3] 221-----1212 ----1222----21 operation on  c & d

[4] 222------212-----1222-----21 operation  on [a & b]- [c &d]

इस प्रकार रुबाई की दूसरी बुनियादी बह्र से कुल 8-औज़ान बरामद हुए

अब आप दोनो बुनियादी रुक्न के तमाम औज़ान जो बुनियादी है और जो ’मुख़्नीक़ ’ [ जो तख़नीक़ के अमल से बरामद हुए हैं] है कुल मिला दें तो
16+8 = 24 औज़ान होंगे और यही अरूज़ की किताबों में लिखा है --रुबाई के 24-औज़ान होते हैं। इन अर्कान को रटने की ज़रूरत नहीं है बस समझने की ज़रूरत है।

1  आप की सुविधा के लिए ये सभी 24-अर्कान एक साथ एक जगह एक क्रम से लिख रहा हूँ जिससे किसी रुबाई की तक्तीअ’ या वज़न पहचानने में सुविधा हो। नीचे का क्रम सुविधाजनक ढंग से लिखा  हुआ है, पर हैं वही 24-औज़ान जिसका ऊपर  चर्चा कर चुका हूँ  । इन में से 12-औज़ान तो वही हैं जो अरूज़/ज़र्ब में ’फ़ अ’ल’ [12] या ’फ़े’ [2] वाले हैं । बाक़ी 12-औज़ान वो हैं जिसमें मात्र अरूज़/ज़र्ब के मुक़ाम पर -1-साकिन बढ़ा दिया गया है
2 इन 12-औज़ान में से 6-औज़ान तो  अख़रब  मफ़ऊलु [221] से शुरु होते है। बाक़ी 6-औज़ान मफ़ऊलुन [222] से शुरु होते है
3 मफ़ऊलु [221] से शुरु होने वाले 6 औज़ान में से 3-औज़ान तो ’फ़ अ’ल [12] पर खतम होते है और बाक़ी 3-औज़ान ’फ़े’ [2] पर
4 यही हाल ’मफ़ऊलुन [222] से शुरु होने वाले औज़ान के साथ भी लागू होता है
5 इसका मतलब यह हुआ कि रुबाई का मिसरा या तो मफ़ऊलु [221] से शुरु होगी या फिर ’मफ़ऊलुन’ [222] से
और खतम होगा ’फ़े/फ़ाअ’[ 2 /21] पे या फिर ’फ़ अ’ल’ /. फ़ऊल   [ 12 /121] पे

6 आप की सुविधा और सफ़ाई के लिहाज़ से इन अर्कान के नाम अलामत के ऊपर नहीं लिख रहे है ।आप चाहें तो मश्क़ कर अलग से लिख सकते हैं जैसे
221 =मफ़ऊलु
1212 =मफ़ाइलुन
1221 =मफ़ाईलु
1222 =मफ़ाईलुन
**222 =मफ़ऊलुन**
12 = फ़ अ’ल  [-लाम-साकिन ]
121 =फ़ऊल   [-लाम- साकिन]
2 =फ़े
21 =फ़ाअ’  [-ऐन- मुतहर्रिक]
** लेख के आरम्भ में कहा था कि ’मफ़ऊलुन’ [222] के बारे में बात में बात करेंगे। कहना यही थी कि यह ’मफ़ऊलुन’ [222] रुबाई में  मुख़्नीक़ [ तख़्नीक के अमल ] से हासिल होता है। न कि ’अख़रम’ ज़िहाफ़ से । अरूज़ की कई किताबों में इसे ’अख़रम’ ज़िहाफ़ से हासिल दिखाया /बताया गया है ।

R-1 221-- -1221----1221-- -12

R-2 221----1222----221----12

R-3 221----1212   --1221---12 
    
R-4 221----1221--- 1222-----2

R-5 221--- 1222--   -222--    -2

R-6 221----1212 ---1222----2
------       --------         ---------------     ----
R-7 222---  221--   -1221----12

R-8 222--  -222--  -221-   --12

R-9 222-----212- --1221---12

R-10 222-   --221-- -1222--  -2

R-11 222--  -222-  --222--   -2

R-12 222-----212- --1222-----2
----------------    ------------------     ----------

 अगले 12-अर्कान लगभग  समान ही होंगे -बस आखिर वाली रुक्न [अरूज़/ज़र्ब] मे -1-साकिन बढ़ाते जाइए।आप चाहें तो उसे पहचानने के लिए    R'1---R'2---R'3---  ---  R'12  Index कर सकते है जिससे पता चलता रहे कि ये वो औज़ान है जिसके अरूज़/ज़र्ब में -1-साकिन मज़ीद जुड़ा हुआ है ।
यह तमाम 24-औज़ान आपस में ’मुतबादिल’ [यानी एक की बदल/जगह दूसरा] लाया जा सकता है
्कारण इन तमाम 12 औज़ान की मात्रा जोड़िए ---सभी का योग एक जैसा है [20] बराबर
यानी रुबाई के चारों पंक्तियों में 4-अलग अलग वज़न [ इन्ही 24 में से कोई चार] हो सकते हैं । या किसी-एक ही वज़न में चारों पंक्तियाँ हो सकती है
उसी प्रकार बाक़ी 12 [जो अरूज़/ज़र्ब मेम -एक-साकिन बढ़ाने से हासिल होंगे] में कुल मात्रा भार 21 होगा
-----     ---------------------    -----------------------------   ----------
चलिए एक दो रुबाइयों की तक़्तीअ कर के देख लेते है -
[क] ज़ौक़ की रुबाई देख लेते हैं

दुनिया के अलम  ’ज़ौक़’  उठा जाएँगे
हम क्या कहें  क्या आए थे क्या जाएँगे
जब आए थे रोते हुए आप  आए थे
जब जाएँगे औरों  को रुला  जाएँगे
-ज़ौक-
इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
2   2    1   / 1  2    2  1   / 1  2  2 2  / 2 R-4
दुनिया के /अलम  ’ज़ौक़’ / उठा जाएँ /गे
2     2     1 /  1 2 2 2  1 / 1 2 2 2  / 2 R-4
हम क्या क/हें  क्या आए/ थे क्या जाएँ /गे
2      2   1  / 1  2 2  1/1  2    2  2  /2 R-4   [ -आप आए-  में   अलिफ़ का वस्ल है और आपाए [222]
जब आए /थे रोते हु    /ए आप  आए /थे
2      2   1/ 1  2  2  1 / 1 2   2 2  /1 R-4
जब जाएँ /गे औरों  को /रुला  जाएँ /गे
-ज़ौक-
[ख] मीर अनीस लखनवी की एक बहुत ही मशहूर रुबाई है

दुनिया भी अजब सराय-ए-फ़ानी देखी
हर चीज़ यहाँ की आनी जानी देखी
जो आ के न जाए वो बुढ़ापा  देखा
जो जा के न आए वो  जवानी   देखी
-मीर अनीस लखनवी
तक़्तीअ’ कर के देख लेते हैं
   221     /  1212       / 1 2 2  2      / 2 =221-1212---1222--2 =  R-6
दुनिया भी /अजब सरा /य-ए-फ़ानी दे/खी
2    2   1 /  1  2  1  2   / 1 2  2  2  / 2 = 221-1212---1222--2 =  R-6
हर चीज़ / यहाँ की आ /नी जानी दे  /खी
 2    2   1 / 1  2 1 2  / 1 2 2 2    /2 =221-1212---1222--2 =  R-6
जो आ के/ न जाए वो  /बुढ़ापा  दे    /खा
2      2   1/ 1 2 1 2    / 1 2 2 2  / 2 = 221-1212---1222--2 =  R-6
जो जा के/ न आए वो  /जवानी   दे /खी
[नोट -इस रुबाई में एक ही वज़न चारों पंक्तियों में इस्तेमाल हुई है ]

बात हैरत की है कि औज़ान में  इतनी ’फ़ेक्सिबिल्टी ’ के बावजूद भी  रुबाइयाँ दौर-ए-हाज़िर में कम ही कही जा रही है और उनकी जगह मुक्तक या ’एक मतला-एक शे’र’ ने ले लिया है किसी मुशायरे को सरगर्म करने के लिए।
शायद एक कारण ये रहा हो कि रुबाई की गायकी [मौसिक़ी] ग़ज़ल के मुकाबले कमज़ोर हो या फिर शायर के सामने इतनी राहें [24] खुल जाती है कि वो भ्रमित हो जाता हो कि कौन सा वज़न इस्तेमाल करें। यह सब मेरा ख़याल है
बेहतर तो होगा कि यदि आप रुबाई कहना चाह्ते हैं तो सभी चार मिसरे एक या दो वज़न में ही कहें --कोई दिक्कत नहीं

अस्तु




-आनन्द.पाठक--

बुधवार, 9 जनवरी 2019

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 59 [ बह्र-ए-मीर]

        उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त  59  [ बह्र-ए-मीर]

[ कुछ मित्रों का आग्रह था कि कुछ ’बह्र-ए-मीर’ पर एक चर्चा की जाय} अत: यह आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है]

आप को शायद याद हो जब ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’ के औज़ान की चर्चा कर रहा था तो निम्नलिखित 2-वज़न की भी चर्चा की थी
[क] मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ मक़्बूज़ सालिम अल आखिर
फ़े’लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु--फ़ऊलुन
21------121-----121-----122
[ फ़े’लु [21] ----मुज़ाहिफ़ असरम है ’फ़ऊलुन [122] का
[ फ़ऊलु [121] ---मुज़ाहिफ़ मक़्बूज़ है ’फ़ऊलुन[122] का
यह रुक्न मुसम्मन [8 रुक्न एक शे’र में] है और इसका ’मुज़ा अ’फ़ [ दो गुना ] भी संभव है -यानी 16-रुक्नी अश’आर भी कहे जा सकते हैं इस वज़्न पर
यानी मुसम्मन मुज़ाहिफ़    होगा  क // क दुरुस्त है
[ख]  मुतक़ारिब मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ मक़्बूज़ महज़ूफ़
फ़े’लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु--फ़ अ’ल
21------121-----121-----12
[ फ़ अ’ल [12] महज़ूफ़ है फ़ऊलुन [122] का
यह रुक्न भी  मुसम्मन [8 रुक्न एक शे’र में] है और इसका ’मुज़ा अ’फ़ [ दो गुना ] भी संभव है -यानी 16-रुक्नी अश’आर भी कहे जा सकते हैं इस वज़्न पर
यानी मुसम्मन मुज़ाहिफ़    होगा  ख // ख दुरुस्त है
तब   क  //   ख क्या होगा ?-
-यह वज़न जो किसी का ’मुज़ाअ’फ़’ नहीं होगा । न [क] वज़न का ,न [ख] वज़न का -मगर होगा 16-रुक्नी बह्र ही
यही बह्र-ए-मीर है । कैसे ? यह नाम शम्स्सुर्रहमान फ़ारूक़ी साहब का दिया हुआ है जो उचित भी है। कारण कि क्लासिकल अरूज़ की किताबों में ऐसी कोई बहर न थी जो दो मुख्तलिफ़ वज़न से दो मुख्तलिफ़ हिस्सों से बने हो
मीर तक़ी मीर ने अपनी बहुत सी ग़ज़ले इसी बह्र में कहीं है ।अत: लोगों में यह बह्र इसी नाम से   जानी-पहचानी जाती है । अमेरिकन आलिमा मोहतरमा Frances W.Pritchett -साहिबा ,.शम्स्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ,डा0 आरिफ़ हसन ख़ान आदि कई विद्वानों ने ’मीर’ की शायरी पर बहुत काम किया है। फ़ारूक़ी साहब तो ख़ैर स्वयं  में ही एक उर्दू साहित्य के महान प्रामाणिक समीक्षक हैं ।

अब  क//ख को विस्तार से देखते है

मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ मक़्बूज़ सालिम अल आखिर //मुतक़ारिब मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ मक़्बूज़ महज़ूफ़
फ़े’लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु--फ़ऊलुन  //फ़े’लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु--फ़ अ’ल
21------121-----121-----122     // 21------121-----121-----12
नाम इतना लम्बा हो गया तो उसे संक्षिप्त कर के  अब आगे से मीर की बह्र या बह्र-ए-मीर ही कहेंगे

बह्र-ए-मीर
फ़े’लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु--फ़ऊलुन  //फ़े’लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु--फ़ अ’ल
21------121-----121-----122     // 21------121-----121-----12
इस वज़न को ध्यान से देखें तो बहुत सी बाते आप को स्पष्ट हो जायेंगी
[1] इस वज़न का  पहला हिस्सा  और ’दूसरा हिस्सा’ लगभग समान है । बस दूसरे हिस्से में एक ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ कम है । यानी पहले हिस्से में  ’मात्रा भार" 16 और दूसरे हिस्से में 14 है
[उर्दू शायरी मात्रा से नहीं अर्कान के वज़न से चलती है -बस समझने /समझाने की गरज़ से लिख दिया]
[2] दो -consecutive रुक्न में कई जगह  --तीन मुतहर्रिक- एक साथ आ रहे हैं अत: इन पर ’तख़्नीक़’ का अमल हो सकता है । मैं समझता हूँ कि तस्कीन और तख़्नीक़ का अमल आप समझते होंगे। जो पाठकगण अभी अभी इस ब्लाग पर आये हैं उनक्र लिए संक्षिप्त रूप से एक बार फिर बता दे रहा हूँ । ’किसी ’मुज़ाहिफ़ बह्र’ में यदि दो-consecutive रुक्न में ’तीन मुतहर्रिक हर्फ़ ’ एक साथ आ जाये तो बीच वाला मुतहर्रिक हर्फ़ ’साकिन’ हो जाता है और एक नया वज़न बरामद होता है} और इस नए बह्र और पुराने बह्र -दोनो का वज़न बराबर होगा और आपस में ’मुतबादिल’[ यानी आपस मे बदले जा सकते है] होगा----मगर शर्त यह कि बह्र न बदल जाए।
इस तख़्नीक़ के अमल से आप जानते है कि कितने "मुतबादिल औज़ान" बरामद हो सकते है ?
पहले हिस्से से  16 औज़ान
दूसरे हिस्से से भी   16 औज़ान
अत: कुल मिला कर ३२ -औज़ान। आइए देखते हैं
--------पहला हिस्सा--------------//------- --------दूसरा हिस्सा---
[A]     21----121---121----122 [I]   21-----121---121---12
[B]     21----121---122----22 [J]  21----121---122----2
[C]  21---122---21-----122 [K] 21-----122---21---12
[D] 22---21---121-----122 [L] 22----21------121---12
[E]     21----122---22-----22 [M] 21----122----22-----2
[F] 22----21-----122---22 [N] 22-----21-----122---2
[G] 22----22-----21-----122 [O]  22-----22-----21----12
[H] 22----22-----22-----22 [P] 22----22-----22----2
मिसरा के पहले हिस्से में--

 बज़ाहिर -अरूज़ और ज़र्ब मे 4-रुक्न तो सालिम फ़ऊलुन [122] पर गिरेगा
और  4-रुक्न  फ़े’लुन [22] पर गिरेगा अरूज़ और ज़र्ब में -फ़ऊलुन [122] की जगह इसका मुस्बीग़ मुज़ाहिफ़ ’फ़ऊलान[1221] लाया जा सकता है और
फ़े’लुन [22] की जगह फ़ेलान [221] भी लाया जा सकता है  जिसे  अगर कहीं ज़रूरत पड़ी तो क्रमश: a--b-c-d-e-f-g-h से दिखायेंगे

उसी प्रकार ,मिसरा के दूसरे हिस्से में :-
अरूज़/ज़र्ब में 4-रुक्न तो ’फ़ अ’ल’ [12] पर गिरेगा,और 4-रुक्न ’फ़े’[2] पर गिरेगा
अच्छा ,पहले हिस्से की तरह --दूसरे हिस्से में मिसरा के आख़िर में -एक- साकिन बढ़ाने से  शे’र के वज़न पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा तो इस प्रकार से 8-वज़न और बरामद हो सकते हैं ।और यह सभी वज़न आपस में ’मुतबादिल’ -यानी एक दूसरे की जगह बदले जा सकते हैं।अगर ज़रूरत पड़ी तो इन्हे  क्रमश : i-- j--k-l-m-n-o-p-से दिखाया जायेगा।
अत: मीर की ऐसी गज़लें [जो मीर की बह्र पर कही गई है] तो उन के  मिसरा का पहला हिस्सा -इन्ही 16-औज़ान में से  और दूसरा हिस्सा इन्ही किसी न किसी एक वज़न पर ज़रूर होगा।
यूँ मीर के पहले भी यह दोनों बह्र  A & B तो अरूज़ में पहले से ही थी और इनकी मुज़ाअ’फ़ भी थी अलग-अलग रूप से । आप यूँ कहें की ’मीर’ ने इन दोनो बह्र को मिला कर  A + B कर दिया जिससे मीर की बह्र कहते हैं अत: यह १६- रुक्नी बह्र तो हुई मगर किसी बह्र की ’मुज़ाअ’फ़’ [दो गुनी] न हुई।
ख़ैर
अब ’मीर’ की कोई एक ग़ज़ल लेते हैं और उसकी तक़्तीअ भी देखते है --जिससे बात साफ़ हो जाए
मीर की एक बहुत मशहूर ग़ज़ल है जिसे आप सभी ने सुन रखा होगा

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

आशिक़ सा तो सादा कोई ,और न होगा  दुनिया में
जी के ज़ियां को इश्क़ में उसके अपना वारा जाने है

क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना
जिस बे दिल बेताब-ओ-तवां को इश्क़ का मारा जाने है

अब इन अश’आर क्र्र तक़्तीअ कर के देखते है । पहले तो ’अरूज़ी वक़्फ़ा’ लगाते है जो ऐसी बहर में लाज़िमी है और मिसरा को दो-हिस्से में बाँट कर देखा जा सके
  2  2--/  2 2  -/-22-/-22  //    21- /  122 -/-22 /-2 =- H   //--M
पत् ता/  पत् ता / बूटा/ बूटा // हाल/  हमारा/ जाने/ है
21-/-1 2 2  /  21     / 122    //  21  / 1 2 2 / 22   /2 = C  // M
जाने /न जाने/ गुल ही/  न जाने// बाग़ / तो सारा/ जाने/ है

  22       /22      /22    /22  // 21 / 122    / 22     /2 = H //  M
आशिक़ /सा तो /सादा /कोई //और/ न होगा/ दुनिया /में
   2   1 /  1 2 2  / 2 1  / 1  2 2  //    2 2  / 2 2 / 2 2 /2 = C // Q
जी के /ज़ियां को/ इश्क़/ में उसके// अपना /वारा /जाने/ है

  2     2   /  2    2  /  2  2   / 2  2  //  2 2   / २ २ /  २ २    /२ =H  // P
क्या क्या/  फ़ित ने / सर पर /उसके //लाता /है मा /शुक़ अप/ना
2      2  /  2  2  / 2 1      / 1 2  2 //  21 / 1  2   2 / 22 /2  =  G // M 
जिस बे /दिल बे/ताब-ओ/-तवां को// इश्क़ /का मारा /जाने/ है

इसी प्रकार मीर की  ऐसी और  ग़ज़लों की भी तक़्तीअ’ की जा सकती है और समझी जा सकती हैं।

बाद के और भी शायरों ने भी  इस बह्र में शायरी की है जो काफी आहंगखेज़ है

अगले क़िस्त में किसी और बह्र पर चर्चा करेंगे
[नोट- इस आलेख में कुछ ग़लत बयानी हो गई हों तो आप सभी से अनुरोध है कि आप मेरे ध्यान में ज़रूर लाइएगा जिससे मैं स्वयं को सही कर सकूँ]
अस्तु

-आनन्द.पाठक-

रविवार, 16 दिसंबर 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 58 [ बह्र-ए-मुशाकिल]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 58 [ बह्र-ए-मुशाकिल]

[Disclaimer cause : वही जो क़िस्त -1 में है]

बह्र-ए-मुशाकिल , उन 19-बह्रों में से एक है जो उर्दू शायरी में प्रचलित तो है परन्तु  शायरी में यह बहुत लोकप्रिय दिलकश और आहंगखेज़ नही है । उर्दू शायरों ने इस बह्र में बहुत कम ही कलाम कहे हैं

मुशाकिल भी एक मुरक़्क़ब बह्र है -जो 3-अर्कान से मिल कर बना है। इस का बुनियादी  अर्कान हैं-
फ़ाइ’लातुन----मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन
2122-------1222----------1222
यहाँ भी ध्यान देने की बात है -फ़ाइ’लातुन [2122] अपनी मुन्फ़सिल शकल में है--यानी फ़ाइ’-- [ -फ़े --अलिफ़--ऐन ] वतद-ए-मफ़रूक़ की शकल में है [यानी हरकत+साकिन+हरकत] --ऐन को मैने -इ’- से दिखाया है।
 इसपर ’ज़िहाफ़ात’ लगाते हुए इस बात का ख़याल रखेंगे 

इन अर्कान पर लगने वाले कुछ ज़िहाफ़ात देख लेते हैं

फ़ाइ’लातुन [2122] + कफ़ = मक्फ़ूफ़ फ़ाइ’लातु [2121]   [ -लु--तु-- का मतलब मुतहर्रिक 
फ़ाइ’लातुन [2122 ] + क़ब्ज़     = मक़्बूज़    मुफ़ त इलुन [2112] [ -तु- मुतहर्रिक ]

मफ़ाईलुन  [1221]  + कफ़      = मक्फ़ूफ़  मफ़ाईलु   [1221]
मफ़ाईलुन  [1221]   + हज़्फ़    = महज़ूफ़   फ़ऊलुन  [122 ] 
मफ़ाईलुन  [1221 ]  + क़स्र       = मक़्सूर  फ़ाइ’लान  [2121]
मफ़ाईलुन [1221 ] + तब्सीग़      = मुस्बीग़  मफ़ाईलान [ 12221]

चूँकि यह बह्र उर्दू शायरी में बहुत मानूस नहीं है और उर्दू शायरों ने इसे बहुत कम ही इस्तेमाल किया है। फिर भी इसके कुछ आहंग देख लेते है

[1]  बह्र-ए-मुशाकिल मुसद्द्स सालिम/ मुस्बीग़
फ़ाइ’लातुन----मफ़ाईलुन--मफ़ाईलुन / मफ़ाईलान
2122--------1222---------1222   / 12221
कमाल अहमद सिद्दिकी साहब के हवाले से

मैकदे  में  नहीं कोई गदा साक़ी
हाथ में जाम जिसके है वही जम है
तक़्तीअ’भी देख लेते हैं -
2 1  2  2  / 1  2  2  2/ 1 2 2 2 
मैकदे  में /  नहीं कोई /गदा साक़ी 2122---1222---1222
2 1   2  2/ 1  2   2   2   / 1 2 2 2        =  2122---1222---1222
हाथ में जा /म जिस के है /वही जम है

मिसरा सानी में ज़र्ब के मुक़ाम पर ’मफ़ाईलान [12221] है जो मफ़ाईलुन का  मुज़ाहिफ़ ’मुस्बीग़’ है -जो लाया जा सकता है

उन्ही के हवाले से एक इसका भी उदाहरण  देख लें
पास मत जा सबा वो ज़ुल्फ़-ए-बरहम है
और बिखरी तो वो हो जायेगा नाराज़ 
तक़्तीअ भी देख लें---

पास मत जा /सबा वो ज़ुल् / फ़ बरहम है = 2122----1222----1222
और बिखरी  /तो वो  हो जा / येगा  नाराज़ = 2122--1222----12221

 यूँ तो यह बह्र अपने मुसद्दस शकल में ही प्रचलित है मगर मुसम्मन शकल में शायरी करने में कोई मनाही भी नहीं है
मुसम्मन का आहंग निम्न तरीक़े से होगा
[2] बह्र-ए-मुशाकिल मुसम्मन मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ \  मक़्सूर 
फ़ाइ’लातु---मफ़ाईलु-----फ़ाइ’लातु----फ़ऊलुन\ फ़ऊलान
2121--------1221---------2121-----122     \ 1221
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से  एक शे’र देखते हैं

हमने प्यार किया तुमको  ये हमारा है एह्सान
तुम ने लूट लिया हमको ये  तुम्हारा है एहसान

 तक़्तीअ भी कर के देख लेते है--आसान है
  2   1  2  1 /  1 2   2  1    / 2  1 2  1 / 1 2 2 1
हम ने प्यार / किया तुम कू / ये  हमारा / है एह्सान
2     1   2 1 / 1  2  2  1   / 2  1  2  1 /  1 2 2 1
तुम ने लूट/   लिया हम  कू / ये तुम्हारा  / है एहसान

अच्छा -- है एहसान’  [1221 ] को --है ’एहसाँ [122] कर दीजिए --देखिए क्या होता है? कर सकते हैं । एहसान  और एहसाँ में अर्थ के लिहाज़ से कोई फ़र्क नही --मगर तक़्तीअ’ के लिहाज़ से फ़र्क़ हो जायेगा और तब शे’र -फ़ाइ’लातु---मफ़ाईलु-----फ़ाइ’लातु----फ़ऊलुन यानी [2121---1221---2121---122 ] हो जायेगा यानी -बह्र-ए-मुशाकिल मुसम्मन मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़

[3]  बह्र-ए-मुशाकिल मुसद्दस मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ \ मक़्सूर
फ़ाइ’लातु----मफ़ाईलु----फ़ऊलुन \फ़ऊलान
2121-------1221-------122     \ 1221
सरवर राज़ सरवर साहब के हवाले से -एक शे’र देखते हैं

 दर्द-ए-दिल की  करे हाय ! दवा कौन ? 
चारागर है बना तेरे सिवा  कौन ?
-नामालूम-
इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
2    1   2    1   / 1 2 2 1   / 1 2 2 1   = 2121---1221---1221
दर् द दिल की / करे हाय ! / दवा कौन ?
2  1  2    1   /  1 2 2 1 / 1 2 2  1     = 2121-----1221---1221
चार:गर है / बना तेरे    / सिवा  कौन ?
यह ’मक़्सूर’ की शुद्ध मिसाल है --दोनो मिसरों में .मक़्सूर’ ही इस्तेमाल हुआ है
हालाँकि अरूज़ और ज़र्ब में महज़ूफ़ और मक़्सूर का ख़ल्त जायज़ है यानी अरूज़ में ’फ़ऊलुन’ लाया जा सकता है --इजाज़त है

[4] मुशाकिल मुसद्दस मक़्बूज़ मक्फ़ूफ़ सालिम\मुस्बीग़
मुफ़ त इलुन----मफ़ाईलु---मफ़ाईलुन
2112-----------1221--------1222
 एक बात ध्यान देने की है
मफ़ाईलु--में    --लाम-- मुतहर्रिक है
मफ़ाईलुन में      मीम और फ़े --मुतहर्रिक है यानी 3- मुतहर्रिक एक साथ [पर दो adjacent रुक्न में ] तो इस पर ’तख़्नीक़’ का अमल हो सकता है और एक नई बह्र बरामद हो सकती है जैसे

मुफ़ त इलुन------मफ़ाईलुन--फ़ाईलुन [ मफ़ऊलुन]
2112-------------1222-----222
एक बात ध्यान देने की है जब भी तस्कीन-ए-औअसत या तख़्नीक़ का अमल मुज़ाहिफ़ रुक्न पर करते है तो ध्यान रहे आप के इस अमल से बह्र न बदल जाये। यह एक ज़रूरी शर्त है

इस बह्र की मुरब्ब: शकल भी हो सकती है और अर्कान होंगे
[5] मुशाकिल मुरब्ब: सालिम
फ़ाइ’लातुन-----मफ़ाईलुन
2122---------1222
 उदाहरण आप सोचे --आसान है

यूँ तो कुछ और भी बह्र मुमकिन है मगर इन सब की चर्चा करना यहाँ न ज़रूरी है न मुनासिब  है। यूँ भी बह्र-ए-मुशाकिल में शायरों ने कम ही कलाम कहे हैं
इस तरह बह्र-ए-मुशाकिल का बयान ख़तम हुआ और उर्दू में राइज़ 19-बह्रों की चर्चा भी ख़त्म हुई
अब अगले क़िस्त में किसी और बात पर चर्चा करेंगे।
अस्तु

{क्षमा याचना -वही जो पिछले क़िस्त में है}-इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 57 [ बह्र-ए-ख़फ़ीफ़]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 57 [ बह्र-ए-ख़फ़ीफ़]

[Disclaimer cause : वही जो क़िस्त -1 में है]

पिछली क़िस्त 56 में ,बह्र-ए-क़रीब पर चर्चा की है ,अब इस क़िस्त में ’बह्र-ए-ख़फ़ीफ़’ पर चर्चा करेंगे।
उर्दू के अमूमन हर शायर ने इस बह्र  में शायरी की है
 बह्र-ए-ख़फ़ीफ़  एक मुरक़्कब बह्र है जो 3-अर्कान से मिल कर बना है
फ़ाइलातुन---मुसतफ़अ’लुन--फ़ाइलातुन
2122--------2212--------2122
a------------b-------------a
यूँ तो इसकी ’मुसम्मन’ शकल या मुरब्ब: शकल में शायरी करने की मनाही तो नहीं है ,परन्तुउर्दू शायरी में ’मुसद्दस’ शकल में ही और ख़ास तौर से ’मख़्बून’ मुज़ाहिफ़ में  ही ज़्यादातर --ग़ज़लें कही गई हैं।
इस बह्र की मुसम्मन शकल के अर्कान होंगे
फ़ाइलातुन---मुसतफ़अ’लुन--फ़ाइलातुन-----मुसतफ़अ’लुन
2122--------2212--------2122------------2212
  a-------------b-------------a--------------b
 और मुरब्ब: शकल के अर्कान होंगे
फ़ाइलातुन--मुस तफ़अ’लुन
2122---------2212
a-----------------b
मगर कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब ने इसकी ’मुसम्मन शकल’ में एक कोशिश की है --आप भी ऐसी कोशिश कर सकते है। हम यहाँ सिर्फ़ कुछ ’मुसद्दस’ बह्र की ही चर्चा करेंगे -जो काफी प्रचलन में है
एक बात ध्यान देने की है
मुस तफ़अ’ लुन -[2212]--में वतद  ’ तफ़अ’ [21] -’ अपनी ’मफ़रूक़’ शकल में है [यानी सबब+ वतद मफ़रूक़+ सबब] जब कि
मुसतफ़इलुन      [2212 ] में  वतद   ’इलुन’    [12]  अपनी    ’मज्मुआ’   शकल में है [ यानी सबब+सबब+वतद-ए- मज्मुआ}
तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ेगा ? वज़न में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा --मगर ज़िहाफ़ लगाते वक़्त फ़र्क़ पड़ेगा । इस बह्र में ’मुस तफ़अ’- पर वही ज़िहाफ़ लगेंगे जो  ’.वतद-ए-मफ़रूक़’ पर लगते है ---न कि वतद-ए-मज्मुआ वाले ज़िहाफ़ात।
इन अर्कान पर लगने वाले कुछ ज़िहाफ़ की चर्चा कर लेते है

फ़ाइलातुन[2122] + ख़ब्न   = मख़्बून फ़इलातुन 1122

मुस तफ़अ’लुन [2212] +ख़ब्न     = मख़्बून  मफ़ाइ’लुन 1212

अब कुछ मानूस आहंग की चर्चा कर लेते हैं
[1] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्द्स
  फ़ाइलातुन---मुसतफ़अ’लुन--फ़ाइलातुन
   2122--------2212--------2122
कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के ही हवाले से

चाह्ते हैं वो बात उन से करूँ मैं
इस लिए शायद मुझ से बरहम नहीं है 

तक़्तीअ’ देख लेते हैं
2122     /  2  2  1   2/ 2122
चाह्ते हैं / वो बात उन /से करूँ मैं  = 2122---2212---2122
2  1  2   2     / 2 2     1  2 / 2 1 2 2
इस लिए शा /यद मुझ से बर/हम नहीं है   = 2122----2212----2122

[2] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून
फ़ाइलातुन-----मफ़ाइ’लुन--फ़इ’लातुन     [ -इ’ का मतलब -ऐन- मय हरकत है यानी मुतहर्रिक है ]
2122*---------1212--------1122
 आख़िरी रुक्न ’ फ़ इ’लातुन ’ देखें ---इसमे [ फ़े--ऐन--लाम तीनों मुतहर्रिक है और तीनों एक साथ भी है और फ़ इ’लातुन  मुज़ाहिफ़ रुक्न भी है ] तो तस्कीन-ए-औसत  का अमल हो सकता है । तब यह रुक्न ’मफ़ऊलुन’ [2 2 2] मे बदल जायेगी।  आप ’फ़ाइलातुन [2122] की जगह ’ फ़ इ’लातुन [1122] का इस्तेमाल कर सकते हैं तो तस्कीन-ए-औसत का अमल यहाँ भी हो सकता है । मगर ख़याल रहे--एक ही मिसरा में दोनो रुक्न पर तस्कीन-ए-औसत का अमल एक साथ ही न कर दें- [यानी मफ़ऊलुम 222 एक ही मिसरा में न कर दें ] -उचित नहीं होगा
तो एक शकल  यह भी हो सकती है

[2-क] फ़ाइलातुन-----मफ़ाइ’लुन--मफ़ऊलुन   
         2122*---------1212--------222
[3] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख्बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन---मफ़ा इ’लुन---फ़ इ’लुन
2122*---------1212------112‍**
ग़ालिब के शे’र से उदाहरण देते है

दर्द मिन्नत-कशे-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ ,बुरा न हुआ

तक़्तीअ’ कर के देख लेते है
2    1  2     2   / 1 2   1 2  / 112
दर् द मिन् नत/ -कशे-दवा /न हुआ
2  1  2     2   / 1 2  1 2  / 1 1 2
मैं न अच् छा/ हुआ ,बुरा /न हुआ

[3-क] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख्बून महज़ूफ़ मुसक्किन
फ़ाइलातुन---मफ़ा इ’लुन---फ़ेलुन
2122*---------1212------22
एक उदाहरण देख लेते है
ग़ालिब  की एक मशहूर ग़ज़ल है--आप ने भी सुना होगा

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

तक्तीअ’ कर के देख लेते हैं
1 1     2   2   / 1 2 1 2  / 22
दिल-ए-नादाँ / तुझे हुआ /क्या है
2  1      2    2    /  1 2 1 2   / 2 2
आ ख़ि रिस दर् / द की दवा /क्या है
[नोट-दिल को यहाँ 1 1 के वज़न पर लिया गया है कारण कि -दि- तो मुतहर्रिक है ही [1] ---और -ल- भी मुतहर्रिक हो गया[1]   कारण कि आगे -इत्फ़- जो है ।
’आखिर इस ’ -में वस्ल है अलिफ़ का---आ खि रिस [212--]
इसी ग़ज़ल का मक़्ता है

मैने माना कि कुछ नहीं ’ग़ालिब’
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है

तक़्तीअ तो आप कर ही लेंगे---बस यह बताना था कि  दोनो मिसरे-
- 2122--1212---22
-2122  --1212---22 के वज़न मैं है

[4] बह्र-ए-खफ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून मक़्सूर
फ़ाइलातुन---मफ़ा इ’लुन---फ़ इ’लान
2122*---------1212------1121**
मीर का एक शे’र है
अब तो दिल को न ताब है न क़रार
याद-ए-अय्याम जब तहम्मुल  था

अब तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
   2   1  2     2  / 1  2 1 2 / 1 1 2 1   = 2122--1212---1121
अब तो दिल को/ न ताब है / न क़रार
2    1    2   2    / 1 2  1   2    / 2 2  =   2122---1212----22
याद-ए-अय या /म जब त हम् /मुल  था

[4-क] बह्र-ए-खफ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून मक़्सूर मुसक्किन
फ़ाइलातुन---मफ़ा इ’लुन---फ़ेलान
2122*---------1212------221
मीर का एक शे’र है

अब तो जाते हैं बुतकदे से मीर
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा  लाया

तक्तीअ’ आप कर के देख लें --इशारा मैं कर देता हूँ

अब तो जाते /हैं बुतकदे /से ’मीर’  = 2122---1212----221= [----मक़्सूर-मुसक्किन ]
फिर मिलेंगे /अगर ख़ुदा  /लाया     = 2122---1212----22   =[ ---महज़ूफ़ मुसक्किन ]

[नोट  ’मख़्बून’ ज़िहाफ़ के केस में -
* फ़ाइलातुन [2122] की जगह -फ़इ’लातुन [1122] भी लाया जा सकता है । क्यों ? कारण कि ज़िहाफ़ ’ख़ब्न’ दोनो ही रुक्न पर लगता है और एक आम ज़िहाफ़ भी है आप चाहें तो पहले रुक्न पर लगाएँ या न लगाए। दूसरे रुक्न पर तो लगाना ही लगाना है
कारण कि फ़ाइलातुन [2122] का मख्बून फ़ इ’लातुन [1122] ही होता है

**  इन पर तस्कीन-ए-औसत का अमल हो सकता है और अगली बह्र बरामद हो सकती है
और अरूज़/ज़र्ब के मुकाम पर -22/221/112/1121--आपस में सब मुतबादिल भी है --यानी शे’र में एक दूसरे के मुक़ाम पर लाया जा सकता है
चलते चलते इसकी मुरब्ब: आहंग की भी चर्चा कर लेते है

[5] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुरब्ब:
    फ़ाइलातुन -----मुस तफ़अ’लुन
   2122-----------2212
कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब के ही हवाले से

हाल मेरा ? मेरा जुनू
इसको देखा अहल-ए-नज़र

बात दिल की जाने भी दो
दिल कहाँ है किसको ख़बर

दूसरे शे’र की तक़्तीअ कर के देख लेते है---आसान है
2  1    2   2   /   2 2 1 2
बात दिल की / जाने भी दो = 2122--2212
2     1   2  2  / 2     2   1  2
दिल कहाँ है / किस को ख़बर =2122--2212
[6] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुरब्ब: सालिम मख़्बून /मुसब्बीग़
फ़ाइलातुन------मफ़ाइ’लुन/मफ़ाइ’लान
2122-----------1212/12121

हम तरसते रहें निगार
हो तो औरों से हमकिनार
              -नामालूम

इशारा हम कर देते हैं --तक़्तीअ’ आप कर लें
2     1 2   2 / 1 2 1 2 1
हम त रस ते / रहें निगार = 2122---12121
2   1   2 2   / 1 2  1   2 1
हो तो औरों / से हम किनार =          2122---12121
यह मुस्बीग़ का उदाहरण था। अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर मफ़ाइ’लान -12121] की जगह मफ़ाइ’लुन [1212]लाया जा सकता है
एक उदाहरण वो भी देख लें [कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से]

ज़िन्दगी इक सवाल है
साँस लेना मुहाल  है
तक़्तीअ’ आसान है--आप कर के देख सकते है
 इनके अलावा और भी बहूर बरामद हो सकती है जिसकी यहाँ चर्चा करना कोई ख़ास ज़रूरी  भी नहीं है
जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि शायरों ने अपने कलाम ज़्यादातर ’मुसद्दस ’ आहंग में ही कहे हैं -और उनकी ग़ज़लों के अश’आरों में  अरूज़/ज़र्ब के मुकाम पर -22/221/112/1121-का ख़ल्त दिखाई देता है कारण कि ये सब -आपस में सब मुतबादिल भी है
यहाँ कुछ ऐसे ही मशहूर शे’र पेश कर रहा हूँ आप भी लुत्फ़ अन्दोज़ हों--बह्र/आहंग आप पहचाने

तुम हमारे किसी तरह न हुए
वरना दुनिया में क्या नहीं होता
-मोमिन
आँख उस पुरज़फ़ा से लड़ती है
जान कुश्ती कज़ा  से लड़ती  है
-ज़ौक़

जाओ अब सो रहो सितारों
दर्द की रात ढल चुकी है
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
फिर हुईं दिल में हसरतें आबाद
नाले देने लगे मुबारकबाद 
-दाग़ देहलवी
दूर होकर भी पास है कोई 
एह्तमाम-ए-नज़र को क्या कहिए
-शकील बदायूनी
मौत इक गीत रात गाती थी
ज़िन्दगी झूम झूम जाती  थी
-फ़िराक़ गोरखपुरी
मैं जहाँ हूँ तेरे ख़याल में हूं
तू जहाँ है मेरी निगाह में है
-जिगर मुरादाबादी
बेख़ुदी बेसबब नहीं ’ग़ालिब’
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है
-ग़ालिब-
शाम से कुछ बुझा सा रहता है
दिल हुआ है चिराग़ मुफ़लिस का
-मीर-
बेवफ़ा रास्ते  बदलते हैं
हमसफ़र साथ साथ चलते हैं
-बशीर बद्र
अगर आप इजाज़त दे और आप को नागवार न गुज़रे -तो इस हक़ीर के भी कुछ शे’र इसी आहंग में बर्दास्त कर लें

इक धुआँ सा उठा दिया तुम ने
झूट को सच बता  दिया तुम ने
-----
आदमी है,गुनाह  लाज़िम है
आदमी तो ख़ुदा  नहीं  होता
---
लोग क्या क्या नहीं कहा करते
जब कभी तुम से हम मिला करते
---
बज़ाहिर ऐसे हज़ारों अश’आर मिसाल के तौर पर दिए जा सकते है ।इसी बात से पता चलता है कि यह आहंग कितना दिलकश मानूस और आहंगखेज़ है

अब बहर-ए-ख़फ़ीफ़ का बयान ख़त्म हुआ । अगली क़िस्त में किसी और बह्र की चर्चा करेंगे

अस्तु
 {क्षमा याचना -वही जो पिछले क़िस्त में है}-इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 56 [ बह्र-ए-क़रीब ]

     उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 56 [ बह्र-ए-क़रीब ]

[Disclaimer cause : वही जो क़िस्त -1 में है]

यह बह्र भी एक मुरक़्क़ब बह्र है जो 3-अर्कान से मिल कर बनता है अत: यह भी -बह्र-ए-सरीअ’ और बह्र-ए-जदीद--- की तरह मुसद्दस शकल में ही प्रयोग होता है
मगर बह्र-ए-सरीअ’ और बह्र-ए-जदीद-की तरह उर्दू शायरी में बहुत कम ही प्रयोग हुआ है ,। इस बह्र का नाम ’क़रीब’ [समीप] क्यों कहते हैं -मालूम नहीं
कुंवर ’बेचैन’ साहब ने तो इसका हिन्दी नाम ’समीप छन्द’ ही रख दिया-क़रीब के हिन्दी अनुवाद पर।
इस बह्र का बुनियादी अर्कान है---
मफ़ाईलुन-----मफ़ाईलुन---फ़ाइ’लातुन
1222--------1222--------2122

ध्यान रहे -- फ़ाइलातुन [2122] अपने ’मुन्फ़सिल शकल में है] यानी फ़ा इ’लातुन [ यानी -ऐन- अपने मुतहर्रिक शकल में है ] यानी [ वतद मफ़रूक़ + सबब-ए-ख़फ़ीफ़+सबब-ए-ख़फ़ीफ़ की शकल में है ]
जब कि यही रुक्न जब मुतस्सिल शकल मे होती है तो  [सब-ए-ख़फ़ीफ़+वतद-ए-मज्मुआ+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ शकल में होती है]
आप ’वतद’ का लोकेशन देखिए फिर उसी हिसाब से ’इस पर लगने वाले ज़िहाफ़ात’ सोचिए
मुफ़ाईलुन [1222] पर लगने वाले कुछ ज़िहाफ़ात की चर्चा कर लेते हैं
मुफ़ाईलुन [1222] + कफ़्फ़ = मक्फ़ूफ़  मुफ़ाईलु [1221]--लाम मुतहर्रिक
म्फ़ाईलुन  [1222] + ख़र्ब     = अख़रब   मफ़ऊलु[ 2 2 1] --- लाम --मुतहर्रिक

फ़ाइ’लातुन[2122]  पर लगने वाले कुछ ज़िहाफ़ात
फ़ाइ’लातुन [ 2122] +हज़्फ़   =महज़ूफ़ फ़ाइ’लुन  [2 1 2]    [नोट -इ’- को आप -ऐन मुतहर्रिक समझे]
फ़ाइ’लातुन [2122] + क़स्र    = मक़्सूर   फ़ाइ’लान [2 1 2 1] [ ---तदैव-]
चलिए इसके कुछ प्रचलित बह्र /आहंग देख लेते हैं

[1] बह्र-ए-क़रीब मुसद्दस सालिम
मफ़ाईलुन-----मफ़ाईलुन---फ़ाइ’लातुन
1222--------1222--------2122
 एक उदाहरण देख लेते हैं
अब्दुल अज़ीज़ साहब का एक शे’र है

वो भी इक दौर था जिसमें ख़ुशदिली से
न की  मैने   कभी तेरी  मेहमानी 

तक़्तीअ’ कर के देख लेते हैं
1   2    2    2   /1  2  2  2   / 2    1   2  2
वो भी इक दौ / र था जिसमें / ख़ुश दिली से
1   2   2   2/  1 2   2  2  / 2 1 2 2
न की  मै ने / कभी   तेरी / मेहमानी
[2] बह्र-ए-क़रीब मुसद्दस मक्फ़ूफ़
मफ़ाईलु-----मफ़ाईलु-----फ़ाइ’लातुन
1 2 2 1-----1 2 2 1-----2 1 2 2 
मफ़ाईलुन [1222] का मक्फ़ूफ़ [यानी मफ़ाईलुन[1222] पर ’कफ़’ का ज़िहाफ़] मफ़ाईलु  [1221 ]बरामद होता है -यानी -लाम मुतहर्रिक
अब एक उदाहरण भी देख लेते हैं
’सरवर राज़ सरवर के हवाले से

तिरे ग़म में प्यारे निकल गया दिल
शरारे से है फ़ुरक़त के जल गया दिल

तक़्तीअ’ भी देख लेते है
1 2   2   1 / 1  2 2  1/ 2   1 2   2
तिरे ग़म में / प यारे नि /कल गया दिल
1  2  2 1  /  1  2   2     1    / 2   1  2 2
शरारे से   /  है फ़ुर क़त के / जल गया दिल

आप देख रहे हैं कि -में---से---के--- को -1- के वज़न पर लिया गया है कारण कि ये सभी मुतहर्रिक हैं और मुतहर्रिक के मुक़ाम पर भी है और बह्र की माँग भी है
[3] बह्र-ए-क़रीब मुसद्दस मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ /मक़्सूर
मफ़ाईलु-----मफ़ाईलु---फ़ाइ’लुन / फ़ाइ’लान
1 2  2 1-----1 2 2 1-----2 1 2 /2 1 2 1
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से--

अजब शख़्स था लब पर थी उस की जान
तड़पता था तेरा नाम ले के वो

अब तक़्तीअ’ भी देख लेते हैं
1   2    2    1   / 1   2  2    1   / 2    1  2  1
अजब शख़् स / था लब पर थी / उस की जान       [मक़्सूर]
1   2   2   1   / 1 2   2 1 / 2  1 2
त ड़प ता था / तिरा नाम / ले के वो                       [ महज़ूफ़]

मिसरा ऊला मे  ’मक़्सूर’  और मिसरा सानी में ’महज़ूफ़’ लाया जा सकता है।
मगर नामकरण उस ज़िहाफ़ से होगा जो ’मिसरा सानी’ में आता है
यानी इस बह्र का नाम होगा ---क़रीब मुसद्दस मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़"

अगर इस शे’र का यूँ पढ़ें

तड़पता था तेरा नाम ले के वो                                  [ महज़ूफ़]
अजब शख़्स था लब पर थी उस की जान     [ मक़्सूर]

तो इस बह्र का नाम होगा ----क़रीब मुसद्दस मक्फ़ूफ़ मक़्सूर--यानी मिसरा सानी के लिहाज़ से।
मगर ग़ज़ल के अश’आर में इन दोनो का ’ख़ल्त जायज़ है- यानी आपस में ’मुतबादिल’ हैं
एक बात और
अगर ऊपर के दो रुक्न मफ़ाईलु 1221] ----मफ़ाईलु [1221] को ध्यान से देखें तो तीन मुतहर्रिक [लाम--मीम--फ़े] एक साथ आ रहे हैं और तख़्नीक़ की अमल से एक  बह्र और  बरामद हो सकती है
[3-क] मफ़ाईलुन----मफ़ ऊलु  --   -फ़ाइ’लुन
           1 2 2  2 ---- 2   2  1----------212
आप इस बह्र में कोई शे’र सोच सकते हैं -चाहें तो। अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर ’फ़ाइलुन’ [212 ]की जगह ’फ़ाइलान’[2121] भी लाया जा सकता है।

[4] बह्र-ए-क़रीब मुसद्द्स अख़रब मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर
मफ़ऊलु---मफ़ाईलु---फ़ाइ’लातुन
   221----- 1221-------2122 
आप जानते हैं कि ’मफ़ऊलु’[221] ----अख़रब है ’मफ़ाईलुन [1222] का
और ’मफ़ाईलु ’[1221]                -------मक्फ़ूफ़ है ’मफ़ाईलुन’[1222] का
और दोनों में -लु- मुतहर्रिक है
अब एक उदाहरण भी देख लेते हैं -अब्दुल अज़ीज़’ख़ालिद’ साहब का एक शे’र है

मेरी यही तफ़रीह-ओ-दिल्लगी है
करती ही रहे  तेरी इन्तज़ारी

अब तक़्तीअ’ भी देख लेते हैं
2  2  1  / 1 2 2 1   /       2     1 2 1
मेरी ये /ही तफ़रीह-/ ओ-दिल लगी है
2      2  1  / 1 2 2 1  / 2 1  2  2
कर ती ही/  रहे  तेरी/  इन त ज़ारी
यहाँ तफ़रीह-ओ- इन्तज़ारी में जो -इत्फ़- ओ- है उसका वज़न नहीं लिया गया है । क्यों ? कारण आप जानते होंगे
-------
 अगर आप ऊपर के अर्कान के इन्तजाम को ध्यान से देखे तो
मफ़ऊलु--मफ़ाईलु के बीच में क्या है ?  कुछ नहीं बस --लाम-- मुतहर्रिक-----मीम मुतहर्रिक---फ़े मुतहर्रिक है यानी तीन मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ तो ’तख़्नीक़’ का अमल हो सकता है [नोट--तस्कीन-ए-औसत का अमल नहीं होगा कारण कि तस्कीन-ए-औसत का अमल तब होता है जब ’एक ही रुक्न में ’ -तीन मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ आये] तख़्नीक़ का अमल तब होता है जब ’दो adjacent रुक्न’ में तीन मुतहर्रिक एक साथ आयें और दोनो का अमल ’सालिम’ रुक्न पर कभी नहीं होता-हमेशा ’मुज़ाहिफ़’ रुक्न पर होता है ।
तो ऊपर के दोनो रुक्न तख़्नीक के अमल से दो अलग-अलग मुख़्नीक़ रुक्न बन जायेंगे-----’मफ़ ऊ लुम-और - फ़ाईलु--- जिसे हम इसके हम वज़न मानूस रुक्न  ’मफ़ऊलुन---मफ़ऊलु  [ यानी 222---221 ] से बदल लेंगे
तब इस बह्र की शकल हो जायेगी
मफ़ऊलुन----मफ़ऊलु---फ़ाइ’लातुन
222---------221------2122
[4-क] बह्र-ए-क़रीब मुसद्द्स अख़रब मक्फ़ूफ़ मुखन्निक़ सालिम अल आख़िर
मफ़ऊलुन----मफ़ऊलु---फ़ाइ’लातुन
222---------221------2122

एक उदाहरण भी देख लेते है --सरवर राज़ सरवर साहब के हवाले से

 दुख भुगते इस इश्क़ की बदौलत
मुद्दत तक ना पाई हमने राहत 
-नामालूम-
अब इसकी तक़्तीअ भी देख लेते हैं
     2   2  2  /  2   2  1   / 2  1 2  2
 दुख भुगते /  इस इश् क़ / की बदौ लत
2 2    2    /  2  2 1    /   2  1    2  2
मुद्दत तक/  ना पा इ     / हम ने राहत

[5] बह्र-ए-क़रीब मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़\मक़्सूर
मफ़ऊलु-----मफ़ाईलु---फ़ाइ’लुन\फ़ाइ’लान
221---------1221------212\2121
बात साफ़ है -ऊपर दिखाया भी है
मफ़ाईलुन का ’अख़रब’ मुज़ाहिफ़ ----मफ़ऊलु [221] होता है
मफ़ाईलुन  का मक्फ़ूफ़ मुज़ाहिफ़----मफ़ाईलु  [ 1221] होता है
और
फ़ाइ’लातुन का महज़ूफ़ मुज़ाहिफ़------ फ़ाइ’लुन [212] होता है जब कि
फ़ाइ’लातु  का मक़्सूर    मुज़ाहिफ़------फ़ाइ’लान [2121] होता है
अब एक उदाहरण भी देख लेते हैं--डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

आँखों में है अब भी वही समाँ
पहलू में कभी आप थे मेरे

अब तक़्तीअ’ भी कर के देख लेते है
  2  2  1   / 1  2   2   1  / 2 1 2
आँखों में /  है अब भी व /ही समाँ
2   2    1 / 1 2  2  1 /   2 1 2
पहलू में /  कभी आप / थे मि रे

इस बह्र में भी अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर फ़ाइ’लुन की जगह फ़ाइ’लान लाया जा सकता है --ख़ल्त जायज़ है
अच्छा ,एक बात तो रह ही गई
इस बह्र का नाम ’क़रीब’ क्यों रखा गया -मालूम नहीं । मुझे लगता है ,मेरी व्यक्तिगत सोच है कि इसके  अर्कान मफ़ाईलुन [1222] और फ़ाइलातुन [2122] -दोनो एक ही दायरे  से निकले है और क़रीब भी है वतद के लिहाज़ से
या इस पर ज़िहाफ़ात लगाते लगाते लगभग ’रुबाई’ की बह्र के क़रीब पहुँच जाते हैं--शायद इसी लिए। हो सकता है कि मैं ग़लत भी हूँ । अगर आप लोगों को कही कारण मिल जाये तो ज़रूर बताइएगा--कि मेरे इल्म में भी इज़ाफ़ा हो  सके ।

अब मै यह तो नही कह सकता कि बह्र-ए-क़रीब के सारे आहंग की चर्चा मैने कर ली -है -और भी इसके आहंग मुमकिन है और यह आप के फ़न-ए-शायरी पर निर्भर करता है ।
अत: इस बह्र का बयान यहीं ख़त्म करता हूँ
अगले क़िस्त में किसी और बह्र की चर्चा करेंगे
अस्तु

{क्षमा याचना -वही जो पिछले क़िस्त में है}-इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

-आनन्द.पाठक-