गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

चन्द माहिया: क़िस्त 37

चन्द माहिया : क़िस्त 37


:1:
सद ख़्वाब ,ख़यालों में
जब तक  है परदा
उलझा हूँ सवालों में 

;2:
शिकवा  न शिकायत है
मैं ही ग़लत ठहरा
ये कैसी रवायत है

:3:
तुम ने ही बनाया है 
ख़ाक से जब मुझ को 
फिर ऎब क्यूँ आया है ?

:4:
सच है इनकार नहीं
’तूर’ पे आए ,वो
लेकिन दीदार नहीं 

:5;

कहता है कहने दो
बात ज़हादत की
ज़ाहिद तक रहने दो

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
ज़हादत की बातें  = जप-तप की बातें
तूर = उस पहाड़ का नाम जहाँ पर हज़रत
मूसा ने ख़ुदा से बात की थी



सोमवार, 17 अप्रैल 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 30 [ बह्र-ए-हज़ज सालिम -1]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 30 [ बह्र-ए-हज़ज [ सालिम बह्र-1]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

फिछली क़िस्त में हमने बहर मुतक़ारिब और बहर मुतदारिक की सालिम , मुज़ाहिफ़ और इसकी  ’मुज़ाअफ़’  पर चर्चा कर चुके है । हालाँ कि उसके बाद भी  चर्चा की और भी गुंजाइश थी मगर ज़रूरी नहीं थी।
ये दोनो  बह्रें ’ख़म्मासी’ [5- हर्फ़ी] कहलाती है कारण कि इन की जो बुनियादी रुक्न ’फ़ऊलुन’ [122] और ’फ़ाइलुन’ [ 212] हैं वो 5- हर्फ़ी हैं यानी [ --फ़े--अलिफ़--ऐन--लाम--नून] से बनी है
अब हम बह्र-ए-हज़ज की चर्चा करेंगे । यह बह्र सुबाई बहर[7-हर्फ़ी] कहलाती है यानी इनके रिक्न में 7-हर्फ़ का वज़न होता है
इस बहर का बुनियादी रुक्न है --मुफ़ाईलुन [1 2 2 2] यानी [ --मीम --फ़े--अलिफ़---ऐन--ये--लाम ---नून]
यह बहर एक बतद [3 हर्फ़ी] और 2 सबब [2-हर्फ़ी] से मिलकर बना है

मुफ़ाईलुन [ 1222] = वतद+सबब+सबब
    = यानी वतद-ए-मज़्मुआ+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़+सबब-ए-ख़फ़ीफ़
       मुफ़ा [1 2]                   + ई [2}                + लुन  [2]
    =   1 2 2 2 = मुफ़ाईलुन

 आज हज़ज के सालिम बहर की चर्चा करेंगे । सालिम क्यों कहते है अब बताने की ज़रूरत नहीं है शायद। इस बहर में सिर्फ़  सालिम रुक्न  ’मुफ़ाईलुन’ का ही प्रयोग करेंगे कोई ज़िहाफ़ का प्रयोग नहीं करेंगे
[क] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: सालिम
मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन  [दो बार]
  1 2 2 2------1 2 2 2
यानी यह रुक्न अगर  किसी शे’र में 4-बार या मिसरा में 2-बार] प्रयुक्त हो तो उसे मुरब्ब: सालिम कहेंगे [ मुरब्ब: मानी ही 4-होता है]
एक ख़ुद साख़्ता [खुद की बनाई हुई] शे’र सुनाते हैं [पसन्द न आए कोई बात नहीं मयार भले न हों वज़न तो है ---हा हा हा ]

चले आओ मिरे दिल में
फ़ँसी है जान  मुश्किल में 

तक़्तीअ कर के देखते हैं
1  2   2  2  / 1  2  2  2 =1222--1222
चले आओ / मिरे दिल में
             1  2   2  2 / 1  2  2   2 =1222---1222
फ़ँसी है जा /न  मुश् किल में

 एक दूसरा शे’र भी सुन लें [कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से ]

कभी इक़रार की बाते
कभी इनकार की बातें
तक़्तीअ कर के देखते है
1 2   2   2   / 1  2  2  2 = 1222--1222
कभी इक़ रा /र की बाते
            1   2    2   2 / 1  2  2 2 =1222---1222
कभी इन का /र की बातें
जब तक अगली बहर पर जायें -एक खेल खलते हैं [ गुस्ताखी मुआफ़ी के तहत]
सिद्द्क़ी साहब के शे’र को आगे बढ़ाते हुए और अपने कलाम का पेबन्द लगाते हुए

कभी इक़रार की बातें
कभी इनकार की बातें

चले आओ मिरे दिल में 
नहीं कटती हैं अब रातें
[तक़्तीअ आप कर लीजियेगा] इसी तरह आप भी चन्द अश’आर [ क़ाफ़िया बरक़रार रखते हुए] जोड़ सकते हैं --मश्क़ [ प्रैक्टिस] भी हो जायेगी] ख़याल रखियेगा --- ’बातें ’ का क़फ़िया --गाते--- आते---जाते---खाते---नहीं होगा -कारण कि इन में हर्फ़ उल आखिर [आखिरी हर्फ़] में ;नून गुन्ना’ नहीं होगा।  सौगातें---मुलाक़ातें चलेगा। ख़ैर--
एक बात और--
मुरब्ब: बहर में सिर्फ़ सदर/इब्तिदा---अरूज़/जर्ब ही होता है। हस्व का मुक़ाम नहीं होता । होगा भी कैसे? एक मिसरा में 2-रुक्न है --तो जगह ही कहाँ बचा ’हस्व’ के लिए  ?

वैसे सालिम बहर में ग़ज़ल कहना आसान होता है - ज़िहाफ़ से मुक्त  होता है -- ज़िहाफ़ात की कोई झंझ्ट ही नहीं

[ख] बहर-ए-हज़ज मुसद्दस सालिम
    मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन
     1222--------1222---------1222
यानी एक मिसरा में 3-सालिम रुक्न या शे’र में 6-रुक्न] मुसद्दस मानी ही 6
[जनाब आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]

मआल-ए-इश्क़ ख़जलत के सिवा क्या है
कहो सब से न कोई दिल लगाये याँ

अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1  2  2   2 / 1     2    2    2  / 1 2  2   2   = 1222---1222---1222
मआले इश्/ क़  ख़ज लत के/ सिवा क्या है
1   2   2   2  / 1   2 2  2    / 1  2 2  2     = 1222----1222--1222
कहो सब से/  न को ई दिल /  लगाये याँ

इस बहर की ’मुज़ाअफ़’ शकल भी मुमकिन है। उदाहरण आप बताएं तो अच्छा होगा अभी तक मेरे ज़ेर-ए-नज़र गुज़रा नहीं । कभी कहीं मिलेगा तो यहाँ लगा देंगे।

[ग] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम   यह वज़न  ही बहुत  मक़्बूल मानूस और मारूफ़ वज़न है  अमूमन हर शायर ने इस बहर में अपनी ग़ज़ल /अश’आर कहें है और कसरत [ प्राचुर्य, अधिकता से,बहुतायत ] से कहें हैं और कसरत से उदाहरण दस्तयाब [प्राप्य ] हैं
इसका वज़न है

    मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन
     1222--------1222---------1222-------1222
यानी सालिम रुक्न -मुफ़ाईलुन- मिसरा में 4-बार और शे’र मे 8-बार आता है । मुसम्मन मानी 8
अल्लामा इक़बाल की एक नज़्म है

जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों ज़मीनो में 
वो निकलें मेरे ज़ुल्मतखाना-ए-दिल के मक़ीनों में

ख़मोश ऎ दिल ! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा
अदब पहला क़रीना है मुहब्बत के क़रीनों  में

 एक शे’र की तक़्तीअ मैं कर देता हूँ ---एक की आप कर दें
1  2   2      2    / 1  2  2   2      / 1   2  2   2   / 1 2  2  2 =1222---1222---1222---1222 [यहाँ ख़मोश ए दिल --में ==ऐ - श के साथ वस्ल होकर ’शे’ का तलफ़्फ़ुज़ दे रहा है सो 2 का वज़न लिया
ख़मोश ऎ दिल /! भरी मह फ़िल /में चिल ला ना /न हीं अच् छा
1  2     2    2  / 1 2  2  2/ 1  2  2   2   / 1 2 2  2  = 1222---1222---1222---1222
अ दब पह ला /क़रीना है /मु हब बत के / क़रीनों  में

पहले शे’र की तक़्तीअ आप कर के मुतमय्यिन [निश्चिन्त] हो लें

अब एक मीर का एक शे’र लेते है

कभू ’मीर’ इस तरफ़ आकर जो छाती कूट जाता है
ख़ुदा शाहिद है , अपना तो  कलेजा टूट जाता  है

[ मीर -का यह ख़ास अन्दाज़ था -कभी-को -कभू -लिखना । वज़न में वैसे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा]

इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते है
1  2    2    2     / 1   2   2  2      / 1  2  2  2  / 1 2 2 2 = 1222----1222----1222----1222
कभू ’मीर’ इ स/  त रफ़ आ कर /जो छाती कू/ट जा ता है
1  2    2   2    / 1   2   2   2  / 1 2 2 2  / 1 2 2  2 =1222-----1222----1222---1222-
ख़ुदा शा हिद /है , अप ना तो / कलेजा टू /ट जा ता  है

[यहां ’मीर इस’ को 2 2 की वज़न पर क्यों लिया -एक खटका सा लगा होगा आप को। कारण कि मीर के ’र ’ के साथ सामने जो ’इस’ वस्ल हो कर    ---’मी रीस’-- का तलफ़्फ़ुज़ दे रहा है और यह 2- सबब है[सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है]
यानी -कभू -12 -वतद-ए-मज़्मुआ -मुफ़ा [12] के वज़न पर
मी  [2]  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -ई-[2] के वज़न पर
रिस [2] सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -लुन-[2] के वज़न पर

अब एक शे’र ग़ालिब का भी देख लेते हैं

न था कुछ तो ख़ुदा था ,कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने ,न होता मैं तो क्या  होता

हुई मुद्दत कि ’ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है
वो इक हर बात पर कहना कि यों होता तो क्या होता

[यहाँ एक बात वाज़ेह [स्प्ष्ट] कर दें अगर आप मतला समझ गये होंगे  तो ज़िन्दगी के दर्शन भी समझ गए होंगे ।इस मतला का कोई सानी नहीं ,खुदा मग़फ़रत करें]

चलिए एक शे’र की तक़्तीअ मैं कर देता हूँ मतला की आप कर लें
1  2   2   2  / 1    2  2     2   / 1 2  2   2    / 12 2 2 = 1222---1222---1222---1222
हुई मुद् दत / कि ’ग़ालिब’ मर/ ग या पर या /द आता है
1   2    2   2   /  1 2   2  2   / 1   2   2  2 / 1 2    2 2 == 1222---1222---1222---1222
वो इक हर बा /त पर कहना  /कि यों होता /तो क्या होता
तो यह होते हैं मुस्तनद शो"अरा [प्रामाणिक और उस्ताद शायरों] के कलाम -- ऐब से पाक ,मयार में बुलन्द. तवाज़ुन में एक भी मज़ीद  ’हर्फ़’[ अतिरिक्त हर्फ़ ]की गुंजाईश  नहीं ----हमारे जैसे ग़रीब को तो बहुत और  बहुत कुछ सीखने के ज़रूरत है
उदाहरण तो बहुत है अज़ीम शो’अरा के है

अब चलते चलते एक शे’र इस हक़ीर का भी बर्दास्त कर ले[मेहरबानी होगी]

जो जागे हैं मगर जगते  नहीं उनको जगाना क्या
खुदी को ख़ुद जगाना है किसी के पास जाना क्या

इबारत है लिखी दीवार पर गर पढ़ सको ’आनन’
समझ जाओ इशारा क्या ,नताइज़ को बताना क्या

पहले शे’र की तक़्तीअ कर के देखते हैं--मतला की आप कर लें-आसान है
1   2  2  2/  1 2  2  2    / 1  2  2    2  / 1 2 2 2 =1222--1222--1222--1222
जो जागे हैं / म गर जगते  /नहीं उनको /जगाना क्या
1  2    2    2  / 1 2  2 2 / 12 2   2    / 1 2 2 2  =1222---1222----1222--1222
खुदी को ख़ुद/ जगाना है /किसी के पा /स जाना क्या

चलते चलते एक खूब सूरत दिलकश गाना सुनाते है --आप ने सुना भी होगा --यू ट्यूब- पर उपलब्ध है गीतकार राजेन्द्र कृष्ण जी है
फ़िल्म ’शहनाई’ [1964] का है जिसको  विश्व जीत और राजश्री पर फ़िल्माया गया है ।लिन्क नीचे लगा दिया हूँ आप भी सुने
https://www.youtube.com/watch?v=W_YckCpQAoY
गाने की इबारत लिख रहा हूँ

न झटको जुल्फ़ से पानी ,ये मोती फूट जायेंगे
तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा ,मगर दिल टूट जायेंगे

ये भींगी रात ये भींगा बदन ये हुस्न का आलम
ये सब अन्दाज़ मिल कर दो जहाँ को लूट जायेंगे

हमारी जान ले लेगा ,ये नीली आँख का जादू
चलो अच्छा हुआ मर कर जहाँ से छूट जायेंगे

ये नाज़ुक लब है या आपस में दो लिपटी हुई कलियाँ
ज़रा इनको अलग कर दो तरन्नुम फूट जायेंगे  
 
अब 1-2 शे’र की तक़्तीअ कर के देखते है बाक़ी का आप कर के तस्दीक कर लें
  1  2   2   2   / 1  2  2  2  / 1  2  2  2/ 1  2 2 2 1222-1222-1222-1222
न झटको जुल् /फ़ से पानी / ,ये मोती फू /ट जायेंगे
1   2  2   2   / 1  2   2   2  /  1 2    2    2  / 1  2 2 2  1222--1222-1222-1222
तुम्हारा कुछ / न बिग ड़े गा ,/ म गर दिल टू /ट जायेंगे
1    2  2 2 /1 2 2  2   / 1 2  2  2    / 1 2   2  2 1222-1222-1222-1222
ये भींगी रा/ त ये भींगा  /बदन ये हुस् / न का आलम
1   2    2    2   / 1  2     2   2   / 1  2  2  2  /1  2 2 2  1222-1222-1222-1222
ये सब अन् दा / ज  मिल कर दो /जहाँ को लू /ट जायेंगे

अरे ! यह तो बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम की बहर आ गई। तो क्या यह गाना हज़ज मुसम्मन सालिम में लिखा गया है } जी हां

गाना लिख कर उदाहरण देने का मेरा मक़सद यही रहता है कि आप बहर/वज़न की ताक़त को पहचाने,  कितनी तर्न्नुम होती हैं ये बह्रें ,,,,कितनी दिल कश मौसिकी [संगीत] लय तान धुन सुर आरोह अवरोह से बाँधी जा सकती हैं ये ग़ज़लें । पुरानी पीढ़ी के गीतकार .शायर कितना पास [ख़याल] रखते थे अपनी शायरी में । ऊपर के शे’र मे एक भी हर्फ़ न ज़्यादा हुआ न कम हुआ-क्या ग़ज़ल कही है हर वज़न हर शे’र अपनी जगह मुकम्मल । यही कारण है कि ग़ज़ल लिखना आसान भले हो कहना आसान नहीं
आज के फ़िल्मी गीतों की क्या बात करे ---चार बोतल वोडका---काम है मेरा रोज़ का---हो गया गाना । अल्ला अल्ला ख़ैर सल्ला--भगवान ही मालिक है।
एक बात और
एक बात मेरे ज़ेहन में आ रही है ,आप के ज़ेहन में भी आ रही होगी?
 मुतक़ारिब और मुतदारिक के केस में  मुज़ाअफ़ [ 16-रुक्नी] बहर का ज़िक़्र किया था मगर अरूज़ की किताबों में बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम मुज़ाअफ़ का कहीं ज़िक़्र नही देखा और न कोई मिसाल [उदाहरण] ही देखी? न जाने क्यों ? पता नही? इस सवाल का जवाब तो कोई मुस्तनद व मारूफ़ अरूज़ी [प्रमाणित व प्रतिष्ठित ] ही दे सकते हैं आप में से भी शायद कोई दे सकता है। मैं तो नहीं दे सकता ,मेरी  बिसात कहाँ ।

हाँ लाल बुझक्कड़ की तरह कुछ बूझ सकता हूं सही भी हो सकता है ग़लत भी हो सकता है कॄपा कर के इसको प्रमाणिक नहीं मानियेगा } मैं तो ऐसे ही सोच रहा हूँ

मुतक़ारिब या मुतदारिक बहरें ख़म्मसी बहरें [5-हर्फ़ी]बहरें थी अगर इनकी ’मुसम्मन मुज़ाअ’फ़ बहर बनती है
तो  कुल मात्रा  122----122------------------122-  =   5 गुना 8 =40 हर्फ़
या 212---212-------------------------------212-=   5 गुना 8 = 40 हर्फ़

मगर जब सुबाई बह्रे [हज़ज------रमल----रजज़ ] की मुसम्मन मुज़ाअफ़ बनेगी तो क्या होगा  =56 हर्फ़ आ जायेंगे
इतनी लम्बी बहर क्या मौसिकी [संगीत] सपोर्ट कर पायेगी या नहीं ? मालूम नहीं?
मगर हाँ --जिस गज़ल को संगीत बद्ध या लय पूर्ण गाया न जा सके तो फिर वो ग़ज़ल क्या है । ’दाग़’ or JIGAR की ग़ज़लें कोठेवालियाँ यूँ ही तो नहीं गाती थी !
एक बात और---
यूँ तो अरूज़ के लिहाज़ से तो सैकड़ों-सैकड़ों बहर/वज़न का इम्कान [संभावना] है  आप चाहें तो तमाम मुमकिनबहूर/वज़न में शे’र कह सकते हैं मुमानियत नहीं [मनाही] नही है । आप चाहे तो ’टेक्निकली ”बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मुज़ाअफ़’ में शायरी कर सकते हैं मनाही  नहीं है  मगर बात रवायत और रिवाज़ की है। हमारे क़दीम व ज़दीद [पुराने और नए शो’अरा ने कुछ ख़ास मुख़्तलिफ़ मक़्बूल रवायती बहर में ही शायरी की है और बुलन्द पा शायरी की है ।  उन्होने बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मुज़ाअफ़ में या ऐसे हि किसी अन्य बहर [रमल और रजज़ ] मे  शायरी करने से गुरेज़ किया हो।

प की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

अब अगले क़िस्त में बहर-ए-हज़ज के मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा करेंगे 
अस्तु
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-


0880092 7181

रविवार, 9 अप्रैल 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 29 [बह्र-ए-मुतक़ारिब और मुतदारिक का तुलनात्मक अध्यय्न]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 29 [ बहर मुतक़ारिब और मुतदारिक का तुलनात्मक अध्ययन]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

पिछली क़िस्तों में हम बहर-ए- मुतक़ारिब और मुतदारिक की सालिम ,मुरब्ब: ,मुसद्दस मुसम्मन और इनकी मुमकिनात [संभावित] मुज़ाहिफ़ और मुज़ाइफ़ शकल पर  विस्तार से चर्चा कर चुके हैं साथ ही उन पर लगने वाले ’तस्कीन-ए-औसत’ और ’तख़नीक़] का अमल भी देख चुके हैं कि कैसे इन के अमल से अनेकानेक मज़ीद[अतिरिक्त]  बहरें  बरामद की जा सकती हैं
आज हम इन दोनो बहूर का एक तुलनात्मक अध्ययन करेंगे इसमें क्या क्या  समानतायें और क्या क्या  विभिन्नतायें हैं
1- दोनो ही बहूर उर्दू में हिन्दी से आयें है यानी हिन्दी के गीतों से हिन्दी छन्द शास्त्र से आयें है
2- इसमे भी बह्र -ए-मुतदारिक बह्र पहले आया और बहर-ए- मुतक़ारिब बाद में आया
3- दोनो बहर ’ख़म्मासी’ बह्र कहलाती है यानी 5-हर्फ़ी बहर हैं [ ख़म्स: माने ही 5-वस्तुओं का समाहार होता है । ये दोनो बह्रें ’एक सबब ’[2 हर्फ़ी] + एक वतद [ 3 हर्फ़ी] से मिल कर बनती है
4- बह्र-मुतक़ारिब का बुनियादी रुक्न है- फ़ऊलुन [12 2] जो      वतद + सबब  से मिल कर बना है  }
यहाँ ’फ़ऊ [12]    ---- वतद [3-हर्फ़ी ] है   जिसे हम वतद-ए-मज़्मुआ कहते है
और ’लुन’    [2]  --------सबब [2-हर्फ़ी [ है  जिसे हम  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ कहते है
5- बह्र-ए-मुतदारिक का बुनियादी रुक्न ---फ़ा इलुन ह[2 12] है जो सबब+ वतद  से मिल कर बना है
यहाँ    ’फ़ा’ [2]---------सबब [2-हर्फ़ी ] है जिसे हम सबब-ए-ख़फ़ीफ़ कहते है
और ’इलुन’ [ 12] -------वतद [3-हर्फ़ी] है  जिसे हम वतद-ए-मज़्मुआ कहते है
      हालां  कि  हम इसे ’लुन फ़ऊ’ [2 12] भी कह सकते थे---वज़न बरक़रार रखते हुए  मगर नहीं कहते । अरूज़ियों ने सबब और वतद के लिए कुछ ’कलमा’ पहले से ही तय कर रखें हैं जैसे

सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [ 2 ]के लिए -----फ़ा---तुन्---लुन्---ई----मुस् ----तफ़्-
सबब-ए-सकील   [1 1] के लिए-----मु त --इ ल--
वतद-ए-मज़्मुआ [12 ] के लिए----फ़ऊ----इलन्----इला---मुफ़ा----
वतद-ए-मफ़रूक़ [2 1] के लिए---लातु ---

हालाँ कि 4/5- हर्फ़ी वज़न के लिए भी कुछ ऐसे ही लफ़्ज़ तय कर रखे गयें है जिसे ’फ़ासिला’ [ फ़ासिला-ए-सग़रा और फ़ासिला-ए-कबरा कहते हैं] } मगर हमने इस इस्तलाह [परिभाषा] को चर्चा में नहीं लिया। कारण कि हमारे अरूज़ का काम  सबब [2-हर्फ़]  औरवतद[3 हर्फ़] से चल जाता है तो इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। हां कुछ अरूज़ी  अर्कान को फ़ासिला के इस्तलाह [ परिभाषा ] से भी समझाते है-समझा सकते हैं-आप भी चाहें तो समझ सकते है[
एक सोचने की बात है  ----अगर तमाम सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के लिए एक कलमा जैसे --फ़ा--ौर  वतद -ए-मज़्मुआ के लिए एक कलमा मुफ़ा-- वग़ैरह वग़ैरह ही रहता तो इतने ;ज़ुज’ [टुकड़े] याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती अर्कान रटने भी ’सहूलियत’ होती । मगर ऐसा नहीं है अरूज़ की किताब में   ख़ैर----आप  सोचियेगा।
6- ये दोनो बहरें एक ही दायरे [वृत[ से निकल्री हैं जिसका नाम है -दायरा-ए-मुतफ़िका:--।उर्दू अरूज़ में ये दायरे Graphically ऐसे Design किए गये हैं [और उनके अलग अलग नाम भी है ]कि तमाम अर्कान और बहर इस से बरामद हो सकती हैं ।तवालत से बचने के लिए मैने जान बूझ कर इन दायरों पर चर्चा नहीं किया कि ज़रूरत ही नहीं पड़ी । अगर आप और गहराई में जाना चाहतें हैं तो किसी भी ’क्लासिकल’ अरूज़ की किताब में मिल जायेगी।
7- दोनो बह्रें आपस में ’प्रतिबिम्बित’ [mirror image] हैं अत: कभी कभी मुबहम [भ्रम] भी हो जाता है और एक ख़ास बात कि एक का  रुक्न से दूसरा रुक्न बरमद किया जा सकता है जैसे ---
   [वतद+सबब]----वतद+सबब]-----वतद+सबब]-----वतद+सबब]
मुतक़ारिब --- ----फ़ऊ लुन-------फ़ऊ लुन--------फ़ऊ लुन--------फ़ऊ लुन
  122--------     --122-------------122-----------122 = 122---122----122---122

अब इसे बस एक ’स्टेप’ आगे कर दीजिये  फिर देखिए--जैसे
[सबब+वतद]---------[सबब+वतद]------[सबब+वतद]-----[सबब+वतद]
लुन फ़ऊ-----.-------लुन फ़ऊ------,---लुन फ़ऊ---------लुन फ़ऊ [जिसे हम ’फ़ा इलुन’ 212 से बदल लेते हैं सुविधा के लिए]

2   12---------------2  12-------------2   12----------2 1 2 =  212---212---212---212   = लीजिए ये तो बहर-ए-मुतदारिक का वज़न आ गया
8- वतद और सबब -- वतद का एक मानी होता है -’खूंटा -और सबब का एक मानी होता है ’रस्सी’। अब आप कहेंगे अरूज़ में --खूँटा और ’रस्सी’ का क्या काम ? जी काम तो कुछ नहीं बस अर्कान समझने में आसानी हो जाती है
खूँटा- गड़ गया सो गड़ गया ,हिलता नही । वतद अपनी जगह ’फ़िक्स’ रहता है
रस्सी --खूँटे से बँध गई तो बँध गई - बस इर्द गिर्द ,आगे/पीछे घूम सकती है । अब आप वतद[3]  के खूंटे से एक या दो रस्सी  ’सबब’ [2]का  बाँध दीजिये
एक ’सबब’[2] बाँधियेगा तो ख़्म्मासी  सालिम बहर बरामद होगी जैसे
सबब ------------[वतद]   तो मुतदारिक
  -          [वतद]-------सबब तो मुतक़ारिब
दो सबब [2]बाँधियेगा तो ;सुबाई; [7-हर्फ़ी] सालिम बहर बरामद होगी

            [वतद]-----सबब------सबब यानी   12  2  2   =मुफ़ाईलुन  ------ --बह्र-ए-हज़ज
सबब-----     --[वतद]------सबब यानी    2 12   2   = फ़ाइलातुन---------बह्र-ए-रमल
सबब---सबब-- [वतद] यानी   2 2  1  2   = मुस तफ़ इलुन------ बह्र-ए-रजज़

यहां~ पर सबब और वतद आप के समझने के लिए लिख दिया वगरना ये सब अपने मुकाम पर अपने सही रूप ख़फ़ीफ़... सकील--मज़्मुआ---मफ़रुक़ के मुताबिक़ ही होंगे
वग़ैरह वग़ैरह
9-  बहर-ए-मुतक़ारिब  में चूँकि   ’वतद’ पहले आता है अत: ’ख़रम’ का ज़िहाफ़ लगता है } जब इस ज़िहाफ़ का अमल ’फ़ऊ लुन’ पर होता है तो मुज़ाफ़िह रुक्न को ’अख़रम’ नहीं कहते बल्कि ’असलम’ कहते हैं
  और ज़िहाफ़ "सरम और क़ब्ज़’ के अमल से एक मुज़ाहिफ़ बहर बरामद होती है --"मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ सालिम अल आखिर"[जिसका वज़न होता है
 फ़अलु------फ़ ऊलु------फ़ऊलु----फ़ऊलुन--- [यानी -लु- मय हरकत है]
21-----------121---------121------122
इस पर ’तख़्नीक’ के अमल से एक दो नही सैकड़ों वज़न बरामद किए जा सकते है [ पिछले क़िस्त में इस पर चर्चा कर भी चुके है] इसी अमल से अनेकानेक वज़न से एक वज़न यह भी बरामद होती है
फ़अ लुन-------फ़अ लुन-----फ़अ लुन----फ़अ लुन    [ -ऐन साकिन -]
22-------------22-------------22--------22 और इस वज़न का नाम होता है---अरे ! नाम तो वही रहेगा बस शकल बदल गई है वज़न भी वही रहेगा क्योंकि यह वज़न ’तख़्नीक़’ के अमल से बरामद किया गया ह

10-  बह्र-ए-मुतदारिक  में चूँकि ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ पहले आता है अत: इस पर ;ख़ब्न’ का ज़िहाफ़ लगता है जो आम ज़िहाफ़ है और मुज़ाहिफ़ को मख़्बून कहते हैं और वो बहर है
फ़अलुन-------फ़अलुन-----फ़अलुन----फ़अलुन     [यहां -अ- यानी -ऐन मुतहर्रिक है यानी मय हरकत है]
1 1 2-----------1 1 2-------1  1  2----1 1 2      और इस बहर का नाम है --" मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून ’---
 इस पर ’तस्कीन’ के अमल से कई वज़न बरामद किए जा सकते हैं
जिसमे एक वज़न यह भी बरामद होगा
फ़अ लुन------फ़अ लुन------फ़अ लुन----फ़अ लुन [ यहाँ भी -अ-यानी -ऐन मुतहर्रिक है यानी मय हरकत है]
22----------22-----------22----------22-  और इस बहर का नाम है --अरे ! नाम तो वही रहेगा बस शकल बदल गई वज़न भी वही रहेगा कारण कि यह वज़न ’तस्कीन; के अमल से बरामद किया गया है

अब आप (9) और (10) को एक बार ध्यान से देखें --दो हम शकलें बहर बरामद हो गई
ज़ाहिरी तौर पर दो मुख़्तलिफ़ [अलग बहरें] --दो अलग अलग रास्ते से चल कर .....हम शकल बहरें -----पर मक़ाम एक आ गया -यानी -- 22---22---22---22  और  गुत्थी उलझ गई

 ऐसे ही एक गुत्थी पिछली किस्त में भी उलझ गई थी जब दो बहर
(क) बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मक़्तूअ अल आखिर  
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़अ लुन
    212---212-------212-----22
और
(ख)  बह्र-ए--मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन अल आखिर "    
          212---212------212------22
हमशकल बहर बरामद हुई थी।

(9)- में जिस बहर 22---22---22---22--की चर्चा कर रहे हैं वो बह्र-ए-मुतक़ारिब  से बरामद हुआ है और वो भी ’तख़्नीक़’ के अमल से बरामद हुआ है जिसे शम्शुर्रहमान सिद्दिक़ी साहब ने ’मीर की बहर’ के नाम से नवाज़ा है कारण कि मीर तक़ी मीर साहब ने अपनी ग़ज़लों में इस बहर का कसरत से [प्रचुरता से] प्रयोग किया है
(10) -में जिस बहर 22---22---22---22 --की चर्चा कर रहे हैं वो बह्र-ए-मुतदारिक से बरामद हुआ है और वो भी ’तस्कीन’ के अमल से बरामद हुआ है और दोनो बहर ’हम शकल ’ भी हैं

यह उलझन तब और गम्भीर हो जाती है जन इन बहूर की ’मुज़ाअफ़ शकल [16-रुक्नी बहर ] का प्रयोग होता है इन उलझनों में हम भी न पड़ेंगे और न हम चाहेंगे कि हमारे हिन्दीं दां भी पड़े । मात्र बहर और वज़न से ही क्या होगा -शे’र में शे’रियत ,बलाग़त और फ़साहत [ काव्य-सौष्ठव ,काव्य सौन्दर्य ] भी तो होना चाहिए ।
 मात्र ग़ज़ल देख कर या इसकी तक़्तीअ कर के ही ऐसी बह्रों को नहीं पहचान सकते है । पहचानने के लिए कुछ clue चाहिये
 शुरुआत में देखने में तो ये दोनो बह्रें बड़ी आसान ,सरल और सहज  लग रही थी
जैसे     मुतक़ारिब में
 फ़ऊलुन[122] ----फ़ऊलुन[122] ----फ़ऊलुन[122] ----फ़ऊलुन[122]
या         फ़ऊलुन[122] -----फ़ऊलुन[122] ----फ़ऊलुन[122] ---फ़ अल  [1 2]

 इसकी  अन्य सरल मुज़ाहिफ़  बहर में ग़ज़ल या अश’आर कह लिए  और लोग करते भी है ।क्या कबाहत है? कौन इनकी पेचींदगी मे जाय।  

उसी प्रकार मुतदारिक में
फ़ाइलुन [212]-----फ़ाइलुन [212]-----फ़ाइलुन [212]-----फ़ाइलुन [212]
या फ़ाइलुन [212]-----फ़ाइलुन [212]------फ़ाइलुन [212]----फ़अ      [2]  
 या   इसकी  अन्य सरल मुज़ाहिफ़  बहर में ग़ज़ल या अश’आर कह लिए  और लोग करते भी है ।क्या कबाहत है? कौन इनकी पेचींदगी मे जाए।  

और जब उलझने आ गई पेंचीदगी से मुकाबिल हो गए तो सुलझाना ही पड़ेगा।
एक दिलचस्प फ़िल्मी गाना  याद आ गया । आप भी  लुत्फ़-अन्दोज़ हों
-’ आकाश दीप ’ फ़िल्म का है आप ने भी सुना होगा
https://www.youtube.com/watch?v=Sn2X6_hPvNY

मुझे दर्द-ए-दिल का पता न था ,मुझे आप किस लिए मिल गये

मैं अकेले यूँ ही मज़े में था ,मुझे आप किस लिए मिल गये ?

चले जा रहे था जुदा जुदा ,मुझे आप किस लिए  मिल गये ?

कहने का मतलब यह कि---ये अरूज़ और अरूज़ की पेंचीदगियों का पता न था ...मुझे आप क्यूँ यह बता गए ----मैं तो इस से पहले मज़े में था---- गज़ल ’लिखता’ था --फ़ेसबुक 100-50 लोग वाह वाह भी करते थे ---मुझे आप किस लिए सब बता रहे
चलिए ये तो मज़ाक़ की बात हो गई --एक बार फिर अपने मौज़ू पर आते हैं
वो कौन सा clue है जिससे इन बहूर को पहचाना जा सके । कोई बँधा-बँधाया टकसाली ’क्लू’ तो नही है पर कुछ अन्धेरे में तीर तो मारा ही जा सकता है

(क) बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मक़्तूअ अल आखिर    और  (ख)  बह्र-ए--मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन अल आखिर "    
          212---212------212------22                                212---212-------212-----22
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़अ लुन         फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़अ लुन      

कभी कभी सालिम बह्र पर ज़िहाफ़ [मुरक्कब या मुफ़र्द] के अमल से या फिर ’तस्कीन’ और ’तख़नीक़’ के अमल से ऐसे मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद हो जाते है कि मुबहम का बाइस [ भ्रम के कारण] हो जाते हैं
एक बात ध्यान में रखिएगा ---मुतक़ारिब के केस में ’मुज़ाहिफ़ बहर पर तख़्नीक़ का अमल’ होता है  [यानी दो-consecutive रुक्न मिला कर -3 मुतहर्रिक एक साथ लगातार [मुतस्सिल] हो
जब कि .मुतदारिक के केस मे---’मुज़ाहिफ़ बह्र पर ’तस्कीन’ का अमल होता है [यानी एक-रुक्न में 3-मुतहर्रिक एक साथ लगातार [मुतस्सिल] हो
मक्तूअ के केस में --22-- सिर्फ़ अरूज़ और जर्ब में ही आ सकता है और हर शे’र में उसी मक़ाम पर आयेगा कारण कि यह एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो अरूज़ और जर्ब के लिए ही मख़्सूस है जब कि मख़्बून मुसक्किन के केस में --22-- कहीं भी सकता है इत्तिफ़ाक़न यहाँ अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर आ गया वरना हो सकता है कि अगले शे’र में या किसी अन्य शे’र में यह सदर या हस्व के मुक़ाम पर आ जाये त्तस्कीन की वज़ह से । आप ग़ल के अन्य अश.आर देख कर स्वय्ं को आश्वस्त कर सकते हैं

ऐसे ही एक स्थिति मुतक़ारिब के केस में हुई थी । पिछले क़िस्त में चर्चा भी किया था
बह्र-ए-मुतक़ारिब पर ज़िहाफ़ और तख़नीक़ के अमल से  मुसम्मन वज़न में  कई मुतबादिल बहूर में से -एक बहर बरामद हुई थी जिसका वज़न था
[अ] 22---22----22-----22-
और जिसका नाम है---मुतकारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ सालिम अल आख़िर 
और बहर-ए-मुतदारिक पर ज़िहाफ़ और ’तस्कीन; के अमल से मुसम्मन वज़न में कई मुतबादिल बहूर में से-एक बहर बरामद हुई थी जिसका वज़न था
[ब] 22---22---22-----22
और जिसका नाम है---मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन
गुत्थी तब और उलझ जाती है जब ये दोनो रुक्न अपनी अपनी  ’मुज़ाअफ़’ [दो-गुनी] शकल में आ जाती है

देखने से दोनो बहरें [अ] और [ब]  जुड़वा और हमशकल लग रही है पर इन के  नाम जुदा जुदा हैं और बरामद होने के तरीक़े भी अलग है और रास्ते भी अलग  है
अत: मात्र -’देख कर ही किसी ’ग़ज़ल’ या शे’र का वज़न नहीं बताया जा सकता है } ज़रूरत भी नहीं है। असल बात तो शे’र की शे’रियत ,ग़ज़ल में गज़लिय्यत फ़साहत और बलाग़त का है ,मुतस्सिर करने की ताक़त का है--नाम में क्या रखा है
आप ऊपर के ---बह्र-ए- मुतदारिक मुसम्मन मक़्तूअ अल आखिर कहें या  बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन अल आख़िर कहें --क्या फ़र्क़ पड़ता है। आप कह सकते हैं । मगर हाँ -अगर आप अरूज़ जानते हैं और समझते हैं तो कोई ’तथाकथित’ अरूज़ी आप को इस मुद्दे पर घुमा नहीं सकता।

आप ने अब तक इन दोनो बहरों की मुरब्ब:--मुसद्दस---मुसम्मन शक्लें देख चुके हैं और समझ चुके है और उनकी मुज़ाअफ़ [दो-गुनी] शकलें भी  जो आसान भी है और इन पर गुज़िस्ताँ अक़सात में तज़्क़िरा भी कर चुके हैं
 चलते चलते मुज़ाहिफ़ बहरों की इन्हीं दुशवारियों से बचने के लिए  और आप की सुविधा के लिए --हम  ’मुतक़ारिब’    और मुतदारिक के उन मक़्बूल मुज़ाहिफ़  बहरों के नाम  लिख रहा हूँ जो आसान है दिलकश है और बहुत से शायर इस में शायरी किए हैं और करते है आप भी कर सकते है
[क] मुतक़ारिब की मक़्बूल मुज़ाहिफ़ बहर और वज़न"---
(1) मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ /मक़्सूर
फ़ऊलुन--फ़ऊलुन---फ़ऊलुन-- फ़ अल/फ़ ऊ ल  
122---122---122---12/121
इसकी मुसद्दस शकल भी मुमकिन है
[2] मुतक़ारिब मुसम्मन असलम मक़्बूज़ मुख़्नीक़ सालिम अलअखिर
फ़अ लुन---फ़ऊलुन// फ़अ लुन---फ़ऊलुन
22----------122-// 22-----------122 
[3] मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ सालिम अल आख़िर/मुसबीग़
फ़अ लु---फ़ऊलु----फ़ऊलु---फ़ऊलुन /फ़ऊलान
21---------121-------121---122/1221
इस बहर पर तख़्नीक़ के अमल से 16-मज़ीद वज़न बरामद किए जा सकते हैं
इस की मुज़ाअफ़ वज़न भी मुमकिन है
इन्ही 16-वज़न में से एक वज़न यह भी है 
22---22----22-----22-
यानी  फ़अ लुन----फ़अ लुन-----फ़अ लुन-----फ़अ लुन

[4] मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ / मक़्सूर
फ़अ लु---फ़ऊलु----फ़ऊलु---फ़ अल /फ़ऊल
21---------121-------121---12/121
ध्यान दीजियेगा-- अरूज़/जर्ब के मुक़ाम पर [फ़ अल =12= महज़ूफ़ है फ़ऊलुन [122] का
इस वज़न से भी  तख़्नीक़ के अमल से 16 -और वज़न प्राप्त किए जा सकते है
इस के मुज़ाअफ़ वज़न भी मुमकिन है

‘[5] मुतकारिब असलम सालिम मुसम्मन मुज़ाहिफ़ 
[फ़अ लुन--फ़ऊलुन]---[फ़अ लुन--फ़ऊलुन]---[फ़अ लुन--फ़ऊलुन]- [फ़अ लुन--फ़ऊलुन]
] [22-----------122]---[22----------122]----[22-----------122]---[22----------122]
फ़अ लुन [22] ---असलम है फ़ऊलुन [122] का इस बहर में 
इसी प्रकार और भी बहुत से मानूस वज़न प्राप्त किए जा सकते है तमाम वज़न का चर्चा करना यहाँ न मक़ासिद [ उद्देश्य]  है न मुनासिब[ उचित]  है और न ज़रूरत है 


[ख] मुतदारिक की मक़्बूल मुज़ाहिफ़ बह्र और वज़न :--

[1]   मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून
फ़ अ लुन---फ़ अ लुन---फ़ अ लुन---फ़ अ लुन  [-ऐन- मुतहर्रिक]
112--------112--------112---------112
[2] मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन
फ़अ लुन---फ़अ लुन---फ़अ लुन---फ़अ लुन     [-ऐन-बसकून]
22---------22-----------22------22
[3] मुतदारिक मुमुसद्द्स  मख़्बून मुसक्किन
फ़अ लुन---फ़अ लुन---फ़अ लुन---[-ऐन-बसकून]
22---------22----------22  

[4] मुतदारिक मुसम्मन महज़ूज़
फ़ इलुन---फ़ इलुन---फ़ इलुन --- फ़ अ    [ आखिर का -ऐन- बसकून है]
212-- ---212------212---------2
[5] मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुअसक्किन महज़ूज़
फ़ अ लुन---फ़ अ लुन---फ़ अ लुन--- फ़ अ [ यहां आखिर का -ऎन- बसकून है]
22------------22--------22-----------2
इसकी मुज़ाअफ़ शकल भी मुमकिन है 
[7]      मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन मुज़ाअफ़
[फ़अ लुन---फ़ अ लुन]-----[फ़अ लुन---फ़अ लुन] // [फ़अ---फ़ अ लुन]----[फ़अ लुन---फ़अ लुन-]
[22--112] ..-------------------.[22-22]-------// [22-12]--------------------[22-22]
ध्यान देने की बात है  फ़अ लुन = 2 2 = यहा -ऐन- साकिन है तभी तो -फ़े-[ मुतहर्रिक] के साथ मिल कर ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [2] बना रही है और ’लुन’ [2] तो लुन ही है
फ़ अ लुन =[1 1 2]= यहां -ऐन मुतहर्रिक है अत: 1 का वज़न रख रही है और लुन के साथ मिल कर ’वतद -ए-मज़्मुआ ] [ 12 ] [हरकत+हरकत+साकिन] बना रही है
 
इस के अलावा ऐसे और भी बहुत से वज़न होते है जिसकी चर्चा पिछली बहर में मुनासिब मुक़ाम पर  कर चुका हूं} यहाँ पर दुबारा चर्चा करना न मुनासिब है न ज़रूरत है
-----------
खुदा ख़ुदा कर के , बहर-ए-मुतक़ारिब और मुतदारिक [5- हर्फ़ी बह्र] का बयान ख़त्म हुआ

अब अगले किस्त मे सुबाई बहर [7-हर्फ़ी] ’बह्र-ए-हज़ज" की चर्चा करेंगे

मुझे उमीद है कि मुतक़ारिब और  मुतदारिक के  मुज़ाहिफ़ बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-
0880092 7181





शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

चन्द माहिया :क़िस्त 36

चन्द माहिया : क़िस्त 36

:1:
दुनिया को दिखाना क्या !
दिल से नहीं मिलना
फिर हाथ मिलाना क्या !

:2:
कुछ तुम को ख़बर भी है
मेरे भी दिल में
इक ज़ौक़-ए-नज़र भी है

:3:
गुरबत में हो जब दिल
दर्द अलग अपना
कहना भी है मुश्किल

:4;
जितनी  भी हो अनबन
तुम पे भरोसा है
रूठो न कभी , जानम !

:5:
मेरी भी तो सुन लेते
मैं जो ग़लत होती
फिर जो भी सज़ा देते

शब्दार्थ :
ज़ौक़-ए-नज़र = रसानुभूति वाली दॄष्टि
गुरबत   में        = विदेश में


-आनन्द.पाठक-
08800927181

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 28 [बह्र-ए-मुतदारिक -3]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 28 [बह्र-ए-मुतदारिक-3]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

---फिछली 2-क़िस्तों से बहर-ए-मुतदारिक पर बहस चल रही है जिस में अब तक मुतदारिक की सालिम ,मुरब्ब: ,मुसद्दस,मुसम्मन और उसकी मुज़ाअफ़  बह्र की चर्चा कर चुके हैं। साथ ही इस पर लगने वाले तमाम मुमकिनात [संभावित] ज़िहाफ़ात की भी चर्चा कर चुके है। साथ ही  बहर-ए-मुतदारिक सालिम मक़्तूअ अल आखिर ,मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून पर भी चर्चा कर चुके हैं और एक दिलचस्प वाक़या भी बयान कर चुके हैं । परन्तु बहर-ए-मुतदारिक मख़बून की बहस ख़तम नहीं हुई थी। बहस जारी है -------
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़बून का वज़न है
फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्-- फ़इलुन्
1 1 2----1 1 2------1 1 2-----1 1 2  [ -ऐन-ब हरकत यानी मुतहर्रिक]
और कहा था कि ."तस्कीन-ए-औसत"  की अमल से और भी औज़ान [ वज़्न का जमा] बरामद किए जा सकते हैं जिसमे एक औज़ान दर्ज-ए-ज़ैल [ निम्न]  भी बरामद होगा

[क] फ़अ लन्----फ़अ लुन्----फ़अ लुन्---फ़अ लुन्      [ -ऐन- ब सकून ]
  22-------- 22---------22----------22-   और इस बहर का नाम होगा  बह्र-ए--मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन"
एक उदाहरण लेते हैं

रह जाता पर्दा उल्फ़त का 
पलकों ने छलकाए   आँसू
अब इसकी तक़्तीअ भी कर के देखते हैं
 2     2 /  2   2   /  2   2   /  2   2 = 22---22---22--22
रह जा / ता पर् / दा  उल / फ़त का
2      2   /    2   2  / 2  2   / 2  2 = 22---22---22---22
पल कों /  ने छल  /का ए   /आँ सू
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़बून  मुज़ाअफ़ का वज़न है

फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्-- फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्-- फ़इलुन्
1 1 2----1 1 2------1 1 2-----1 1 2-- 1 1 2----1 1 2------1 1 2-----1 1 2
जैसा कि ऊपर कह चुके है [और पिछली किस्त में चर्चा भी कर चुके है ] कि इस मुज़ाहिफ़ बहर पर ’तस्कीन-ए-औसत ’ के अमल से अनेकानेक वज़न बरामद की जा सकती है जिसमें से एक वज़न निम्न्  भी होगी
फ़अ लुन्----फ़अ लुन्----फ़अ लुन्---फ़अ लुन्    --फ़अ लुन्----फ़अ लुन्----फ़अ लुन्---फ़अ लुन्        [ -ऐन- ब सकून ]
[ख] 22-----------22----------22--------22--------22-----------22---------22----------22
और इस बहर का नाम होगा ’बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन मुज़ाअफ़ ---इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ’ तस्कीन’ का अमल किस रुक्न या किस मुक़ाम पर किया गया है-ऐसी बह्र में ’तस्कीन’ का अमल किसी रुक्न पर.किसी मुक़ाम पर किया जा सकता है और यह जाइज भी है
और शायरी में ऐसी बह्र [16-रुक्नी] बह-ए-शिकस्ता भी होती है [ बह्र -ए-शिकस्ता पर किसी और मक़ाम पर तफ़्सील से चर्चा करेंगे]
अब एक दिलचस्प बात और ---चलते चलते--
जब बहर-ए-मुतक़ारिब के मुज़ाहिफ़ बहर की चर्चा कर रहे थे तो ऐसी ही शकल की बहर
22---22----22----22----22---22----- से साबका [सामना] हुआ था जिसे हम आप ’मीर’ की बहर कह कर आगे बढ़ गए थे । अब इन दोनो ’हम शकल बहर का ’तुलनात्मक अध्ययन" और उस में बुनियादी फ़र्क़ पर तफ़्सील अगले क़िस्त में पेश् करेंगे। सोसा छोड़ दिया है मैने यहाँ।

आज हम मुतदारिक की कुछ और मुज़ाहिफ़ बह्र की चर्चा करेंगे

[ग]  बहर-ए-मुतदारिक मुसद्दस  महज़ूज़ :  इस बहर की बुनियादी वज़न है
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़अ
212-------212------2
हम जानते हैं कि
फ़ाइलुन [2 1 2] + हज़्फ़  = महज़ूफ़ ---फ़अ [2] यहाँ -ऐन-बसकून है यानी साकिन है और चूँकि हज़फ़ एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो शे’र के ख़ास मुक़ाम ’अरूज़ और जर्ब" के लिए निर्धारित हैं
एक मिसाल [उदाहरण] लेते हैं [कुछ मिला नहीं तो ख़ुद साख़्ता (स्वयं का बनाया हुआ) ही कह दिया...कृपया मयार न देखियेगा ]

आप से क्या कहें हम
आँख मेरी है  क्यूँ नम ?

तक़्तीअ भी कर लेते है
2    1   2 /  2   1  2   / 2 =212--212--2
आ प से /  क्या क हें  /हम
2     1 2  / 2  1  2   / 2 = 212---212--2
आँ ख मे /री है  क्यूँ  /नम ?

[घ] बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन महज़ूज़ : इस बहर का बुनियादी वज़न है
फ़ाइलुन्---फ़ाइलुन्--फ़ाइलुन्--फ़अ
212-------212-------212-----2

अपनी सूरत ज़रा तुम दिखा दो 
मेरे दिल की लगी को बुझा  दो

अब तक़्तीअ कर के देखते हैं
  2  1   2  / 2  1  2  / 2  1  2    / 2   =   212---212---212---2-
अपनी सू /रत ज़ रा /तुम दि खा /दो
2  1     2 /  2  1 2  /  2 1 2   / 2 = 212---212---212---2
मेरे दिल / की लगी /को बु झा  /दो

वही बात -यहाँ भी बह्र की माँग पर -नी- -रे-  पर की मात्रा गिरा कर इसे-1- के वज़न पर लिया गया है वरना तो ये -2- के वज़न पर के हर्फ़ हैं } अगर कहीं ज़रूरत पड़ी तो या कहीं बह्र की माँग हुई तो  इसे 2 के ही वज़न पर लेंगे
आप को इस वज़न पर और भी बहुत से अश’आर मिल जायेंगे .चाहें तो आप भी बना सकते है कोई शे’र या मिसरा।
चलिए एक और उदाहरण लेते हैं [ जनाब आरिफ़ ख़ान साहब के हवाले से]

नरम बिस्तर पे बे ख़्वाब था कल
आज सोता है जो पत्थरों  पर 

आप की तसल्ली के लिए ,इसकी भी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
  2    1    2  / 2  1  2 /   2  1  2 /  2 = 212---212---212--2
 नर म बिस/ तर पे बे /  ख़ा ब था /कल
2  1     2   /  2  1  2/   2  1   2   / 2 = 212---212---212--2
आ ज सो / ता है जो /  पत थ रों  / पर
यहाँ भी वही बात - -पे- -है-  पर मात्रा गिरा कर -1- की वज़न पर लिया गया है औए यह शायरी में जायज है।
इस बहर की मुज़ाअफ़ शकल  भी मुमकिन है

[च]  बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन महज़ूज़ मुज़ाअफ़   - इस बहर की बुनियादी वज़न है
फ़ाइलुन्---फ़ाइलुन्--फ़ाइलुन्--फ़अ-//-फ़ाइलुन्---फ़ाइलुन्--फ़ाइलुन्--फ़अ
212-------212-------212-----2// 212-------212-------212-----2
 इसकी भी एक मिसाल देखते है [ डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]

मेरा वादा है तुझ से यह हमदम , आँधियाँ आए तूफ़ान आए
ज़िन्दगी की डगर में सदा मैं  ,साथ तेरा निभाता   रहूँगा

 अब इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते है
2  1   2/ 2 1  2   / 2 1  2  / 2  //     2 1 2 / 2 1 2 / 2 1 2    /2 = 212--212---212--2 // 212---212---212---2
मेरा वा/दा है तुझ /से ये हम/दम //, आँधियाँ /आए तू/ फ़ान आ /ए
 2   1   2 /   2  1 2  / 2 1 2 / 2 //  2 1 2   / 2 1 2 / 2  1  2 / 2 = 212---212---212-2 // 212--212---212--2
ज़िन्दगी  /की डगर /में सदा  /मैं  // ,साथ ते/ रा निभा /ता   रहूँ /गा

 अब यह मत पूछियेगा कि --रा---है---ये---ए-- को -1- की वज़न पे क्यूँ  लिया ?अब् आप् जान् गए होंगे
अच्छा .हम लोगो ने मुतदारिक की ---- मख़्बून मुज़ाहिफ़  और महज़ूज़ मुज़ाहिफ़ की चर्चा ऊपर कर चुके हैं और तस्कीन के अमल की भी चर्चा कर चुके है
अब ऐसे बह्र की चर्चा करेंगे जो एक साथ  मख़्बून भी हो और महज़ूज़ भी है

{ छ] मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन महज़ूज़--- इस बहर का बुनियादी वज़न है
 फ़अ लुन्--- फ़अ लुन्---फ़अ लुन्   ---फ़अ         -[यहाँ भी-ऐन-बसकून है]        [
 22-------------22--------22--------2
एक उदाहरण देखते है [ आरिफ़ हसन खान साहब की किताब से]

मुझ में बस तू ही तू है
मैं तेरा आईना   हूँ 

इसकी तक़्तीअ भी कर लेते हैं
2      2  / 2   2/  2  2 / 2 22---22---22---2
मुझ में /बस तू  /ही तू /है
2   2  / 2  2/  2  2 / 2 22---22----22--2
मैं ते /रा आ /ई ना  /  हूँ

इस बहर की मुज़ाअफ़ शकल भी मुमकिन है
[ज]  मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन महज़ूज़ मुज़ाअफ़     इस बहर का बुनियादी वज़न है
 
 [ज] फ़अ लुन्--- फ़अ लुन्---फ़अ लुन्   ---फ़अ  // फ़अ लुन्--- फ़अ लुन्---फ़अ लुन्   ---फ़अ         -[यहाँ भी-ऐन-बसकून है]        [
 22-------------22--------22--------2   //   22-------------22--------22--------2

यह् बहर शिकस्ता भी है

एक उदाहरण देखते हैं

तुझ बिन घर का हर गोशा ,सूना सूना लगता है
अपना घर भी अब मुझको ,बेगाना सा लगता है

अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
      22    /  2 2    /  2  2  / 2  // 2  2 / 2  2 /2  2     / 2 =   22---22---22---2//22 ---22---22--2
तुझ बिन / घर का /हर गो /शा //,सूना / सूना/ लग ता  /है
       2 2 /  2  2/  2    2    / 2 //  2 2  / 2 2 / 2    2  / 2 =22---22----22---2 // 22---22---22--2
 अपना /घर भी/ अब मुझ /को //,बे गा /ना सा/ लग ता /है

यूँ तो मुतदारिक पर दो ज़िहाफ़ के अमल से और भी वज़न बरामद किए जा सकते है मगर उन तमाम वज़न की ज़रूरत नहीं है
मानूस बहर की चर्चा कर चुका हूँ आप चाहे तो कोई ख़ास वज़न चुन कर शायरी कर सकते है /शे’र अश’आर कह सकते है जो वज़न और बहर से पाक होगी

यह बहस तो शायरी की आधी बहस ही चल रही है यानी अरूज़ की है वज़न की है बहर की है रुक्न-ओ-अर्कान की है
आधी बहस तो बलाग़त फ़साहत इल्म-ए-बयान की होती है } ख़ैर....
अगली क़िस्त में बहर-ए-मुतदारिक और बहर-ए-मुतक़ारिब पर तुलनात्मक अध्ययन पेश करेंगे


मुझे उमीद है कि मुतदारिक के इस मुज़ाहिफ़ बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 27 [बह्र--ए-मुतदारिक-2]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 27 [बह्र-ए-मुतदारिक-2]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

पिछली क़िस्त में  हम  मुतदारिक की सालिम बह्र --यानी मुरब्ब:---मुसद्दस--मुसम्मन   --और इनकी मुज़ाअफ़ [दो गुनी] बहूर पर चर्चा कर चुके हैं
आज हम बहर-ए-मुतदारिक पर लगने वाले ज़िहाफ़ात का ज़िक्र करेंगे

बहर-ए-मुतदारिक की बुनियादी रुक्न है -’फ़ाइलुन’ [ 212]
यानी  सबब [2] +वतद [1 2] से मिल कर बना है यानी 2 12 = फ़ाइलुन।
ध्यान रहे -बह्र-ए-मुतक़ारिब [ फ़ऊ लुन  12 2 ] में ’सबब’ और ’वतद’ का क्रम उल्टा था यानी पहले वतद [फ़ऊ 12 ] था  बाद में सबब [लुन 2] था यानी 12 2 था

अब रुक्न ’फ़ाइलुन’ पर वही ज़िहाफ़ लगेंगे जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होने वाले और वतद-ए-मज़्मुआ पर ख़तम होने वाले ज़ुज [टुकड़े]  पर पर लगते हैं जिसकी चर्चा हम पिछले अक़्सात [क़िस्तों] में कर भी चुके है ।फिर भी एक बार दुहरा देता हूँ
 वो ज़िहाफ़ हैं
(क) सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होने वाले टुकड़े पर लगने वाले ज़िहाफ़ =ख़ब्न-- यह आम ज़िहाफ़ है

(ख) वतद-ए-मज़्मुआ से ख़त्म होने टुकड़े  पर लगने वाले ज़िहाफ़       = क़तअ--अरज ----ह्ज़ज़---तम्स-----इज़ाला---तर्फ़ील--खलअ

(ग)  मुरक़्क़ब ज़िहाफ़   = ख़ब्न+इज़ाला ----ख़ब्न+तर्फ़ील----

(घ)  और बरामद मुज़ाहिफ़ पर लगने वाले ’तसकीन’ या ’ तख़नीक़’ की अमल से बरामद होने वाले रुक्न

इन ज़िहाफ़ात पर गुज़िस्तां अक़सात [पिछले क़िस्तों में ] चर्चा कर चुके है

फ़ाइलुन [2 1 2] का ख़ब्न   = मख़्बून है----------- [फ़े इलुन =112]
 फ़ाइलुन [2 1 2  का क़तअ = मक़्तूअ है----------[फ़अ लुन =2 2 ]  
फ़ाइलुन [2 1 2] का हज़ज़   = महज़ूज़ या अहज़ है - [फ़अ-------...=2]   यहाँ  ’ऐन- साकिन है
फ़ाइलुन [2 1 2] का अरज    =अरज  है      --------[फ़अ लान -- 2 2 1]  यहाँ भी -ऐन - साकिन है
फ़ाइलुन [2 1 2] का इज़ाला = मज़ाल है   --------[ फ़ाइलान  =2121 ] 
फ़ाइलुन [2 1 2] का  तर्फ़ील = मुरफ़्फ़ल है------[फ़ाइलातुन = 2122 ]
इसके अलावा -फ़ाइलुन- [2 1 2] पर मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ [दो या दो से ज़्यादा ज़िहाफ़ का एक साथ अमल ] भी लगते है मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ की चर्चा हम पिछले क़िस्त में कर चुके हैं हम यहां चर्चा उन्हीं मुरक़्क़ब  ज़िहाफ़ पर महदूद [सीमित] रखेंगे
(1) ख़ब्न+ तसकीन 
(2) ख़ब्न+तर्फ़ील
(3) ख़ब्न + मज़ाल
(4} ख़ब्न+ तर्फ़ील + तस्कीन
(5} ख़ब्न + मज़ाल + तस्कीन

चूँकि मुतदारिक बह्र के मुरब्ब: और मुसद्दस शकल कम दस्तयाब [प्राप्य] हैं ज़्यादातर मुसम्मन शकल ही मिलती है अत: उदाहरण भी मुसम्मन या मुसम्मन मुज़ाअफ़ में ही ज़्यादा मिलता है

[क]  बहर-ए-मुतदारिक की academically and technically तमाम मुम्किनात [ सभी संभावित] मुज़ाहिफ़ बह्र की चर्चा तो कर दी है पर हक़ीकत [सच] तो यह है शो;अरा [शायर बन्धु]  मुतदारिक बहर की इन तमाम मुज़ाहिफ़ या मुज़ाअफ़ बह्र में शायरी नहीं करते । अमूमन जो इसमे मक़्बूल [लोकप्रिय]  बहर है जैसे --मुतदारिक मुसम्मन सालिम /मुसद्दस सालिम /,मुसम्मन मख्च्बून./मुसद्दस मक्तूअ या इनकी मुज़ाइफ़ बह्र में ही शायरी करते हैं
बह्र-ए-मुतदारिक के कुछ  मानूस बह्र की सूची लिख रहा हूं-  इसका मतलब कत्तई  यह न समझा जाये कि निम्न लिखित बह्र के अलावा मुतदारिक की कोई और बहर ही  नहीं । होती हैं--यह आप के ज़ौक़-ओ-शौक़ पर निर्भर करता है कि आप कौन सी बह्र  में शायरी करना या तबअ आज़माई करना पसन्द करते हैं --

[1] बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम --- इस बह्र पर पिछले क़िस्त में चर्चा कर चुका हूं एक बार फिर कर  लेता हूं -
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन-----फ़ाइलुन----फ़ाइलुन
212-------212--------212--------212
आप को एक हिन्दी फ़िल्म का गाना सुनाते है --आप ने सुना होगा - यह ग़ज़ल नहीं है बस गीत है ’यू -ट्यूब’ पर मिल जायेगा ळिन्क लगा रहा हूँ
https://www.youtube.com/watch?v=_A-BAt4k2gU

इक चमेली के मड़्वे तले

मैकदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर
दो बदन प्यार की आग में जल गए

इक चमेली के मड़वे तले 
  यह मशहूर गीत --शायर  मुहिद्दीन ’मख़्दूम’ साहब की एक मशहूर आज़ाद नज़्म है जिसे आशा भोसले और रफ़ी साहब ने बड़ी दिलकश आवाज़ में गाया है और मौसिकी की तो बात ही न पूछिए

ज़रा सोचिए कि यह मिसरा किस बहर मे है ??? एक मिसरे की तक़्तीअ कर के देखते हैं
2     1  2  /   2 1 2     / 2 1 2    =  2 1 2----212----2 1 2  [ बहर-ए-मुतदारिक मुसद्दस] की शकल
इक च मे  /ली के मड़/ वे तले
मगर दूसरा मिसरा
   मै कदे        /से ज़रा     /दूर उस /मोड़ पर
 2   1   2   /  2   1  2 /  2 1 2 / 2 1  2 = 212---212---212---212 [ बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन ] की शकल में
 दो ब दन  / प्यार की/ आग में /जल ग ए

यानी एक ही गीत में  दो या दो से ज़्यादा बहर का इस्तेमाल किया गया है फिर भी मधुरता में कोई कमी नही आई }गीत दिलकश बन पड़ा। इसी तरह ’माहिया ’ में भी दो-मुख़्तलिफ़ बहर का इस्तेमाल होता है मगर गायकी मौसिक़ी या रवानी में फ़र्क़ नही आता ।
क्यों??
वो इस लिये कि शायरी के बहर गीत संगीत मौसिक़ी पर ही तराशे गए है ’डिजाइन’ किया गया है। एक भी हर्फ़ या लफ़्ज़ इधर से उधर हुआ कि ताल बेताल हो जायेगा सुर ,बेसुर हो जायेगा मिसरा बह्र से ख़ारिज़ हो जायेगा  । कहने का तात्पर्य यह कि मुक्त छन्द में भी रुक्न अर्कान वज़न बहर लय गति का समावेश किया जा सकता है और दिलकशी बरक़रार रखी जा सकती है} मगर हिन्दी में आजकल ’मुक्त छन्द"या अतुकान्त कविता के नाम पर नस्र की लाइनों को तोड़ तोड़ कर कविता  के नाम पर जो कुछ पेश  किया जा रहा है ---अल्लाह अल्लाह ख़ैर सल्ला....। वो तो बात चली तो बात निकल आई।

इस बहर की मुज़ाअफ़ [दो गुनी-16 रुक्नी) शकल भी मुमकिन है
इस बहर की  मुरब्ब: शक्ल -यानी  212---212-- भी मुमकिन है ,,,,,...." मुसद्दस शकल " यानी  212---212--212- भी मुमकिन है

इस पर चर्चा पिछली क़िस्त में कर चुका हूँ चाहे तो एक बार आप देख सकते हैं
[2] बहर--ए-मुतदारिक मुसम्मन मज़ाल  -- 
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन-----फ़ाइलुन----फ़ाइलान
212-------212--------212--------2121
यह बहर ऊपर की बहर का extended form समझ लें यानी मुतदारिक मुसम्मन के आखिरी रुक्न [जो अरूज़ और जर्ब के मुकाम पर है] पर इज़ाला की इज़ाफ़त लगी हुई है जिस से  फ़ाइलुन [212]--- फ़ाइलान [2121] हो गया मुज़ाहिफ़ को  मज़ाल  कहते हैं
[नोट --आप ’मुज़ाहिफ़" और ’मुज़ाअफ़’ से confuse न होइएगा। "मुज़ाहिफ़"---ज़िहाफ़ से बना है जब कि मुज़ाअफ़ ---मुज़ाअफ़ से बना है जिसकी  मानी होती  है दो गुना करना
उदाहरण - [’सरवर’ साहेब की किताब ’आसान अरूज़ और निकात-ए-शायरी के हवाले से ---

जाँ निसार अख्तर [जी हाँ ,वही जावेद अख़्तर के वालिद जान] का एक शे’र है आप भी तुत्फ़ अन्दोज़ होइए-

और क्या है सियासत के बाज़ार मे 
कुछ खिलौने बचे है दुकानों के बीच

इस बहर पर चर्चा पिछली क़िस्त [26] में भी कर चुका हूँ । कुछ चर्चा वहाँ बाक़ी रह गई थी सो अब यहां कर रहा हूं~
अख़्तर साहब के शे’र की अगर आप तक़्तीअ करेंगे  तो आप पायेंगे कि
मिसरा उला का वज़न ---212---212---212---212- [यानी सालिम ] पर उतर रहा है जब कि मिसरा सानी का वज़न 212---212---212--2121 [यानी मज़ाल ] पर उतर रहा है । घबराने की कोई बात नही है --शे’र फिर भी वज़न में है
कारण ? ज़िहाफ़ इज़ाला [ मुज़ाहिफ़ मज़ाल] एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो शे’र के अरूज़ और जर्ब के लिए ही ख़ास है और किसी शे’र के आख़िर में एक साकिन बढ़ाने से वज़न में फ़र्क नहीं पड़ता -वज़न वही रहता है ।अत: मिसरा [उला या सानी में]   ’मज़ाल ’ का ख़ल्त [मिलावट)  ज़ायज है
-------
[3]  बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मक़्तूअ अल आखिर    ---इस का बुनियादी वज़न है 
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़अ लुन 
      212---212-------212-----22
यानी फ़ाइलुन [212]  पर ’क़ता’  का ज़िहाफ़ लगाएगे तो  ’फ़अ लुन [2 2]  बरामद होगा और चूंकि ’क़ता’ एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ही आता है और जो यहाँ आया भी है । इसी लिए इसे मक़्तूअ अल आख़िर लिखा है। न भी लिखेंगे तो भी चलेगा। कारण कि आप ने मुसम्मन कह दिया तो मिसरा में 4-रुक्न ही होगा और .मक़्तूअ’ कह दिया तो एक रुक्न पर ज़िहाफ़ लगा है और मक़्तूअ हमेशा ’अरूज़ या जर्ब’ के मुक़ाम के लिए मख़्सूस होता है तो ’अल आख़िर ’ही होगा allied way  से ।हाँ ’अल आख़िर’ लिख देने से इतनी माथा-पच्ची नहीं करनी पड़ेगी explicit way से सीधा समझ में आ जायेगा।
कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से एक उदाहरण लेते हैं

राह में हो मुलाक़ात ,नामुमकिन
हो कभी ये करामात ,ना मुमकिन

अब इसकी तक़्तीअ भी कर लेते हैं
2  1  2 / 2 1  2/ 2 1  2  /  2  2  =  212---212---212---22
राह में /हो मुला/क़ात ,ना /मुम किन
2   1  2   / 2 1 2 / 2 1 2/  2  2
हो कभी /ये करा /मात ,ना/  मुम किन = 212---212---212---22
यह बहर--मुतदारिक मुसम्मन  मक़्तूअ अल आखिर है

[4] बहर-ए-मुतदारिक मुसद्दस मख़्बून --इसका बुनियादी वज़न है
फ़ इलुन---फ़ इलुन---फ़ इलुन   [-ऐन- मय हरकत यानी मिसरा में तीन बार
1 1 2-----1 1 2------1 1 2-
फ़िलवक़्त तो कोई शे’र ज़ेहन में नहीं आ रहा है .कभी ज़ेर-ए-नज़र आया तो ज़रूर लगा दूंगा

अगर आप की नज़र से गुज़री हो तो ज़रूर बताइएगा
[5] बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून 

फ़ इलुन---फ़ इलुन---फ़ इलुन----फ़ इलुन  [-ऐन- मय हरकत] यानी मिसरा में चार बार
1 1 2-----1 1 2------1 1 2-----1 1 2
ऊपर लिख चुका हूँ कि ’फ़ाइलुन’ [212] का मख़्बून होता है  ’फ़ इलुन [1 1 2 ] यहां -ऐन {इ) मुतहर्रिक है

जनाब आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से एक उदाहरण लेता हूं

तुझे चाह के चाहा किसी को न फिर
तुझे देख के देखा किसी को न फिर

इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं
1  1   2  / 1  1 2     /1 1   2    / 1 1 2 =112---112---112---112
 तु झे चा/ह  के  चा / हा  कि सी /को न फिर
1  1  2 /1  1  2  /1  1   2    / 1 1  2 =112---112---112---112
तु  झे  दे /ख के दे / खा कि सी  /को  न फिर

आप यहाँ देख रहे हैं कि बहर की माँग पर -झे--के---हा--को--खा  ---सब की मात्रा गिरा कर -1- की वज़न पर लिया गया है [जो शायरी में जायज है] अगर बहर में किसी जगह अगर -2- के वज़न की ज़रूरत पड़ती तो यही शब्द फिर -2- का वज़न देते} सब बह्र की माँग पर निर्भर करता है

[तक़्तीअ के असूल पर किसी क़िस्त में कभी विस्तार से चर्चा करेंगे।
नोट-इस बह्र को  मुज़ाअफ़  शकल में भी इस्तेमाल कर सकते हैं

इस बहर की मुज़ाअफ़ शकल  भी देख लें
[6]  बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुज़ाइफ़ [16-रुक्नी]  मिसरा में 8-रुक्न

फ़इलुन----फ़इलुन-----फ़इलुन----फ़इलुन---फ़इलुन---फ़इलुन---फ़इलुन----फ़इलुन
1 1 2-----1 1 2------1 1 2-----1 1 2---1 1 2-----1 1 2------1 1 2-----1 1 2
कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब की किताब के हवाले से [उन्हीं की एक ख़ुदसाख़्ता शे’र से\

उसे नाज़ था अपनी इनायतों पर ,उसे फ़ख़्र था अपनी नवाज़िशों पर
मेरे हाथ में भीख का कासा न था,न तो मेरे लबों पे सवाल ही था  

इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं
1  1  2  / 1  1    2  / 1 1  2  / 1 1  2 /   1 1   2    / 1  1  2  / 1 1 2  / 1  1  2    = 112--112--112--112--112-112---112---112-
उसे ना / ज़ था अप/ नी इ ना /य तों पर /,उ से फ़ख़/ र था अप /नी न वा /ज़ि शों पर
1  1 2  / 1 1 2  / 1  1  2  / 1  1  2/  1  1  2  / 1 1 2 / 1  1 2  / 1 1  2    = 112--112--112--112--112--112--112--112-
मेरे हा /थ में भी /ख का का/सा न था /,न तो मे /रे ल बों /पे स वा / ल ही था

यहां भी वही बात--बहर के माँग के मुताबिक़ -से--था---नी---तो----नी---शो-----रे---मे---का---पे---ही---- इन सब पर मात्रा गिराई है । मेरी व्यक्तिगत राय है कि वो शे’र उम्दा होता है जिसमें कम से कम minimum poetic liscence  की छूट लेनी पड़े ।इस बहर की एक ख़ास विशेषता भी है

आप ध्यान से देखें ---फ़ा इ लुन [2 1 2] का ’मख़्बून’ है ------ फ़ इ लुन [1 1 2]  जो मुज़ाहिफ़ है और इस में --फ़े--ऐन--लाम   तीन मुतहर्रिक [ हरकत लगे हर्फ़] एक साथ आ गए तो अब इस पर ’तस्कीन-ए-औसत’ का अमल हो सकता है । तस्कीन-ए-औसत का अमल तो आप जानते होंगे- जो ’मुज़ाहिफ़’ शकल पर ही लगता है । पहले भी चर्चा कर चुका हूं~ इस पर । चलिए एक बार फिर चर्चा कर देता हूँ याद दिहानी के लिए
’जब किसी " मुज़ाहिफ़ रुक्न " 3- मुतहर्रिक एक साथ आ जायें तो  बीच वाला हर्फ़ ’साकिन’  किया जा सकता है -। यह Obligatory है   Mandatory नहीं । आप चाहें तो अमल करे न चाहें तो अमल न करें।
अब आप इस बहर [ऊपर चर्चा कर चुका हूं~]

फ़ इलुन---फ़ इलुन---फ़ इलुन----फ़ इलुन
112--------112-----112-------112--
 पर तस्कीन-ए-औसत के अमल से  ’फ़ इलुन’[1 1 2] ,   --फ़अ लुन [2 2] में बदल जायेगा  यानी बीच वाला -ऐन- साकिन हो जायेगा  जो अपने से पहले वाले -फ़े- से मिल कर [हरकत+ सबब = 2= सबब-ए-ख़फ़ीफ़] हो गया  और तस्कीन के अमल से बहर के वज़न पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता और ये अर्कान बाहम मुतबादिल [आपस में बदले भी जा सकते हैं ] होते है
 इसका अमल  हम अगर मिसरा के  चौथे मुक़ाम पर [ जो अरूज़ और जर्ब का मुक़ाम है} लगा दे तो...? तो वज़न की सूरत हो जायेगी
फ़ इलुन----फ़ इलुन--फ़ इ लुन--फ़अ लुन      [ -ऐन- बसकून यानी ऐन साकिन है]
112--         -112-------112------22
और इस बहर का नाम होगा---मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुस्सकिन क्योंकि यह ’तस्कीन-ए-औसत ’ के अमल से बरामद हुई है
क्यो?
क्योंकि मुतदारिक की बुनियादी वज़न ’फ़ाइलुन’[2 1 2] पर ’ख़ब्न’ का ज़िहाफ़ लगा है सो मख़्बून हो गया और इस ’मख़्बून’ के आख़िरी रुक्न [ जो अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर है] तस्कीन का अमल कर दिया तो ’फ़अ लुन’ [2 2] हो गया सो मुस्सकिन लिख दिया और चूँकि मिसरा मे चार रुक्न [ शे’र में 8 रुक्न होंगे] तो मुसम्मन लिख दिया --तो पूरे बहर का नाम -मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुस्सकिन लिख दिया
आप को एक बात खटक रही होगी कि हम बार बार बात बात में  मुसम्मन ,,,मुसद्दस..अरूज--जर्ब--चार रुक्न--आठ रुक्न क्यों लिख रहे हैं ---कई बार तो लिख चुके हैं । जी सही कहा आप ने। मैं भी जब टी0वी0 पे समाचार देखता हूँ तो एक ही बात को न्यूज रीडर बार बार दुहराता है। एक बार मैने "ऎंकर" से पूछ ही लिया--भईया एक ही बात को आप बार दुहरा कर क्यों सता रहे हो?
ऎंकर ने बताया -- ये आप के लिए नहीं दुहरा रहा हूँ मैं उनके लिए दुहरा रहा हूँ जो ’अभी-अभी-’ टी0 वी0 खोले हैं,,,,... उनके लिए
बात साफ़ हो गई ---बार बार इस लिए दुहरा रहा हूँ जो "अभी-अभी-" मेरे ब्लाग पर आयें होंगे--उनके लिए दुहरा रहा हूँ -आप के लिए नहीं । ख़फ़ा न होइए ,सर !

हमारा इरादा तो कुछ भी न था
नज़र आप की क्यूँ ख़फ़ा हो गई
" ख़ता बख़्श दो गर ख़ता हो गई

जब तक आप का गुस्सा ठंडा न हो जाये तब तक.....

बात बात में -इस गाने की तक़्तीअ ही कर लेते है ---122--122--122-12  अरे यह तो बहर-ए- मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ का वज़न आ गया [ इस वज़न की चर्चा पिछले क़िस्त में कर चुका हूँ]
चलिए अब एक बार फिर बहर-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुस्सकिन पर आते है
यानी 112---112-----112------22
 फ़ इलुन---फ़ इलुन--फ़ इलुन--फ़अ लुन
या
 22---22-----22----22
फ़अ लुन---फ़अ लुन--फ़अ लुन--फ़अ लुन
या ऐसी ही और वज़न जो  ’तस्कीन-ए-औसत ’ के अमल से बरामद हो -कहलायेंगी सभी  -- बहर-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुस्सकिन ’-ही कहलायेगा । ये बात दीगर है कि तस्कीन का अमल किस किस मुकाम पर हो रहा है

एक बात -ख़ब्न [मक़्बून] -एक आम ज़िहाफ़ है जो शे’र के किसी मुकाम ---सदर/इब्तिदा....हस्व....अस्व...अरूज़/जर्ब किसी मुकाम पर आ सकता है
अगर यह अमल सिर्फ़ पहले मुकाम [सदर/इब्तिदा] पर अमल करते हैं तो बहर बरामद होगी -
22--112---112----112-
और दूसरे मुक़ाम पर करें तो
112---22---112---112-
इस प्रकार ्तस्कीन के अमल से
112---112---22---112-
और
112----112---112---22   इस प्रकार कुल मिला कर मुसम्मन  के केस में 4-और मज़ीद [अतिरिक्त] बहर बरामद हो सकती है
अब आप अगर दो-दो- रुक्न पर अमल करें तो कितनी बहर बरामद हो सकती है या तीन--तीन रुक्न पर एक साथ अमल करें तो कितनी रुक्न बरामद हो सकती है-इसकी गणना आप स्वयं करें तो बेहतर ..आत्म विश्वास बढेगा

या चारों रुक्न पर एक साथ तस्कीन--ए-औसत का मल करें तो? तो क्या ? एक ही बहर बरामद होगी और वो होगी  22--22--22--22 --इस पर चर्चा अगली क़िस्त में  करेंगे
अभी तो हम आप बहरों से खेल रहे है
चलिये आप यही अमल [तस्कीन-ए-औसत का] मुज़ाअफ़ बहर -[16-रुक्नी बहर ] यानी
112---112---112---112---112---112---112---112
112---112---112----112---112---112---112---112  पर इसी तरतीब से लगायें और बताएं कि कितनी मज़ीद बहर आप बरामद कर सकते है ?

दो चार बहर तो मैं ही बरामद कर देता हूं-आप के लिए
112---22---112----22-----112-----22----112---22

22---112-----22----112----22---112------22---112
22---22---22--22---22---22---22----22-
तस्कीन -ए-औसत के अमल से और भी औज़ान बरामद हो सकते है -आप कोशिश तो करें।

यह सिर्फ़ खेल नही है---ये तमाम मुस्तनद बह्र हैं जिसमें आप चाहे तो शे’र-ओ-शायरी कर सकते है यह आप पर निर्भर करता है और लोग करते भी है

मजाज़  लखनवी की एक मशहूर गज़ल है आप ने भी सुना होगा } चन्द अश’आर लेते हैं

कुछ तुझ को ख़बर है हम क्या क्या ,ऐ शोरिश-ए-दौरां भूल गए
वो जुल्फ़-ए-परिशां भूल गए ,वो दीदा-ए-गिरियां    भूल गए

सब का तो मुदावा कर डाला , औरअपना  मुदावा कर न सके
सब के तो गरेबां सी डाले  ,अपना ही गरेबां   भूल गए 

एक शे’र की तक़्तीअ कर के देखते हैं---
2   2     / 1 1 2  / 2  2     /2 2   //   2  2       / 1 1 2   / 2 2    / 1 1 2 = 22---112---22---22-//--22---112---22---112
सब का / त मु दा /वा कर / डाला // अर ,अप / न मु दा / वा कर/  न सके
2     2  /  1 1 2   / 2  2  / 2 2   //   2   2   / 1 1 2 / 2   2  / 1 1 2 = 22---112---22--22-//  22---112---22----112-
सब के /  त गरी ’/बां सी  / डाले // ,अप ना / ह गरी / बां   भू / ल गए

जो ऊपर बहर बरामद की है यह ’ फ़ इ लुन ’ पर  तस्कीन-ए-औसत के अमल से बरामद हुई है और यह भी एक दुरुस्त बहर है
अब मैं समझता हूँ कि मतला की तक़्तीअ अब आप कर सकते हैं
एक बात और-- 16-रुक्नी बहर की और उर्दू शायरी की एक ख़ास मिजाज़ यह भी है कि हर चार रुक्न के बाद एक ठहराव-सा आ रहा है जिसे अरूज़ की भाषा में ’अरूज़ी वक़्फ़ा’ कहते है और यह लाजमी भी है ऐसी बहरों को "बहर-ए-शिकस्ता" भी कहते हैं
एक उदाहरण और लेते हैं

नज़ीर अकबराबादी की एक नज़्म है-बंजारा नामा- बड़ी मशहूर नज़्म है आप ने भी सुनी होगी---चन्द अश’आर पेश कर रहा हूँ आप भी लुत्फ़ अन्दोज़ होइए

टुक हिर्सो-हवा को छोड़ मियां मत देश विदेश फिरे मारा
कज़्ज़ाक़ अजल का लूटे हैं दिन रात बजा कर नक़्क़ारा
क्या बधिया ,भैसा,बैल ,शुतुर , क्या गौने ,गल्ला सर भारा
क्या गेहूँ चावल मोठ मटर ,क्या आग धुआँ और  अंगारा
सब ठाठ पड़ा रह जायेगा जब लाद चलेगा  बंजारा

नामा बहुत लम्बा है मगर बहुत दिलकश  है
पहले शे’र की तक्तीअ कर के देखते हैं ----
 2     2    / 1 1  2 /  2  2   /1  1   2  /  2   2  / 1 1 2   / 1 1 2   / 2 2   = 22---112---22--112 // 22 -112---112--22
टुक हिर् / स-हवा /को छो / ड़ मि यां /  मत दे / श वि दे / श फिरे/  मारा
 2     2   / 1   1    2  /    2  2   /2 2 / 2     2  / 1 1 2  /  2   2    /2 2    = 22---112---22---22--//-22---112---22---22
क़ज़ ज़ा / क अ  जल/  का लू / टे हैं /  दिन रा /त ब जा / कर नक़ / क़ारा

यह भी  बहर--ए-मुतदारिक मख़्बून की एक वज़न है और दुरुस्त वज़न है
बाक़ी शे’र की तक़्तीअ आप भी कर सकते है--

चलते चलते-----एक दिलचस्प बात
ऊपर हम दो वज़न की चर्चा  कर चुके है
[अ] बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मक़्त्तूअ  अल आख़िर  जिसका वज़न था
212---212---212---22
[ब]  बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुस्सकिन अल आखिर जिसका वज़न था
212--212---212----22
देखने में तो दोनो वज़न एक जैसा है तो  फिर  नाम  क्यों जुदा जुदा है? जी बिलकुल सही । आम पाठक को फ़र्क नहीं पड़ता कि ऐसे बहर को ’मक़्तूअ अल आखिर’ कहें या ’मख़्बून मुस्सकिन अल आखिर कहे? मगर अरूज़ के जानकार को फ़र्क़ पड़ता है।
दोनो बहर भले  ही देखने में एक जैसी लगती हो ,जुड़वा लगती हो,सीता-गीता जैसी लगती हो मगर  दोनो बहर में बुनियादी फ़र्क़ है
1- बहर [अ] ’क़ता’ के ज़िहाफ़ के अमल से बरामद हुई है -अत: अब इसके ऊपर और कोई ज़िहाफ़ नहीं लग सकता
जब कि बहर [ब]  पहले ’ख़ब्न’ ज़िहाफ़ से बरामद हुई फिर उस के  बाद ’तस्कीन’ के अमल से बरामद हुई अर्थात इस वज़न पर 2- आपरेशन किया गया है
2- बहर [अ] में जिहाफ़ ’क़ता’ -ख़ास ज़िहाफ़ है जो शे’र में  ’सिर्फ़ अरूज़ और जर्ब” के मुक़ाम के लिए ख़ास है जब कि ’ख़ब्न’ एक आम ज़िहाफ़ है  जिस पर फिर तस्कीन का अमल किया गया है जो शे’र के किसी मुक़ाम पर आ सकता है -अरूज़ और जर्ब पर भी आ सकता है  -जो मैने यहाँ लगा कर दिखा भी दिया [ कि बात दिलचस्प बन जाये] और इस तरह ’जुड़वा बहन’ सामने आ गई -’सीता-गीता”की तरह
इस वाक़या का बयान  कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब ने बड़े मज़ाहिया ढंग से किया है --आप भी सुन ले
’----यूँ समझ लें कि जिस तरह ’ मख़्बून मुस्सकिन ’ फ़अ लुन [22] और ’मक़्तूअ ’फ़अ लुन [22] हम शकल हैं -उसी तरह -दो जुड़वा- बहनें -जो हम शकल हों-उनके मक़ाम अपने शौहरों की ज़िन्दगी में अलग-अलग हैं----"
अगर आप ने ’सीता- गीता’   हेमा मालिनी वाली  हिन्दी फ़िल्म देखी हों तो यह बात स्पष्ट हो जायेगी । फ़िल्म के अन्त में दोनो हीरो को अपनी अपनी रुक्न[बेगम]  के बारे में ’कन्फ़ुज़न ’ था कि ये न कि वो?? मगर हीरोइनों को अपने अपने शौहर के बारे में कोई ’कन्फ़ुजन’ नही था वो साफ़ थीं

अगले किस्त में इस बह्र -बहर-ए-मुतदारिक के सिलसिले को जारी रखते हुए इस की और मुज़ाहिफ़ बह्र पर चर्चा करेंगे।

मुझे उमीद है कि मुतदारिक के इस मुज़ाहिफ़ बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

मंगलवार, 28 मार्च 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 35

चन्द माहिया : क़िस्त 35

:1:

सजदे में पड़े हैं हम
लेकिन जाने क्यूँ 
दिल है दरहम बरहम

;2;

जब से है तुम्हें देखा
दिल ने कब मानी
कोई लक्ष्मन  रेखा

:3:

क्या बात हुई ऐसी
तेरे दिल में अब
चाहत न रही वैसी

:4:
समझो न कि पानी है 
क़तरा आँसू का
ख़ुद एक कहानी है

:5:

वो शाम सुहानी है
जिसमें है शामिल
कुछ याद पुरानी है

शब्दार्थ   दरहम बरहम = तितर बितर ,अस्त व्यस्त ,व्यथित

-आनन्द.पाठक-
08800927181